छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 375, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें घुडूमधम, घुडूमधम, कड़ाडधूमऽऽऽऽऽऽ जैसी कान फाड़ने वाली आवाजों से सारा वन प्रदेश भर गया। तोपों के गोलों से किनारों पर धुओं की लहर उठने लगी। जंजीरे की तटबन्दी पर गिरने वाले तोप के 'गोलों' से वहाँ के पत्थर और चूने चिथड़े होकर पानी में गिरने लगे। परिसर के पंछी भी कहीं दूर अपना घोंसला बनाने के लिए भाग गये। वह तोप का धमाका इतना भयंकर था कि राजपुरी और आगरदांडा में बचे- खुचे लोग भी घबराकर अपना-अपना गाँव छोड़कर भागने लगे। सामानों से भरे छकड़ों, बोरों से लदे बैलों और ऊँटों को निकल जाने के लिए मराठा सैनिकों ने सहायता की। शम्भूराजा द्वारा जंजीरे पर किया गया आक्रमण बहुत भयंकर था। युद्ध भूमि विकराल हो उठी थी। यहाँ तक कि आसपास की मस्जिदों में अजान बन्द थी और मन्दिरों की ओर जाने का किसी में साहस नहीं था। इतने दिनों से पानी में रेंगती हुई नौकाएँ अब आलस छोड़कर पूरी तरह सजग हो गयी थीं। जहाजों पर चढ़ाई गयी तोपों और छोटी-मोटी नौकाओं में गोले बारूद ठूंस ठूंसकर भर दिये गये थे। शम्भूराजा की क्रुद्ध सेना आवेश में बाहर निकली। तांडेल नाविक दल सजग हो गया। काले घने बालों वाले मध्यम ऊँचाई के हब्शी सैनिक मराठों के निशाने पर आने लगे। छोटी मोटी नावों ने जंजीरे के चारों ओर से शिकंजा कसने की शुरुआत की। मराठों द्वारा भयंकर आक्रमण करने का समाचार सवेरे ही हब्शियों को मिल चुका था। सिद्दी खैरियत खान और सिद्दी कासिम खान प्रतिकार की भावना से किले पर नाचने लगे। बारूद भरी तोपों को आगे खींचने में उन्होंने जरा भी प्रतीक्षा नहीं की। हब्शियों का तोपखाना भी उच्चकोटि का था। ये तोपें जहाजों पर अचूक निशाना साधने लगीं। हब्शियों के गोलों-बारूदों से पानी में मराठों की नावें जलने लगीं। जहाजें डूबने लगीं। मराठा नौसैनिक अपने जलते हुए कपड़ों के साथ पानी में कूदने लगे। जिस तरह भी सम्भव बन पड़ा अपने प्राणों की रक्षा का प्रयास करने लगे। मराठों और हब्शियों के बीच एक जल रेखा और एक अग्निरेखा खिंच गयी थी। उस रेखा को दोनो सैन्य दल किसी को पार नहीं करने दे रहे थे। यह देखकर कि किले के आसपास का घेरा नहीं टूट रहा है, शम्भूराजा ने अपनी चाल बदली। उन्होंने फूल पत्तों में छुपाई गयी अपनी सशक्त तोपों को बाहर निकाला। अब मराठों का यह विशिष्ट तोपखाना अपनी आग की जीभ से किले को चाटने लगा। जंजीरे के तट से टकराने वाला एक-एक गोला पौने चार सेर वजन का था। जब निशाना चूककर ये गोले पानी में गिरते तो समुद्र के पेट से पानी की धार वेग से ऊपर उठती सम्भाजी .: 373