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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 793 में से

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पृष्ठ 371

वहाँ कुछ हलचल सी मची थी। आठ दस मराठे एक राउत से उलझे हुए दिखाई पड़ रहे थे। वह अपरिचित सा दिखने वाला वह राउत रेत और कीचड़ से सना हुआ था। उसकी काँख में एक कसी हुई पोटली दिखायी दे रही थी। रास्ता रोकने वाले सिपाहियों से वह चिल्ला-चिल्लाकर झगड़ रहा था। "छोड़ोऽऽ, छोड़ो मुझे. मुझे ऊपर जाने दो, मुझे महाराज से मिलने दो।" वह राउत अपनी पोटली के साथ आगे को सरक रहा था। किन्तु मराठा सैनिक उसे उसी प्रकार रोके हुए थे जैसे चतुराई से भागते हुए साँप को भाले की नोंक से रोका जाता है। यह देखकर कि उसे छोड़ने के लिए कोई तैयार नहीं है, वह घबरा गया। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। "इस तरह मेरी राह न रोको। सिर्फ एक बार एक बार ही मुझे महाराज से मिलने दो। इस भयानक बाढ़ में एक लकड़ी के टुकड़े से साँप की तरह चिपककर किसी प्रकार यहाँ तक पहुँच पाया हूँ। एक लकड़ी के टुकड़े के सहारे रातभर यह सामने का समुद्र तैरता रहा हूँ।" यह कोलाहल सुनकर शम्भूराजा ने ऊपर से आवाज दी—"छोड़ दो उसकी राह। उसे लेकर हमारे पास आओ।" कोई नहीं समझ पा रहा था कि अब यह कौन-सी नयी समस्या पैदा हो गयी। महाराज की छावनी के सामने वाले सरदार या रक्षक ही नहीं स्वयं कवि कलश भी सम्भ्रांत थे। इतने में बड़े-बड़े डग भरते रास्ते के पत्थरों को पार करते हुए वह राउत महाराज के सामने आ खड़ा हुआ। इस बीच महाराज अपनी छावनी के सामने अस्वस्थ मन से टहल रहे थे। उन्होंने रेत और कीचड़ सने उस शक्तिशाली मराठा मर्द की ओर देखा। उस आदमी की आँखों में उतर आयी अमावस्या को देखकर शम्भूराजा के रोंगटे खड़े हो गये। उसने शम्भूराजा को नमन किया और बोरे की पोटली उनके पैरों के पास रख दी। महाराज के संकेत करते ही उसने उस गठरी को खोला। आँखों के सामने का दृश्य देखकर सभी को पसीना आ गया। उस गठरी में किसी का आधा जला हुआ सिर था। वह भयानक दृश्य देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गये। वह व्यक्ति शम्भूराजा के पैरों पर गिर पड़ा और दुखी स्वर में बोला, "यह सिर कोंडाजी बाबा का ही हैऽऽ।" यह समाचार स्पष्ट होते ही मराठा सवारों और सैनिकों में आनन्द की लहर दौड़ गयी। उन्होंने आपस में मिठाइयाँ बाँटीं। गद्दारों की दुर्दशा ऐसी ही होगी। सभी एक स्वर में आनन्दातिरेक में चिल्लाने लगे—"हर-हर महादेव! हर-हर महादेव।" वह खबरी 'रुको, रुको,' कहकर अपनी रुआँसी आवाज में कुछ कहने का प्रयास कर रहा था। किन्तु उसकी बात सुनने के लिए कोई तैयार ही नहीं था। इसी सम्भाजी 369

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