छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवा फहराने के अतिरिक्त दूसरा कोई चारा नहीं है।" जीजामाता ने धीर गम्भीर आवाज में पूछा—"शिवा! और कितनी बार जंजीरे पर आक्रमण करोगे? जंजीरा जीतने के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ी? कितने लोग मारे गये? और उस जल देवता को अभी और कितनों की बलि चाहिए?" शिवाजी महाराज ने कुछ विचित्र ढंग से मुस्कराते हुए कहा, जंजीरे के हबशी बहुत जिद्दी और कट्टर हैं। दस साल हुए होंगे, वर्षा ऋतु के होते हुए हमने जंजीरे के किनारे की दंडा और राजपुरी चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया था। जंजीरा हाथ नहीं आ रहा था इसलिए समीप की पहाड़ियों पर चले आये। वहीं पर पद्मदुर्ग किला बनाकर आसपास के जलपोतों पर नियन्त्रण करने लगे। हमने अनेक बार जंजीरे का सामना किया। उस पर आक्रमण किया। उसके लिए क्या क्या नहीं किया? किन्तु वर्षों की प्रतीक्षा के बाद भी जंजीरा हमारे हाथ नहीं आया। उस रात शिवाजी महाराज बहुत देर तक अपनी माता के साथ चर्चा करते रहे। जिस प्रकार चक्रव्यूह भेदन का ज्ञान अभिमन्यु ने जिस तत्परता और सावधानी से ग्रहण किया था उसी निष्ठा से शम्भूराजा ने शिवाजी की सागरीनीति को अपने कानों में और मस्तिष्क में संचित किया। महाराज जीजामाता मे कह रहे थे—"माताजी ! समुद्र यात्रा को हिन्दू अधर्म वा पाप मानते हैं किन्तु यदि हमें अपने राज्य का विस्तार करना है तो सागरी यात्रा को धर्म या पुण्य का कार्य मानना होगा। अपनी नौ सेना को अधिक समृद्ध करना होगा। पर्वतों की तलहटी में कूदने वाले धनगर जवान, मधुमक्खियों के छत्तों में हाथ डालने वाले, बन्दरों से भी अधिक तेजी से पेड़ों पर चढ़ने वाले कोली जवान, हमारे भावल के पर्वतों के साहसी जवान यदि समुद्र की उत्ताल लहरों पर फेंक दिये जायें तो मछलियों की तरह तैरने लगेंगे। उसके बाद दूसरा दिन बहुत ही त्रासदायक था। समस्याओं के नुकीले रास्तों पर चलते हुए और अपने जख्मी हाथों से साम्राज्य के शिल्प को माकार करने वाले अपने पिता को बहुत समीप से देखा था। किन्तु उस दिन जैस गमगीन चेहरा शम्भूराजा ने दुबारा कभी नहीं देखा। उसके पहले दिन होली का त्यौहार था। दांडा और राजपुरी के किनारे की चौकियों पर तैनात मराठा सैनिक कुछ असावधान थे। उसी रात सिद्दी कासिम और उसका भाई खैर्यात पाँच सौ हबशी सैनिकों को लेकर आक्रमण किये। वे अपनी सेना को दो भागों में बाँटकर नौकाओं से इस पार उतर आये। जब इस पार होली का हंगामा मचा हुआ था। तब पानी के रास्ते छुपकर आये शत्रु ने सामने वाले बुर्ज पर सीढ़ियाँ लगाकर दोनों ओर से एक साथ आक्रमण किया। मराठों का शिविर बीच में फँस गया। शिवाजी महाराज ने भविष्य को ध्यान 330 :• सम्भाजी