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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 793 में से

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आपने अपनी जिन्दगी में मनुष्यों के बीच अनेक देव और दानव देखे होंगे। किन्तु औरंगजेब की तरह का कपटी, धोखेबाज और सियार से भी बढ़कर धूर्त व्यक्ति कोई दूसरा आपने नहीं देखा होगा। शहजादे के इतनी देर से आने के बावजूद हम लोग उस रात विजय की देहरी तक पहुँच गये थे। उस समय बादशाह का तहव्वूरखान नाम का एक बहादुर सरदार भी हमारे साथ आ गया था। दूसरे दिन युद्ध आरम्भ होने वाला था। दोनों ही फौजें एक दूसरे से भिड़ने वाली थीं। बीच में केवल एक रात का झीना पर्दा बचा था। किन्तु दुर्भाग्य से तहव्वूरखान का ससुर इनायत खान और तहव्वूरखान की बीबी और उसके बच्चे बादशाह के कब्जे में थे। उस रात बादशाह ने तहव्वूरखान के पास एक गुप्त सन्देश भेजा- तुम भले ही हमारी सेना में सम्मिलित न हो फिर भी विचार-विमर्श के लिए चुपचाप मेरे डेरे में आ जाओ। यदि तू नहीं आया तो तुम्हारे बच्चों को गुलामों के बच्चों की तरह कुत्तों से भी कम दाम पर बेच दिया जाएगा। तुम्हारी खूबसूरत बीबी को नंगी करके फौजी बाजार में इज्जत लुटाने के लिए छोड़ दिया जाएगा। उस पत्र से तहव्वूरखान डगमगा गया। हममें किसी को बिना कोई सूचना दिये वह घबराया हुआ बादशाह के पास चला गया। आखिर जो होना था वही हुआ। बादशाह ने उस रात उसका कत्ल करके उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये।" "इस प्रकार की कपटी और धोखेबाज चाल केवल औरंगजेब चल सकता है।" कवि कलश ने कहा। "कविराज, उस रात बादशाह की कपटी चाल का कमाल अभी आगे है। उस धूर्त बादशाह ने एक दूसरा गुप्तपत्र अपने इस शहजादे के नाम लिखा। उसने ऐसी व्यवस्था की कि वह पत्र हमारे राजपूतों के हाथ लगे। आधी रात को मेरे नौकर ने मुझे सोते से उठाया। वह भयंकर पत्र मेरे हाथ में दिया। उसमें लिखा था-'बेटे अकबर! अपने गुप्त समझौते के मुताबिक तुमने तो कमाल कर दिया। मारे राजपूत युद्धवीरों को इकट्ठा करके मौत के सामने खड़ा कर दिया। क्या कहना? अब बस कल सुबह होने की देर है-सामने से मेरी फौज और पीछे से तुम्हारी फौलादी फौज। अपने दोनों के बीच राजपूतों का सर्वनाश करना है।' उस भयानक पत्र से मेरे होश उड़ गये थे। मैं अपने सोने के कपड़ों में ही बाहर निकला। उस पत्र के स्पष्टीकरण के लिए इस शहजादे के डेरे पर दौड़ता गया। किन्तु अपने इस महान शहजादे से हमारी भेंट ही नहीं हो पायी।" "क्यों ?" शम्भूराजा ने आश्चर्य से पूछा। "क्योंकि इस शहजादे ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि कुछ भी हो जाये पर मेरी नींद खराब नहीं करना। मैं उस समय बहुत चिल्लाया। पर शहजादे से भेंट नहीं हो पायी। वे उठने को तैयार ही नहीं थे। तब तहव्वूरखान के डेरे की ओर 322 सम्भाजी

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