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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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में रखते हुए आगामी युद्ध के लिए किनारे पर कई बारूद से भरे गोदाम बनाए थे। दुश्मनों ने उन्हीं गोदामों में आग लगा दी थी। इन्हीं गोदामों से प्रचंड विस्फोट हुए थे। विस्फोट की भीषण आवाज से आसपास के गाँववालों के कानों के पर्दे फट गये। इस दुखद समाचार को सुनकर शिवाजी महाराज रायगढ़ में बहुत व्यथित हुए थे। वे अत्यन्त बुझे स्वर में अपने सहकर्मियों को बता रहे थे—"पिछले सात-आठ वर्षों में अथक परिश्रम से मुरुड के किनारे जो कुछ कमाया था वह सब कुछ अग्निदेवता ने छीन लिया। " यह पुराना इतिहास शम्भूराजा अपने सहयोगियो को बता रहे थे उसी समय कवि कलश ने पूछा—"शिवाजी महाराज ने जजीरे पर पहला आक्रमण कब किया था?" "बहुत पहले, अपनी जवानी के दिनों मे। अफजल खान को मारने के पहले से ही जजीरे न उनकी नींद हराम कर रखी थी। सबसे पहले व्यंकोजी पन्त और उसके बाद मोरोपन्त पेशवा ने जजीरे पर आक्रमण किया था। मराठों के पहले आक्रमण से सिद्दी खैर्यात की आँखें सफेद हो गयी। अपनी जान बचाने के लिए उसने समझौता कर लिया। किनोर की भागरदडा, राजपुरी और अन्य चौकियाँ उसने मराठो को दे दीं। अब बाकी बचा था केवल जजीरा। पिताजी की दृष्टि जंजीरे की ओर टकटकी लगाये देख रही थी। उसी समय पिताजी ने जजीरे पर आक्रमण किया होता किन्तु दूसरी ओर से बीजापुर का अफजल खान बहुत बड़ी सेना लेकर तूफान की तरह बढ़ता आ रहा था। आक्रमण उसकी ओर से हुआ था इसलिए न चाहते हुए भी पिताजी को जंजीरे पर आक्रमण अधूरा छोड़कर लौटना पडा।" "फिर ?" "फिर क्या? दस साल बाद पिताजी ने एक बार फिर सिद्दियों पर आक्रमण किया। जजीरे वालों के ध्यान मे आया कि मराठे अब हार नहीं मानने वाले हैं। तब भयभीत सिद्दी दिल्ली के बादशाह औरंगजेब की शरण मे जा गिरा। वह मुगलों का मांडलिक बना दिया गया। उसे मुगलों से सेना, अनाज, बारूद आदि की सहायता मिलने लगी। इस तरह वह बच गया।" यह चर्चा जोरों पर थी कि शम्भूराजा ने निश्चय कर लिया है कि जंजीरे पर वे हर हालत में अपनी विजय पताका फहराएँगे। इसीलिए उन्होंने उस बैठक में दर्या सारंग, भयानक भंडारी और सागरी अभियान के अनुभवी तांडेलों को भी सम्मिलित किया था। उन्होंने जंजीरा, अली बाग से मुम्बई तक के सागर तट को दिखाने वाला मानचित्र सामने रखा। समुद्र के किनारे पर अंकित एक स्पष्ट बिन्दु की ओर संकेत करते हुए शम्भूराजा ने कहा, "यह देखो। यह मुम्बई बन्दरगाह है। यह मूलतः पुर्तगालियों के सम्भाजी :. 331