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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 793 में से

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पृष्ठ 359

परस्पर स्पर्धा कर रहे थे। गाँव के पास समुद्र की गहरी खाड़ी कल कल ध्वनि कर रही थी। सागर में ज्वार आया था और ऊपर आसमान मे बादल भर आये थे। आज का दृश्य कुछ और ही दिख रहा था। पानी में खड़े जंजीरा दुर्ग और किनारे पर स्थित राजपुरी गाँव की दूरी केवल आठ सौ गज थी। राजपुरी के पीछे की पहाड़ी से जंजीरे की सर्पाकार तटबन्दी स्पष्ट दिखाई देती थी। समुद्र से उठने वाली लहरों की प्रतिध्वनि मैदान तक सुनाई देती थी। दुर्ग के चारों ओर तट पर अर्धगोलाकार बुर्ज बने थे। प्रत्येक बुर्ज पर सिद्दी सैनिकों का सजग पहरा लगा रहता था। भूरे बालों वाले हब्शी बड़ी तत्परता से पहरा देते थे। सारा कार्य व्यापार रोज की भाँति चल रहा था। दोपहर ढल चुकी थी। जंजीरे के पिछले हिस्से में अचानक कुछ हलचल हुई। बुर्जों कीं तीन-चार तोपों में पलीते दिये गये। 'धुड़मऽऽ धामऽऽ, धुड़म धामऽऽ' जैसी कानों के पर्दे फाड़ने वाली आवाज सुनाई दी। सिद्दियों ने केवल अपना अस्तित्व घोषित करने के लिए तोपें दागी थीं। इसके तुरन्त बाद 'अल्लाहो अकबरऽऽ दीनऽऽ दीनऽऽ' जैसी गर्जनाएँ सुनाई दीं। राजपुरी के निवासी भयभीत हो गये। किनारे पर जो छोटी-मोटी मराठों की सेनाएँ थीं उनके भी होश उड़ गये। सामने से साठ सत्तर नौकाओं में सिद्दी सैनिक तट की ओर आते दिखाई पड़े। सभी चिल्ला उठे-'आएऽऽ, आएऽऽ, सिद्दी सैनिक आए।' भगदड़ मच गयी। राजपुरी की प्रजा बाहर निकल पड़ी और अपने बाल बच्चों को बचाने का प्रयत्न करने लगी। प्रजा अपनी जान बचाने के लिए पीछे के पहाड़ पर चढ़ने लगी। उस शाम को दो हजार हब्शियों ने हंगामा मचाया। इसलिए राजपुरी में ही नहीं, तट के आसपास की बस्तियों, रेवदंडा, कोलीवाडा, मुरुड, नादगाँव तक सभी छोटी बड़ी बस्ती में कुहराम मचा हुआ था। हब्शियों ने कितने ही गाँव वालों को नंगा किया, माँ-बहनों की इज्जत लूटी, तबेलों से घोड़े खोल लिए। शम्भुराजा के सैनिक चौकी छोड़कर भाग गये। यह देखकर प्रजा को बहुत दुख हुआ। आधी मील लम्बाई और डेढ़ मील की परिधि वाला जंजीरा आज अपनी विजय से उन्मत्त हो रहा था। रात में जंजीरे के बुर्जों पर मशालें जलाई गयी थीं। सामने वाले सिंह द्वार के अगले हिस्से में सिद्दी खैरियत खान और सिद्दी कासिम खान, दोनों भाई खड़े थे। मराठों के भाग जाने और सिद्दी सेना की विजय का समाचार उन तक पहुँच चुका था। खैरियत खान ने पूछा- "कासिम भाई, आज की घड़ी में तो आलमगीर का हुक्म हमारे लिए अल्लाह का हुक्म साबित हुआ।" "बिल्कुल, भाईजान, कल सुबह हम खुद समुद्र के उस पार जाएँगे। शाम तक हमारी विजयी सेना रोहा-याण गाँव तक पहुँच जानी चाहिए।" सम्भाजी : : 357

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