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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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विशालता महत्त्वपूर्ण होती है। शहजादा अकबर ने वचन दिया था कि वे उगते सूर्य की किरणों के साथ ही किले पर पहुँच जाएँगे। किन्तु दोपहर हो जाने पर भी उनका कहीं पता नहीं था। इसलिए दुर्गादास और सम्भाजी चिन्तित हो गये थे। अन्त में बड़ी देर से शहजादे की पालकी गढ़ पर पहुँची।'' अपने क्षोभ को भीतर ही दबाते हुए शम्भुराजा ने कहा, "शहजादे, नीचे की तलहटी से किले के ऊपर आने में यदि आपको इतना समय लग गया तो इस गति से आप दिल्ली पर आक्रमण कैसे करेंगे ?'' शम्भुराजा की बात सुनकर दुर्गादास हँसने लगे। शहजादे की धीमी गति को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, "क्या बताऊँ शम्भू महाराज, शहजादे के इसी ऐशो-आराम ने हमें पीछे रोक लिया, नहीं तो हम बादशाह औरंगजेब की दस महीने पहले ही छुट्टी कर दिये होते।'' "क्या कह रहे हैं?'' "हाँ महाराज ! इस शहजादे के लिए खुदा ने स्वर्ण अवसर का दरवाजा खोल दिया था। औरंगजेब इतना अकेला पड़ गया था कि उस समय उसके पास दस- बारह हजार की फौज भी नहीं बची थी। और इस शहजादे के झंडे के नीचे हम एक लाख राजपूत खड़े थे। अब विजय हमारी है और दिल्ली की गद्दी भी अपनी। इस विचार की खुमारी में ये महाशय इतने मशगूल हो गये कि एक सौ बीस मील की दूरी तय करने में इन्हें पन्द्रह दिन लग गये। इस बीच के समय में कभी नया सिंहासन बनाने के लिए बढ़इयों को बुलाना कभी शाही वस्त्र तैयार करने के दर्जियों की फौज एकत्र करना जैसे व्यर्थ के कामों में शहजादे ने स्वर्ण अवसर गँवा दिया। हमारी इस मूर्खता भरी दीर्घसूत्रता का फायदा उस बूढ़े ने उठाया और कपट नीति से कटार भोंककर शहजादे को अक्षरशः खानाबदोश बना दिया।'' महल में खुली चर्चा चल रही थी। उसमें कवि कलश भी आकर सम्मिलित हो गये थे। दुर्गादास के बताने पर शहजादे को भी वह बुरा दिन याद आया। उसने स्पष्ट रूप से अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा, "उस समय मेरी नालायकी ही आड़े आ गयी। इसमें कोई सन्देह नहीं। किन्तु मेरा बाप औरंगजेब है उस्तादों का उस्ताद।'' "वह कैसे ?'' "क्या कहूँ राजन ! अकारण ही मैं अन्धश्रद्ध हो गया था। हमारी तख्तपोशी को किसी की नजर न लगे इसलिए रोज कितने मील चलना चाहिए, इसकी सलाह एक ज्योतिषी से लेता था। मेरे अब्बाजान ने चोरी चोरी उस ज्योतिषी को रिश्वत भेज दी थी। वह बदमाश आदमी मुझे दूर का मुहूर्त बताने लगा।'' दुर्गादास यकायक बहुत गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज ! सम्भाजी 321