छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसावधान नित ही रहो दुविधा करो न एक बैठ मुक्त चिन्तन करो राखो अपनी टेक छोड़ उग्रतावृत्ति को सौम्य बनो मन साध औरों की चिन्ता करो क्षमा करो अपराध कार्यभार नित सौंपकर राखो अपने साथ सुखी आश्रित जन करो सबल बनेंगे हाथ शम्भूराजा पढ़ते-पढ़ते रुके। येसूबाई ने पत्र अपने हाथ में ले लिया। वे धीर- गम्भीर स्वर में आगे की पंक्तियाँ पढ़कर सुनाने लगीं- अटका प्रवाह तो पानी रुक जाएगा जन मन की गाँठ से अवरोध बन जाएगा जन मन की प्रीति से प्रवाह चलता रहे तो सारा कार्य भी निरन्तर बनता रहे जन मन की गाँठ से उपेक्षा आपकी होगी आपस में लड़ने से जीत शत्रु की होगी समय की गति देख क्रोध को निवारिये क्रोध आये तो भी निज अन्तर में राखिये उन पंक्तियों का अनेक बार वाचन और मनन किया गया। सम्भाजी राजा और महारानी उसी प्रकार बहुत समय तक बैठे रहे। एक अलग पंक्ति ने मस्तिष्क में हलचल मचा दी थी। बहुत समय के बाद येसूबाई ने कहा, "औंढ़ा के पठार पर घटित घटना का समाचार अनेक बार सुनने में आया था। जिन लोगों की हत्या की गयी थी उनके स्वजन सज्जनगढ़ जाकर स्वामी जी से मिले थे। "वे सारी शिकायतें मैंने सुनी हैं। इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना है कि शिवाजी का पुत्र अपने पिता जैसा नहीं निकला। वह बददिमाग है, कान का कच्चा है, विलासी और पागल है। राज्य डूबेगा, विनष्ट होगा। और कुछ?" शम्भूराजा की मुद्रा अत्यन्त कठोर हो गयी थी। उसी समय येसूबाई ने धीरे से कहा, "विशेष रूप से बाला जी आवजी स्वामी जी के बहुत समीपी और प्रिय शिष्य थे। किन्तु राज्याभिषेक के पहले पन्हाला और रायगढ़ पर जिन लोगों ने खुले आम विद्रोह किया और जिन्हें हमारे लोगों ने परास्त किया, उन सभी के स्वजनों ने स्वामी जी के पास जाकर खूब शिकायतें की हैं।" शम्भूराजा कुछ समय तक मौन भाव से बैठे रहे। तब फिर पत्र को अपनी आँखों के सामने ले आने हुए येसूबाई ने कोमल स्वर में कहा- 342 :: सम्भाजी