छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशम्भूराजा के इस प्रतिपादन से दिवाकर भट कुछ लज्जित हुए। उन्हें लगा कि शम्भूराजा के प्रशासन से सम्बन्धित जो शिकायतें सज्जनगढ़ तक आयीं थीं, वे सबकी सब सही नहीं थीं ! विषय को अधिक न बढ़ाते हुए शास्त्री जी ने एक रेशमी फीते से बँधी थैली शम्भूराजा के सामने रखी। उन्होंने कहा, “स्वामी जी ने अपने हाथ से लिखकर यह सन्देश आपके पास भेजा है। इसे आराम से पढ़ें।” उस दोपहर को शम्भूराजा बैठक से बाहर नहीं निकले। उन्होंने सारे महत्त्वपूर्ण कार्य आगे के लिए टाल दिया। येसूबाई और शम्भूराजा स्वामी जी के पत्र को एक साथ पढ़ रहे थे। कभी एक साथ पढ़ते, कभी पढ़कर एक-दूसरे को सुनाते, कभी उत्सुकतावश एक-दूसरे के हाथ से खींचते। उस काव्यमय पत्र ने दोनों का मन मोह लिया था। पत्र आठ-दम बार पढ़ा गया। इसके बाद शम्भूराजा की आँखें पत्र की अन्तिम पंक्ति पर टिक गयीं— स्मरण करो शिवराय को तृण सम जीवन जान तरे लोक परलोक को चढ़े कीर्ति के यान याद करो शिव रूप को उनके प्रबल विरोध वह प्रताप जग व्याप्त जो तज सारे अवरोध चलना, हँसना, बोलना और जगत व्यवहार सीखो सब शिवराय से मन के परम उदार सभी सुखों को त्याग कर साधा अविचल योग राज्य सदा रक्षित रहे, कितने किये प्रयोग किसी पवित्र ग्रन्थ की भाँति ही शम्भूराजा ने उस पत्र को हृदय से लगाया, ईश्वर का स्मरण किया। उन्होंने अभिभूत होकर कहा—“युवराज्ञी सीधे सादे शब्दों का अर्थ हम आप आसानी से समझ लेते हैं पर महापुरुषों और सन्तों के शब्दों से अमृत की वर्षा होने लगती है। स्वामी रामदास ने इन शब्दों द्वारा पिताजी के विराट व्यक्तित्व का दर्शन कराया है।” “सत्य है स्वामी।” महारानी ने कहा। “येसू श्रीमान योगी, ज्ञानी राजा जैसी अमर विरुदावली इस महायोगी ने केवल शिवाजी महाराज के लिए ही गढ़ी है। ये विरुदावलियाँ इतनी सटीक हैं कि यदि अन्य व्यक्ति इन विरुदावलियों का धारण करे तो उपहास का पात्र हो जाएगा।” उन काव्य पंक्तियों में रायगढ़ नरेश और महारानी इतने विभोर हो गये कि आधी रात कब बीत गयी उन्हें पता ही नहीं चला। एक बार पुनः दोनों ने उस पत्र का वाचन आरम्भ किया। तब काव्य की अन्य पंक्तियाँ उन्हें आकर्षित करने लगीं— सम्भाजी :: 341