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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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उसने सामान्य लोगों का जीना हराम कर दिया है। ऐसे पापी और धर्मोन्मादी बादशाह की नाक में नकेल डालने की तरकीब और ताकत हिंदुस्तान में केवल आपके पास है। " "सच है राजन, दिल्ली और राजपूताना छोड़कर मैं और शहजादा अकबर बड़े भरोसे के साथ आपके आश्रय में आये हैं।" भावुक होकर दुर्गादास राठौड़ ने कहा। कल सवेरे ही शम्भूराजा अपने सहयोगियों के साथ सुधागढ़ पहुँचे थे। वे गढ़ पर सबनिम के महल में रुके थे। कल ही किले के नीचे धोड़से नामक गाँव में उनकी और शहजादा अकबर की पहली भेंट हुई थी। कल की इस शाही मुलाकात में ही दोनों ने एक-दूसरे को हीरे जवाहरात, मूल्यवान वस्त्र, अरबी तुर्की घोड़े आदि दिए थे। इस अवसर पर शम्भूराजा ने दुर्गादास और शहजादा अकबर की बड़ी प्रशंसा की थी। इन्हें धन्यवाद भी दिया— "अच्छा हुआ आपके निमित्त से हमारे अधिकारियों की बगावत का पर्दा उठा।" "कर्मचारियों के उस पत्र ने उल्टे हमारा बड़ा उपकार किया, राजन!" शहजादा अकबर ने हँसते हुए कहा, "पिछले चार-पाँच महीने से आपने हमें इस पाली की भयंकर बरसात में भिगोते हुए अटका रखा है। हो सकता है कि हमारे उद्देश्य के बारे में आपके मन में सन्देह हो।" शहजादे की बात सुनकर शम्भूराजा दिल खोलकर हँसे। आगत स्वागत उत्तम रीति से हुआ। अगली बैठक के लिए ऊपर सुधागढ़ किले की जगह निश्चित की गयी। उस समय शम्भूराजा ने शहजादे की ओर ध्यान से देखा। थोड़ा स्थूल शरीर, मध्यम ऊँचाई का तेजस्वी शहजादा देखने में आकर्षक लग रहा था। उससे शम्भूराजा ने कहा, "चलिए आज हमारे साथ किले पर ठहरिये। वहीं पर विस्तार से बातें होंगी।" "राजन, चाहिए तो दुर्गादास को साथ ले जाइये। मैं कल सवेरे पहुँचूँगा।" अकबर ने कहा। "आज क्यों नहीं?" "राजन, यहाँ की भयंकर बरसात की मार से तो अपने को किसी तरह बचाया, लेकिन किले पर की सर्दी नहीं झेल पाऊँगा।" दुर्गादास के साथ किले पर की राजा की बातचीत उत्तम रीति से सम्पन्न हुई। सवेरे शम्भूराजा और दुर्गादास ने पूजा समाप्त की। दोनों की पालकियाँ मोराई देवी के मन्दिर पहुँचीं। देवी के दर्शन करके शम्भूराजा पूर्व दिशा के बुर्ज के पास टहलने लगे। साथ में उत्साही दुर्गादास थे ही। ऊँचे कद, साँवले रंग, राजपूत शैली की 318 :: सम्भाजी