छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 374, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजसी लिबास की चिन्ता न करते हुए शम्भूराजा नें दुख के आवेग में कीचड़ और मिट्टी से सने उस मराठा वीर को बाँहों में भर लिया। तैरकर आया हुआ वह वीर अभी रोते हुए कह रहा था—"जब भी हम एकान्त में बैठते थे तो कोंडाजी बाबा हमसे कहते थे—'केवल चौंसठ मावले वीरों को लेकर मैंने पन्हाला किले को जीता था और फूल की तरह शिवाजी महाराज के चरणों में चढ़ा दिया था। उसी तरह जंजीरा नाम के इस बदतमीज किले को हमें प्राप्त करना है और अपने युवराज के चरणों में चढ़ाना है। दोस्तो, इसीलिए कहता हूँ कि आखिरी रात यहाँ बारूदखानों के जलने से ऐसा धमाका होना चाहिए कि उसी धमाके से यह किला पानी में चला जाये और उसी धमाके के चमत्कार से मेरा शरीर भी उड़कर समुद्र पार पर्वत पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे शम्भूराजा के चरणों में गिरना चाहिए। मेरी जिन्दगी की यही सबसे बड़ी सार्थकता है।'" इस करुण कथा को सुनकर सभी के कलेजे फट गये। शम्भूराजा के हृदय को बहुत ही गहरा आघात पहुँचा। किन्तु उस सेनानायक ने अपने को सँभाला। आक्रोश के सैलाब को बड़ी कठिनाई से रोकते हुए उन्होंने बाबा के सिर को बड़े सम्मान से पालकी में रखा, उसे ताजे फूलों से ढक दिया। उन्होंने अपने गले से रत्नमाला को खींचकर उसके सारे रत्न कोंडाजी बाबा के सिर के अगल बगल हल्के मे रख दिया। करंजा और जांभुल के औषधीय पत्तों को सिर के चारों ओर रख दिया गया। पालकी उठा ली गयी। सभी राजदूत कोंडाजी बाबा के जन्मस्थान की ओर चल पड़े। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए शम्भूराजा आगे आये। उसे ऊँचे पहाड़ से अपनी जीभ से पानी चाट रहे जालिम जंजीरे को वे देखते रह गये। दुर्गादास राठौड़ कवि कलश का हाथ पकड़कर एक ओर ले गये और धीरे से पूछा—"क्यों जी, तेरह महीने पूर्व निश्चित की गयी इतनी गम्भीर योजना के सम्बन्ध में आपने हमें एक शब्द भी नहीं बताया?" "नहीं जी, मुझे भी कहाँ पता था?" कवि कलश ने अपना सम्भ्रम प्रकट किया। थोड़ी देर पहले जब वह मराठा जवान इस कहानी को सुना रहा था तभी आपके साथ ही मैंने भी पहली बार सुना।" आठ दूसरे दिन की सुबह तोपों के जोरदार धमाकों के साथ हुई। दंडा राजपुरी के परिसर 372 :: सम्भाजी