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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 793 में से

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अधिकार में था। किन्तु अपनी बेटी के विवाह में पुर्तगाल-राजा ने अपने अँग्रेज दामाद को भेंट कर दिया। तब से मुम्बई पर अँग्रेजों का अधिकार है। जंजीरे के सिद्दी और अँग्रेज दोनों ही बहुत चालाक और धूर्त हैं। वे केवल अपना लाभ देखते हैं और हमारे स्वराज के लिए संकट पैदा करते रहते हैं। किसी की बाँह में छुरा भोंक देने से वह बेकाम की हो जाती है, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। उसी तरह मुम्बई की बगल में थल गाँव के पास यह जो छोटा टापू है। उसी पर पिताजी ने नया किला बनाने का निश्चय किया था। किन्तु धूर्त अँग्रेजों ने समझ लिया था कि मराठों की सेना का यहाँ तक पहुँच जाना बगल में छुरा भोंकने जैसा ही है। मराठों के बढ़ते समुद्री प्रभाव का सीधा मतलब था सिद्दियों के खात्मे का खतरा। यह बात सिद्दी भी अच्छी तरह जानते थे। इसीलिए एक दिन सिद्दियों की तोपें इस किनारे पर गोले उगलने लगीं। आग उँगलती तोपों की अग्नि वर्षा के कारण पिताजी ने किले का निर्माण स्थगित कर दिया। " बैठक में सभी ने शिवाजी महाराज की दूर दृष्टि की प्रशंसा की। बोलते बोलते शम्भूराजा ने खंदेरी के पास का एक छोटा बिन्दु दिखाया। और कहा, "यह उंदेरी है जो खंदेरी से केवल दो मील की दूरी पर है। अँग्रेजों ने मराठों का मुकाबला करने के लिए सिद्दियों की बहुत सहायता की। इसी से सिद्दियों ने मराठों का सामना करने के लिए उंदेरी पर अपना किला बनाया।" इस बैठक के दौरान शम्भूराजा बहुत भावुक हो उठे थे। उन्होंने कहा, "हमारे पिताजी ने इस जंजीरे को जीतने के लिए बहुत कोशिश की थी। मृत्यु के दो वर्ष पूर्व भी इस जंजीरे को जीतने की पूरी कोशिश की थी। उस समय अपने प्राणों और सेना की रक्षा के लिए सिद्दी कासिम अँग्रेजों की शरण में मुम्बई भाग गया था। इस पर भी पिताजी जरा भी विचलित नहीं हुए थे। मुम्बई के मझगाँव बन्दरगाह में सिद्दी कासिम की जो युद्ध सामग्री रखी गयी थी उसे ही जला देने की उन्होंने योजना बनाई। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने पचास विश्वसनीय, वीर और साहसी सैनिकों को भेजा था। किन्तु अचानक सावधान हुए सिद्दी ने उन सभी की निर्मम हत्या कर दी। इस प्रकार महाराज का जंजीरा अभियान अन्तिम बार अटक गया।" "ऐसे कितने आक्रमण किये थे महाराज ने जंजीरा पर?" उदासीनता भरी हँसी के साथ शम्भूराजा ने कहा, "लगातार चौबास वर्षों तक यह नासूर महाराज के मस्तिष्क को पीड़ा पहुँचाता रहा। छोटे-बड़े कुछ आठ आक्रमण महाराज ने जंजीरे पर किये।" इस पूरी घटना का वर्णन शम्भूराजा बड़े लगाव के साथ कर रहे थे। इससे यह 332 :: सम्भाजी

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