छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदाढ़ी रखने वाले दुर्गादास का व्यक्तित्व बड़ा विलोभनीय था। दोनों मिलकर बगल के तैलबैल किले, पीछे के घने वृक्षों और आसपास की निसर्ग शोभा को देखने लगे। दुर्गादास की बोलचाल से उनकी निष्ठा प्रकट हो रही थी। दुर्गादास अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए बता रहे थे कि राजपूताना के सभी राजाओं को एक झंडे के नीचे एकत्र करके अपने देश और धर्म पर संकट स्वरूप औरंगजेब को गद्दी से उतार कर शहजादा अकबर को गद्दी पर बिठाने की उनकी योजना थी। यह बताते समय राजपूताना के प्रति उनका प्रेम, शहजादे पर उनकी निष्ठा और सम्भाजी के प्रति असीम आदर की स्पष्ट अभिव्यक्ति हो रही थी। जोधपुर के राजा जसवंत सिंह जीवनभर मुगलों के नमक के प्रति निष्ठावान बने रहे। औरंगजेब को प्रसन्न करने के लिए उसका आदेश मानकर काबुल और कधहार तक धावा बोला था। युद्ध भूमि में उन्होंने वीरता दिखाई किन्तु खैबर दर्रे के पास उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके जैसे एकनिष्ठ सेवक की मृत्यु पर बादशाह को दुखी होना चाहिए था। किन्तु उनकी मृत्यु से औरंगजेब प्रसन्न हो गया। औरंगजेब ने सोचा कि एक और हिन्दू राज्य अपने अधिकार में लेने का अवसर अपने आप मिल जाएगा। किन्तु उस समय जसवन्त सिंह की पत्नी गर्भवती थी। प्रसूति हो जाने पर उत्तराधिकार की परम्परा के अनुसार राजपूतों ने नवजात शिशु अजित सिंह को गद्दी पर बिठाने की माँग की। इस माँग को लेकर दुर्गादास ने बादशाह से भेंट की। उन्होंने आग्रह किया— "हुजूर, उत्तराधिकार के अधिकार के अनुसार अजित सिंह को जोधपुर का राजा बनाएँ।" "जरूर क्यों नहीं?" औरंगजेब ने हँसते हुए कहा, "कल ही हम आपके राजा को राजसी वस्त्र दे देंगे। लेकिन एक शर्त पर ।" "कौन सी शर्त, जहाँपनाह ?" "कल अजित सिंह और उनकी माँ इस्लाम धर्म स्वीकार करें और राज करें।" बादशाह के इस अमानवीय उत्तर से दुर्गादास थर्रा गये। उसी समय दुर्गादास ने सौगन्ध ली—'मेरा मृत शरीर श्मशान की ओर जाये उससे पहले मैं औरंगजेब को अवश्य ही रास्ते पर लगाऊँगा।' उसी क्षण से दुर्गादास आलमगीर के विरुद्ध धधक उठे थे। उस घटना का स्मरण आते ही दुर्गादास का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उन्होंने कहा, "अकबर और मानसिंह के समय से हमारी तीन-तीन पीढ़ियाँ दिल्ली की मुगल सल्तनत की रक्षा करती रही हैं, अपना रक्त बहाती रही हैं। किन्तु, यह सम्भाजी 319