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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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था। वह उत्साह भरे शब्दों में कहने लगा—"वाह राजन! सूर्य निकलने के पहले ही आप यहाँ पहुँच गये। तबीयत बाग-बाग हो गयी।" "देर तो नहीं हुई?" शम्भूराजा ने पूछा। "नहीं नहीं, अभी तो सुतार कमाठी भी नहीं पहुँचे।" सन्ताजी पावला प्रशंसा के स्वर में बोले। शम्भूराजा खाड़ी के किनारे खड़े हो गये। खाड़ी के दोनों ओर अनेक छोटे- बड़े आवास और यन्त्रशालाएँ दिखाई दीं। पश्चिम की ओर से आने वाली विस्तृत खाड़ी से होकर आ रही थीं। हवा पानी के साथ अठखेलियाँ कर रही थी। पानी में खड़ी गुराब, पाल, तरांडी, माचवे जैसी अनेक छोटी बड़ी जहाजें अपनी जगह पर ही हिचकोले खा रही थीं। उन पर बँधे हुए भगवे झंडे तेज हवा के साथ फहरा रहे थे। शम्भूराजा वहीं पर स्वप्न के खोये में खड़े रहे। वे जल की सतह पर एकटक देख रहे थे। राजा की स्तब्धता से बाकी लोग भी शान्त थे। कविराज दो कदम आगे बढ़े और धीरे से कहा, "राजन?" "हाँ कविराज, यही वह बाणकोट की खाड़ी है। पिताजी को समुद्र स्नान का बड़ा शौक था। वे अनेक बार मन भर तैरने के लिए यहाँ आया करते थे। हमने तैरना कहाँ सीखा, पता है?" "कहाँ?" "यहीं, इसी बाणकोट की खाड़ी में। पिताजी की पीठ का सहारा लेकर हमने पानी में हाथ पैर चलाना सीखा। उसी समय पिताजी ने एक बार मुझसे पूछा था— 'बताओ शम्भू! मछली के बच्चे तैरना कब सीखते हैं?' मैंने आँखें बन्द किये हुए तुरन्त उत्तर दिया—'अपनी माँ के गर्भ से बाहर निकलते ही।' मेरा उत्तर सुनकर महाराज ने मुझे गले से लगा लिया और कहने लगे—'तुम्हें भी अब जीवन के समुद्र में हाथ पाँव चलाना सीखना चाहिए, हर समय सहाग देने के लिए बैठे थोड़े ही रहेंगे।' तब से प्रतिदिन मैं किले मे उतरकर रायगढ़वाड़ी की अठारह यन्त्रशालाओं का घूम-घूमकर निरीक्षण करता रहा। कभी समुद्रतट पर, कभी पहाड़ी किलों की ऊँची मीनारों पर घूम-घूम कर अपने निरीक्षण से सीखता रहा।" अपने नौकादल के लोगों और कर्मचारियों के साथ आगे बढ़े। तब तक दिन निकल आया था। सूरज की किरणें धीरे धीरे पानी में उतरने लगी थीं। इसी समय दादजी रघुनाथ देशपांडे का भूरा घोड़ा खाड़ी के तट पर पहुँचा। अपने से पहले शम्भूराजा को वहाँ पहुँचा देखकर अधिकारियों के होश उड़ गये। जहाज बनाने वाले कामाठी, भिश्ती आदि जल्दी-जल्दी पानी में उतर चुके थे। छोटी नौकाओं के सहारे अपने गुराबों पर या बड़ी नावों के ऊपर उछलकर चढ़ रहे थे। 334 :: सम्भाजी