छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 342, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस नितान्त व्यक्तिगत बैठक में बातें चलने लगीं। शम्भुराजा ने ही विषय छेड़ा—"शास्त्री जी! राज्याभिषेक के समारोह में समर्थ स्वामी यदि स्वयं पधारे होते तो हमें बहुत आनन्द आता।" "नहीं राजन! स्वामी जी के मन में ऐसा कुछ नहीं है। आजकल उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इसीलिए उन्होंने समारोह में दिवाकर गोसावी को भेजा था।" "सन्तपीठ और सत्तापीठ का रिश्ता ही कुछ विचित्र होता है, शास्त्री जी!" "निःसन्देह, शम्भुराजा! बड़े महाराज से स्वामी जी का बड़ा स्नेह था ही साथ ही प्रहलाद निराजी, निलो सोनदेव, रामचन्द्र नीलकंठ और विशेष रूप से बालाजी भावजी चिटणीस आदि सभी का, स्वामी का बड़ा शिष्य वर्ग था।" दिवाकर भट ने बोलते-बोलते बालाजी आवजी चिटणीस के नाम पर बल दिया। इससे शम्भुराजा का दम फूलने लगा। उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में कहा, "हमें पता है। आजकल समर्थ स्वामी हम पर बहुत नाराज हैं।" "ठीक है महाराज! अपने किसी गुणी ज्ञानी सहायक को हाथी के पैर के नीचे कुचलवा देना और किसी परदेशी पाखंडी को सिर पर बिठा लेना किसी राजा को शोभा देता है क्या?" दिवाकर भट ने आरम्भ में ही अपने मन की भड़ास निकाल दी। महारानी येसूबाई शम्भुराजा की ओर भयभीत दृष्टि से देखने लगीं। दिवाकर भट ने इधर- उधर देखते हुए इसी स्वर में प्रश्न किया—"कहाँ है वह कलश? दिखाई नहीं दे रहा है। सुना है वह भोंदू हर घड़ी, हर क्षण यहीं बैठा रहता है।" सम्भाजी राजा विचित्र हँसी हँसते हुए बोले, "कवि कलश कल ही सागरगढ़ और कोथलागढ़ के लिए गये हैं। मैंने उन्हें अष्टागार और कल्याण की बगल में रसद और बारूद की देखभाल करने और चौकियों के पहरों के निरीक्षण के लिए भेजा है। कभी ऐन वक्त पर आवश्यक होने पर उन्हें तलवारबाजी के लिए भी भेज देते हैं।" "क्या कहते हो? उस पाखंडी को लड़ना भी आता है?" "आता ही नहीं, वे विजयी भी होते हैं।" "ऐसा!" "वही तो कह रहा हूँ शास्त्री जी! अभी-अभी आपने जिन प्रधानों के हाथी के पैर के नीचे कुचले जाने पर खेद व्यक्त किया, उनमें बालाजी आवजी और उनके अभागे पुत्र को छोड़कर शेष सभी स्वराज्य द्रोही थे। शरीर में फैला हुआ साँप का विष और राजद्रोह का समय पर उपचार नहीं किया गया तो क्या आदमी और क्या राज्य, विनष्ट होने में अधिक विलम्ब नहीं होता।" 340 :: सम्भाजी