छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 376, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर आकाश की ओर मुँह किये पानी में फौवारे नाचते दिखाई पड़ते। जंजीरे के बुर्जों में लगे बड़े-बड़े पत्थर टूटकर नीचे पानी में गिरने लगे। किले का फौलादी किनारा टूटने लगा। तोपों के भयंकर धमाकों से किले के अन्दर धरती हिलने लगी। किले के भीतर बने साठ सत्तर घरों को आग लग गयी। सिद्दी का सुन्दर शीश महल तो चकनाचूर हो गया। छोटे-छोटे रंगीन टुकड़े महल में फैल गये। धुएँ और आग के बीच मचे कोलाहल से हबशी घबरा गये। जिस समय सामने का कमान धराशायी हुई और नगारखाने की दिशा बिगड़ी उसी दिन हब्शियों के जनानखाने में हलचल मच गयी। बेगमें, बच्चे, रक्षिताएँ किला छोड़कर पिछले दरवाजे से बाहर निकले। जो भी जहाज या नाव मिली उसमें बैठकर बाहर भागने लगे। कासिमखान और खैरियत खान डूबते हुए किले को बचाने की हर सम्भव कोशिश करने लगे। किले के सिंहद्वार से उनकी शक्तिशाली तोपें— लांडा कासिम, कलाल बागड़ी और व्याघ्रमुखी आग उगलने लगीं, उन तोपों से होने वाला प्रहार प्रचंड था। मराठों के बड़े जहाजों को भी उन्होंने जलाना आरम्भ किया। इन तोपों से हब्शियों को कुछ राहत अवश्य मिली, किन्तु शम्भुराजा रुकने को तैयार नहीं थे। इस भीषण आक्रमण से सिद्दी बन्धु निराश हो चुके थे। खैरियत खान ने कासिम से कहा "यह सम्भाजी हमारी इतनी हालत खराब करेगा, यदि हम जानते तो मुगलों के मांडलिक बनते ही क्यों ? मराठों की शरण में गये होते तो कम से कम प्राण तो बचते।" जंजीरे के किले का मुख्य आधार सामने वाली खाड़ी के किनारे पर फैला हुआ हब्शियों का अधिकृत प्रदेश था। पृष्ठभाग का यह क्षेत्र रोहा की खाड़ी से लेकर बाणकोट की खाड़ी तक कई कोस में फैला हुआ था। मुरुड, तळा, म्हसला, हरिहरेश्वर, दिवेआगार दिघी जैसा सारा भूभाग हब्शियों के अधिकार में था। बाहर से रसद की आवश्यकता पड़ने पर यह प्रदेश ही हब्शियों के लिए अन्न का भंडार था। इसीलिए सिद्दियों पर दबाव बनाने के लिए शम्भुराजा ने दिघी और आगरदांडा की ओर से जंजीरे की ओर के सभी यातायात को पूरी तरह से रोक दिया था। उस ओर से मराठों की गश्ती नावें और जहाजें किसी को भी जंजीरे की ओर जाने नहीं देते थे। इस प्रकार हब्शियों की पूरी तरह नाकेबन्दी कर दी गयी थी। डेढ़ मील की परिधि के जंजीरे के बीचोबीच पहाड़ी की तरह एक ऊँचा हिस्सा था। उसी पर हब्शियों के किले का ध्वज फहराता रहता था। जब समुद्र की ओर से मराठों ने गोलाबारी शुरू की तो दोनों सिद्दी बन्धु अपनी बचीखुची सेना लेकर उसी बीच वाले पहाड़े की बगल में जा छुपे थे। वहीं गोला बारूद भण्डार 174 सम्भाजी