छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंथी। उनके राजदरबार में आने से पूर्व कवि कलश नियमित रूप से दरबार में आते थे। अपने नियम के अनुसार आज भी वे दरबार में पहले आ गये थे। खाड़ी के निचले हिस्से में शहजादा अकबर का बड़ा तम्बू खड़ा किया गया था। शहजादे को बहुत विलम्ब से जागने की आदत थी। इसलिए उसके नौकर भी देर से ही उठते थे। किन्तु दुर्गादास नित्य की भाँति तम्बू के पास आकर बैठ गये थे। वह शहजादे से बार-बार कहते— "अरे अकबर! कम से कम युद्ध भूमि में जल्दी उठा करो। इन मराठों को देखो, किस तरह घोड़ों पर चलते-चलते रोटी खाते हैं। हर समय युद्ध के लिए तैयार रहते हैं।" "क्या करूँ दुर्गादास ? मेरे शरीर में बादशाही खून है। ये मराठे बंजारों की तरह भटकने वाले लोग हैं। ये किसी भी तरह जी सकते हैं किन्तु बादशाह को तो अपनी शान के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए।" "शहजादे! ये सम्भाजी राजा अपनी सुख सुविधा, अपनी व्यवस्था का कितना ध्यान रखते हैं? उनसे तो सीखो!" दुर्गादास जब भी ऐसा कुछ कहते अकबर हँसकर कहता, "दुर्गादास! आप हिन्दू हो इसलिए इस शम्भूराजा—जमींदार के लड़के के लिए आपके मन में इतना आदर है। लेकिन मैं भविष्य में शम्भूराजा या किसी का भी कोई अहसान अपने ऊपर नहीं रखूँगा। कल जब मैं हिन्दुस्तान का बादशाह बनूँगा, इस बेचारे शम्भू को एक के बदले दो सूबे इनाम में दूँगा।" अकबर इस प्रकार व्यर्थ और फालतू बातें करता तो दुर्गादास अपना सिर पीट लेते थे। कवि कलश फौजी दरबार में बहुत देर से शम्भूराजा की प्रतीक्षा कर रहे थे। शम्भूराजा ने महाड़ के दादाजी प्रभु देशपांडे को प्रातःकाल ही बुलाया था। इसी समय मस्तक पर अष्टगन्ध तिलक धारण किये, तेईस वर्ष के गोरे चिट्टे, पौरुषेय मुद्रा वाले शम्भूराजा फौजी दरबार में पहुँचे। पहरेदारों और दरबारियों ने तत्परता से उनका अभिवादन किया। दरबार में बैठते सम्भाजी राजा की नजर दादजी देशपांडे पर जा टिकी। उन्हें बिना कुछ बोलने का अवसर दिये, शम्भूराजा ने कहा, "देशपांडे काका अपने स्वराज्य के अष्ट प्रधानों में एक सम्मानित स्थान मैंने आपके लिए सुरक्षित रखने का निश्चय किया है।" शम्भूराजा के इस उद्गार से देशपांडे उल्लसित हो गये। दादजी देशपांडे को बड़ी लालसा थी कि अष्ट प्रधानों में उन्हें भी कोई सम्मानित स्थान मिले। दादजी ने कृतज्ञता से शम्भूराजा को नमन किया। शम्भूराजा बोले, "प्रधानों के इस आसन तक पहुँचने के लिए एक आश्वासन देना होगा।" 346 :: सम्भाजी