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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पृष्ठ 345

"जो भी हो पर इतना तो सत्य है कि इस पत्र को भेजने में स्वामी जी का उद्देश्य मांगलिक और पवित्र ही होगा? इन पंक्तियों को सुनें— जन जन को एकत्र करो और सबमें भर दो ऐक्य विचार टूट पड़ो यवनों पर मिलकर राष्ट्र प्रेम का हो विस्तार जो है उसकी रक्षा कर लो जोड़ो और करो विस्तार उन तरल, पवित्र और मरस पंक्तियों ने शम्भूराजा के मन को फिर से उल्लसित कर दिया। मुख पर से विषाद की छाया मिट चुकी थी। उन्होंने भावुक होकर कहा—"आपकी बात सच है रानी। औरंगजेब के साथ हमारा महासंग्राम चल रहा है। स्वामी जी वहाँ अपने ध्यान, चिन्तन और परमेश्वर की सेवा में लगे हैं। यहाँ के सारे समाचार उन्हें किस प्रकार पहुँच सकते हैं? जिन्हें युद्ध भूमि ही नहीं, किसी भी प्रकार का कोई कार्य ही नहीं है वे ही समय-समय पर उल्टी-सीधी बातें करते रहते हैं। महागनी, मुझे लगता है कि हमें भी अपने मन की बात पत्र द्वारा स्वामी के पास भेजना चाहिए।" "वाह! बहुत खूब!" तब तक भोर बीत चली थी। एक खिड़की से कावले का पहाड़ और दूसरी खिड़की से दूरी पर स्थिर जगदीश्वर के मन्दिर का कलश दिखाई दे रहा था। शम्भूराजा ने उसी समय स्नान, पूजा, अर्चना आदि समाप्त किया। वस्तुतः शयनकक्ष में बगल में पड़ी दुलाई की तरह नींद भी रातभर अलग ही धरी रह गयी थी। खंडो बल्लाल को पहले ही सन्देशा भेजा जा चुका था। पूजा के कपड़ों में शम्भूराजा अपने मन्त्रणा कक्ष में बैठ गये। माथे पर लगा अष्टगन्ध का तिलक अभी ताजा था। गले की तुलसी माला पर हाथ फेरते हुए बल्लाल को एक-एक शब्द बोलने लगे— "प्रति पुण्य श्लोक सन्त रामदास स्वामी गोसावी को क्षत्रिय कुलावतंस शम्भूराजा छत्रपति की ओर से सादर अभिवादन। मराठों को संगठित करने और महाराष्ट्र का विकास और विस्तार करने की आपकी प्रबल इच्छा है। अपने हिन्दवी स्वराज्य और कैलासवासी मेरे पिताजी के प्रति स्वामी जी को अत्यधिक स्नेह था। इसके लिए हम स्वामी जी के प्रति सदैव ही ऋणी रहेंगे। जिन उदात्त शब्दों से स्वामी जी ने पिताजी को गौरवान्वित किया है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सटीक शब्द, गहन भाव और हृदय का माधुर्य शब्दों में इस प्रकार प्रवाहित होता है जैसे केवड़े के पुष्प से सुगन्ध प्रवाहित होती है। स्वामी जी ने जिन गरिमामय शब्दों में बड़े महाराज गौरवान्वित है उसके आगे तो कालिदास और भवभूति भी फीके लगते हैं। अच्छा हुआ जो आपका पत्र समय पर मिल गया। उस समय हम बड़े समुद्री सम्भाजी ३५३