छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्म विक्षिप्त औरंगजेब उन सभी बातों को भूलकर दूसरी ओर पलट गया। हिन्दू प्रजा पर उसने जजिया कर लगा दिया और उसकी वसूली के लिए अकल्पनीय अत्याचार किया।'' "किन्तु उत्तर की प्रजा ने ऐसी अधम बादशाहत के विरुद्ध विद्रोह क्यों नहीं किया ?'' शम्भूराजा ने जानना चाहा। "सब कुछ हुआ। औरंगजेब के जामा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए जाते समय हिन्द प्रजा ने उन्हें रोका, उनसे प्रार्थना की किन्तु बादशाह का कठोर हृदय नहीं पिघला। उन गरीबों पर उसने मदोन्मत्त हाथी नचाया। फिर भी औरंगजेब का इरादा नहीं बदला। इन्हीं घटनाओं के परिणामस्वरूप राजपूताना में विद्रोह हुआ।'' दुर्गादास विद्रोह की कहानी सुना रहे थे। राजस्थान की रेतीली भूमि पर भड़के उस विद्रोह को जानने के लिए औरंगजेब स्वयं वहाँ दौड़कर आया था। उसने दक्षिण से मुअज्जम और बंगाल से आजम को बुला लिया था। राजपूताना शान्त नहीं हो रहा था। किन्तु एक बार बादशाह द्वारा अपमानित शहजादा अकबर को दुर्गादास ने बड़ी कुशलता से अपनी ओर कर लिया था। उसके दिमाग में विद्रोह का बीज बोया। परन्तु दुर्गादाम और शहजादा अकबर दोनों दुर्भाग्य के शिकार हुए। अकबर ने केवल बगावत का झंडा ही नहीं ऊँचा किया था, बल्कि स्वयं को नया शाहंशाह घोषित करके खुतबा पढ़ा था। अपने पिता से युद्ध करने का गुनाह किया था। इस तरह का शहजादा कहीं भी चला जाये वह बादशाह बिना उसका प्रतिशोध लिए नहीं रह सकता। इसका अनुमान दुर्गादास और अकबर दोनों को था। इसीलिए उन्हें सह्याद्रि के सिंह की फौलादी गुफा भरोसे की लगी। दुर्भाग्य के अनेक थपेड़े खाते हुए दोनों चार महीने की कष्टकर यात्रा करके महाराष्ट्र के पठार पर पहुँचे थे। जजिया कर का विषय निकलते ही शम्भूराजा बोल पड़े, "बादशाह द्वारा अपनी हिन्दू प्रजा पर यह कर लगाने का समाचार हमारे पिताजी को मिला था। उस समय उनकी बेचैनी को हमने बहुत निकट से देखा था। उन्होंने औरंगजेब से स्पष्ट शब्दों में कहा था। अपने इस व्यवहार से आपने अपने श्रेष्ठ तुर्क वंश को कलंकित किया है। प्रजा राजा की सन्तान जैसी होती है। उसमें हिन्दू और मुसलमान जैसा अन्तर नहीं करना चाहिए। हमारे पिताजी ने इस प्रकार का भेद कभी नहीं किया। हिन्दवी स्वराज्य खड़ा करते समय उन्होंने बीजापुर की आदिलशाही से सात हजार पठान अपनी सेना में भर्ती किये थे। आज भी दौलतखान और दरियाखान जैसे नरवीर हमारी सेना में हैं।" दुर्गादास ने दुख से कहा, "कहाँ शिवाजी और कहाँ औरंगजेब ? केवल भौगोलिक सीमा के विस्तार से कोई राज्य बड़ा नहीं होता। राजा के मन की 320 :: सम्भाजी