छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्ध की तैयारी में पूरी तरह संलग्न हैं। शिवाजी महाराज के समय के कुछ वरिष्ठ और अनुभवी अष्ट प्रधानों तथा अधिकारियों की हमारे हाथों हत्या हुई है। यह सच है। किन्तु उनके परिजनों द्वारा हत्या के कारणों के जो आरोप मुझ पर लगाये गये हैं, वे सभी बेबुनियाद हैं। हिरोजी काका अन्नाजी दतो जैसे अनुभवी पुरुषों की उँगली पकड़कर हम बड़े हुए हैं। एक समय ये सभी स्वराज्य आधार स्तम्भ रहे हैं। हम बचपन में जब महल में या दरबार में घूमते थे तो उन्हें अपने सगे चाचा के रूप में ही देखते थे। एक ओर हमारे पुण्य प्रतापी पिताजी स्वर्गवासी हो गये थे। दूसरी ओर पागल हाथियों के झुंड की भाँति औरंगजेब हिंदवी स्वराज्य पर आक्रमण कर रहा था। उस समय हमें सहारा देने की जगह अपने-अपने स्वार्थों और अपनी छोटी-मोटी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये कर्मचारी और अधिकारी राजद्रोह पर उतर आये। नौ-दस वर्ष के बच्चे को राजगद्दी पर बिठाने की इनकी मूर्खता मैंने देखी। फिर भी मैंने इन्हें राजद्रोह की सजा नहीं दी। उन्हें निष्कासित करने का सरल रास्ता नहीं अपनाया। उल्टे हमने उन्हें हँसते-हँसते प्रधान पदों की मालाएँ पहना दीं। उन्हें पदभार का सुवर्ण कंगन पहना दिया। उन्हें जिस घोड़े से उतारा था, उसी पर फिर बिठा दिया। राज्य शास्त्र के अनुसार राज्यद्रोह जैसे अक्षम्य अपराध के लिए हमने उन्हें ऊँचे पहाड़ से कूदने के लिए विवश नहीं किया। किन्तु उन्होंने एक बार नहीं बार-बार हमारी थाली में जहर घोला। उनके अपराध के आगे भी राजा को झुक जाना चाहिए क्या ? स्वामी जी, आप कभी भी रायगढ़ पर पधारें। स्वयं सभी प्रकार के कागजात देखें। यदि किसी प्रकार दोष हो तो हमें बतायें। जीजामाता की तरह की युग निर्मात्री स्त्री हमें आजी के रूप में मिलीं। उनके सामने पिताजी के आशीर्वाद से बहुत कम उम्र में ही हमने रायगढ़ का कार्यभार चार वर्ष तक स्वतन्त्र रूप से संभाला। ब्राह्मण होने के नाते कौन लिहाज करता और मराठा होने के नाते कौन चिन्ता करता है ? ऐसे विवेकशील पिता की सन्तान होने का मुझे सौभाग्य मिला। रामायण महाभारत का अध्ययन किया। कालिदास, भवभूति जैसे नाटककारों के नाटकों का पठन किया। देव भाषा आत्मसात की और कोमल ब्रजभाषा के रस सागर में भी डुबकी लगायी। केवल बालाजी पन्त भूल से मारे गये। उस दुख से मुझे इस जन्म में मुक्ति मिलने वाली नहीं है। उस अपराध को तो हम स्वीकार करते ही हैं। किन्तु उनके परिवार को महल में आश्रय देकर उन्हें अपने परिवारजन की तरह ही पाल-पोस रहे हैं। अन्य राजद्रोहियों की बात अलग थी। स्वामी जी, अब तो हिन्दवी स्वराज्य के सीने पर हमारा जन्म-जन्मान्तर का शत्रु औरंगजेब आ बैठा है। उसके साथ पाँच लाख पैदल और चार लाख हाथी- घोड़ों की सेना है, ग्यारह पीढ़ियों की तैमूरों की दौलत भी। फिर भी हम अपने छोटे 344 सम्भाजी