छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ के कुछ लोगों को अधिक धन देकर बाबा ने अपनी ओर कर लिया था। कल की आधी रात के समय सभी बारूदखानों को भस्म करने का मुहूर्त था। किले के पिछले दरवाजे के पास एक नाव तैयार खड़ी थी। कार्य सफल होने के बाद जो सौभाग्य से बच जाते उन्हें पिछले दरवाजे से आकर नाव में बैठकर इस ओर निकल आना था। लेकिन ऐन समय पर दिलरुबा साथ आने के लिए हठ करने लगी। वह प्रार्थना करने लगी—"मुझे भी अपने मुल्क मे साथ ले चलो।" "ठीक है, फिर?" "दिलरुबा को अपने साथ ले आना कोंडाजी ने स्वीकार कर लिया। किन्तु उसकी जायरा नाम की एक प्रिय दासी थी। उसके बिना दिलरुबा पानी का घूँट भी नहीं लेती थी। इसलिए अन्तिम समय में दिलरुबा ने उस दासी को भी साथ ले आने का निश्चय किया। बारूदखानों को आग लगाने के एक घंटा पहले दिलरुबा ने जायरा को बता दिया कि कहाँ जाने की तैयारी है। जायरा ने कहा कि मैं अपने कपड़े लेकर शीघ्रता से वापस आती हूँ। ऐसा कहते हुए वह तेजी मे निकली और सीधे खैरियत खान के महल में पहुँच गयी।" "अरे रे!" सारी कहानी सुनकर शम्भूराजा के सभी साथी चिल्ला पडे। कितनो ने तो अपना मुँह पीट लिया। वह मराठा वीर आगे कहने लगा—"दासी से बगावत का समाचार पाते ही किले पर खतरे का घंटा बजने लगा। देखते देखते दो तीन हजार सैनिक हम बारह जनों के पीछे लग गये। हममें से तीन जनों ने बुर्ज के नीचे की ओर छलाँग लगाई, जिनमें दो तो वहीं पर चकनाचूर हो गये। कोंडाजी के साथ आठ जन एक पंक्ति में खड़े किये गये और सपासप तलवार से काट दिये गए। दिलरुबा का गला कासिम ने अपने हाथों से काटा। संयोग से एक दीवार के खड्ढे में मुझे थोड़ी सी जगह मिल गयी और मैं बच गया। अपने सभी बहादुरों के शव को कासिम के कुत्तों ने पैर पकड़कर घसीटते हुए एक जगह इकट्ठा किया। पिछले दरवाजे के बाहर एक चबूतरे पर लकड़ी जलाकर उसी में शवों और सिरों को डाल दिया। वे कुत्ते विजय के नशे में नाचते-नाचते किले की ओर निकल गये। "उसी नशे में उनकी पीठ पीछे का पहरा ढीला पड़ गया और मैं कुछ जंगली लताओं का सहारा लेकर किसी तरह रेंगते हुए नीचे उतरा। वहीं पर मुझे कोंडाजी बाबा का अधजला सिर दिखाई पड़ा। उसी सिर ने एक बार फिर से मेरे शरीर में शक्ति का संचार कर दिया। महाराज, बड़ी कठिनाई से मैं यहाँ तक पहुँचा। मुझे पता था कि आप हमारी राह देखते किले की ओर आँख लगाए बैठे होंगे। यदि मैं यहाँ न पहुँच पाता तो कोंडाजी बाबा और उनके साथियों की वीरता की कहानी आपको कौन सुनाता? आप को तो किसी बात का पता भी न चलता।" यह करुण कहानी सुनते सुनते सभी की आत्माएँ कराह उठीं। अपने कीमती सम्भाजी 371