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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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निकाले गये मुहूर्त को भी पिता से बताया। पिताजी बहुत नाराज हुए। बेटी ने डरते हुए पूछा—'पिताजी, मुहूर्त का गणित ठीक नहीं हुआ क्या'?' "बेटी गणित तो ठीक हुआ है पर निर्णय गलत हो गया।" "वह कैसे?" "पागल बच्ची! गाय कहाँ गयी है, यह कोई कसाई को बताएगा क्या?" 'शत्रुओं को मुहूर्त अवश्य बतानी चाहिए पर वह कुछ निम्न कोटि की होनी चाहिए। अमृतयोग की तरह अचूक नहीं'। कविराज के इस रहस्योद्घाटन से शम्भूराजा का अच्छा मनोरंजन हुआ। किन्तु शीघ्र ही उन्हें एक चिन्ता सताने लगी। जंजीरे में सिद्दी अपने किले को बड़े अभिमान से 'जंजीरे मेहरूब' कहते थे। शम्भूराजा की आँखों के सामने समुद्र में पलीते की तरह धधकते उस चन्द्रकोर की ओर बार बार देख रहे थे। उन्हें लगा कि वहाँ पर पचीस गज ऊँची तटबन्दी नहीं बल्कि पूरी चन्द्रकोर है जो उनके कलेजे में घुसकर भयंकर वेदना दे रही थी। उस दिन की सुबह बड़ी विलक्षण थी। शम्भूराजा ने अपने सभी नौसैनिकों और अधिकारियों को एकत्र बुलाया था। उन सभी को सम्बोधित करते हुए शम्भूराजा बोले, "मित्रो! जिस दिन आप इस जंजीरे पर विजय प्राप्त कर लेंगे उस दिन इस कठिन लड़ाई जीतने के उपलक्ष्य में सभी सैनिकों के हाथ में सोने का कड़ा पहनाएँगे और प्रत्येक के आँगन में आधा सेर सोना डालकर उसका गौरव करेंगे।" शम्भूराजा ने इनाम की अग्रिम घोषणा की तो सेना को विश्वास हो गया कि अब किसी भी क्षण जोरदार आक्रमण का आरम्भ हो जाएगा। वह दिन इसी तरह बीत गया। सन्ध्या समय, सूर्य का लाल गोला समुद्र में कूद गया। अगल बगल के परिसर में नारियल वनों और पहाड़ों से अँधेरा नीचे उतरने लगा। उस सन्ध्या बेला में कुछ समुद्री पक्षी उड़े। वे अशुभ चीत्कार करते हुए तट से समुद्र की ओर उड़ान भरने लगे। उनकी इस अशुभ चीत्कार से शम्भूराजा का मन कुछ विचलित हुआ। दूसरे दिन शम्भूराजा ने शहजादा अकबर के सम्बन्ध में दुर्गादास से पूछताछ की। तब शम्भूराजा को ज्ञात हुआ कि शहजादा रूठकर पाली के पास अपनी छोटी सी छावनी में लौट गया है। सेना आगे के आदेश की प्रतीक्षा कर रही थी। घोड़े भी एक ही तरह का चारा खाते-खाते ऊब चुके थे। शम्भूराजा के डेरे के सामने रखी मोम की जंजीरे की प्रतिकृति उदास लग रही थी। उसकी चमक नष्ट हो चुकी थी। तीसरे दिन शम्भूराजा अपने सहयोगियों के साथ सुबह की खिली धूप में बैठे थे। उस मोम की प्रतिकृति का पुनर्निरीक्षण कर रहे थे। बीच-बीच में वे उस जलदुर्ग पर दृष्टि डालते तो कभी ऊँचे पहाड़ की दाईं ओर निचले हिस्से में खाड़ी की ओर देखते। वार्तालाप के बीच ही उनकी नजर नीचे की खाड़ी की ओर गयी। 368 .. सम्भाजी