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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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से नवनिर्मित स्वराज्य बचाने के लिए दिन-रात यथासम्भव प्रयत्न कर रहे हैं। आज औरंगजेब की मुगल सेना के प्रचंड प्रवाह को रोकना अपनी छोटी सेना के साथ स्वराज्य की रक्षा करना और अवसर मिलते ही औरंगजेब को समाप्त करना ही हमारा परम धर्म है। यदि इस कालसर्प को समय पर रोका नहीं गया तो इस प्रदेश के गाँवों और गली-मुहल्लों में उसका विष फैलने लगेगा और हमारे पिताजी शिवाजी महाराज के सपनों का महाराष्ट्र टिक नहीं पाएगा। देश धर्म और मिट्टी के ईमान के लिए हम रात-दिन एक कर रहे हैं। अकर्मण्य प्रमादी पुरुषों की भाँति कुटिल और विलासी खेल खेलने का समय किसके पास है? औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर हमारी शरण में आये हैं। उनके साथ मारवाड़ के दुर्गादास राठौर भी हैं। औरंगजेब के विरुद्ध स्वदेशियों को पंक्तिबद्ध करने के लिए हम रात दिन विचार-विमर्श कर रहे हैं। हरसम्भव प्रयास कर रहे हैं। अम्बर के राजा राम सिंह के साथ भी हमारा पत्राचार हो रहा है। इस दिशा में सफलता मिलते ही सबसे पहले आपको सूचित करूँगा। स्वामी जी, वस्तुतः पिछले आठ वर्षों से अपने शरीर में बारूद का भस्म लपेटे हम रणचंडी की पूजा कर रहे हैं। आप अपने मठ के भीतर परमेश्वर के चिन्तन मनन में व्यस्त हैं। बीच में बिलबिलाने वाले कीड़ों का क्या विश्वास करना। मुझे पहाड़ जैसी समस्याओं और दुर्दान्त शत्रुओं का जरा भी भय नहीं लगता। किन्तु आप जैसे महान साधक और पहुँचे हुए सन्त के कानों तक पहुँचने वाले कनखजूरों से मैं बहुत भयभीत होता हूँ। स्वामी जी, हमारे इस धर्मयुद्ध के लिए अपना आशीर्वाद दें। जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को दंडित होने से स्वामी जी को इतना दुख पहुँचा है, उनके बारे में हम इतना ही कहेंगे कि हमारी हर साँस के साथ आज भी हमारा हृदय तड़पता है, रोता है। उन सहकर्मियों की काली करतूतों के कारण विवश होकर बार बार उनके द्वारा राजद्रोह किये जाने के कारण उन्हें हाथी के पैरों तले कुचलवाना पड़ा। " चार ताड़वनों में कौवे चिल्ला रहे थे। नागोठण की खाड़ी के पास शम्भूराजा और कवि कलश का डेरा पड़ा था। शम्भूराजा की प्रातःकाल से ही बहुत देर तक पूजा चलती सम्भाजी :: 345