छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु अब हमें भावावेश में नहीं, बहुत सोच समझकर सुनियोजित ढंग से अत्यन्त सावधानीपूर्वक कदम बढ़ाना होगा। हम ऐसी खूबी से लड़ें कि इसी दक्षिण के जंगल में उस पापी औरंगजेब की कब्र खोद दें। हमें महाराष्ट्र के ललाट पर शिवाजी महाराज द्वारा अंकित हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा करनी है। साथ ही अपने साढ़े तीन सौ किलों और समुद्री जहाजों में से एक भी खोना नहीं है। " अर्जोजी द्वारा बनाये गये मानचित्र की ओर उँगली से संकेत करते हुए शम्भूराजा ने कहा, "हम मराठा लोग केवल सह्याद्रि के जंगलों में छुपकर नहीं बैठे थे। बल्कि कुडाल मालवन से लेकर बसई और तारापुर तक का हब्शियों का सारा क्षेत्र, अपवाद स्वरूप मुम्बई को छोड़कर सम्पूर्ण समुद्रतट, वहाँ के सारे बन्दरगाह, सभी खाड़ियाँ हमारे अधिकार में रहे हैं। कुकड़ी नदी के पास से लेकर नीचे कोल्हापुर, बेलगाँव तक का बारह-बारह चौबीस मावल और अड़तीस नेरे के क्षेत्र में हर नदी, हर पहाड़, हर घाटी पर जगह-जगह हमारी चौकियाँ रात दिन पहरा देती हैं। हमारे सह्याद्रि का प्रत्येक किला वस्तुतः पिघले लोहे का कुंड है।" "महाराज ! फिर भी अपना प्राणतत्व क्या है ?" निलोपन्त पेशवा ने पूछा। "जहाँ सम्भव हो वहाँ तत्काल आक्रमण करना जहाँ सम्भव न हो वहाँ कुछ समय के लिए पीछे हट जाना। हमारा शत्रु होशियार और अनुभवी है। वह यकायक सह्याद्रि पर आक्रमण कर देने की हिम्मत नहीं दिखाएगा। किन्तु यदि उसने आक्रमण कर दिया तो यहाँ की घाटियों में हम मुगल सेना को अच्छा सबक सिखाएँगे।" "परन्तु महाराज ! शत्रु जब तक सह्याद्रि की बाँहों में नहीं आ जाता क्या तब तक हम उसकी प्रतीक्षा करेंगे ?" हंबीरराव ने पूछा। "छि · छि : कतई नहीं।' शत्रु और सर्प को जिन्दा छोड़ना युद्धशास्त्र की दृष्टि से घातक है। यह सच है कि एक ओर मुगलों की पाँच लाख की फौज है और दूसरी ओर हमारे साठ-सत्तर हजार सैनिक। किन्तु इसीलिए हमें रुकना नहीं है। अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियाँ बनाकर मुगलों की सेना और उनके प्रदेशों पर टूट पड़ना है। उन्हें जला-जुलाकर और लूटपाटकर कंगाल करना है। यही हमारी नीति है। हंबीरराव आप पहले की भाँति अपना आग का खेल जारी रखकर मुगलों को अधिक से अधिक हानि पहुँचाएँ।" इस विचार-विमर्श में छोटे से छोटे मुद्दों पर गम्भीरता से चर्चा की गयी। अपने और पराये का विवरण प्रस्तुत किया गया। उसी समय सेनापति हंबीरराव मोहिते बोले, "परम्परा के आधार पर विचार किया जाये तो हैदराबाद का कुतुबशाह, बीजापुर का आदिलशाह, जंजीरे के सिद्दी, दिल्ली के मुगल और पुर्तगाली ये पाँच हमारे प्रमुख शत्रु हैं।" "परन्तु हंबीरराव एक ही समय में सभी शत्रुओं के साथ युद्ध छेड़ना, 386 :: सम्भाजी