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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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“हाथियों के पीलखाने के पास हमारा एक बड़ा बालपरवेशी गृह है। एक बार जाकर देख लो। केवल रायगढ़ पर हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण आदि सभी जातियों और धर्मों के सत्तर बालपरवेशी रहते हैं। उनमें जंजीरा के नये तीस और जुड़ेंगे।” इस यथार्थ को सुनकर दुर्गादास बहुत भावुक हो गये। वे कहने लगे—‘‘वाह शम्भू महाराज! यह दुर्गादास दिल्ली, आगरा, राजपूताना जैसे अनेक प्रदेशों में घूमा है। परन्तु शिवाजी और सम्भाजी महाराज जैसा प्रजाहितैषी राजा, कोई दूसरा देखने को नहीं मिला।” चर्चा आगे चलती रही। युद्ध सम्बन्धी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार-विमर्श के लिए सभी अष्ट प्रधान, सेनापति, नये-पुराने सरदार और राजा के मुख्य सहयोगी उपस्थित थे। दादाजी रघुनाथ देशपांडे ने जंजीरे की लड़ाई अभी तक चालू रखी थी। कोंकण के समुद्रतट पर प्रत्येक बन्दरगाह में पुर्तगाली-मराठा संघर्ष की आग सुलग रही थी। जिस प्रकार कोई सपेरा पूरे घर को विषैला बना देने के लिए अपने साँपों की सभी टोकरियाँ खाली कर देता है उसी प्रकार हिन्दवी स्वराज्य को समाप्त कर देने के लिए मुगलों की फौज बाहर निकली थी। ऐसी परिस्थिति में स्वराज्य के दूसरे छत्रपति सम्भाजी महाराज अपने स्वराज्य के लिए क्या निर्णय लेते हैं? इस पर सभी का ध्यान केन्द्रित था। सम्भाजी महाराज ने अत्यन्त विनम्र शब्दों में कहना आरम्भ किया—‘‘बहादुर जवानों, हम मराठों के लिए पर्वतराज सह्याद्रि वैसे ही जीवन और प्राण के समान है जैसे श्रीकृष्ण के लिए गोकुल था। हमारे पिताजी यही मानते रहे। उन्होंने सह्याद्रि नाम का ही लौह कवच धारण किया था। सह्याद्रि का आश्रय लेकर ही अनेक दाँव- पेंच का प्रयोग करके, हिन्दवी स्वराज्य की सोने-मोतियों की फसल काटी।” ‘‘परन्तु शम्भूजी महाराज! हमारे समय की लड़ाइयाँ बहुत छोटी थीं। किसी की पाँच लाख की फौज तो हमारे सपनों में भी नहीं आयी थी।” युद्ध अनुभवी मालोजी घौड़पड़े ने कहा। ‘‘वही कह रहा हूँ, घौड़पड़े काका।” शम्भूराजा ने दृढ़ शब्दों में कहा, ‘‘जब तक सह्याद्रि नाम का यह लौह कवच हमारे पास है तब किसी की क्या चिन्ता? कल तो पाँच तो क्या दस लाख की फौज का समुद्र हमारे ऊपर चढ़ आये तो भी हम उसे इस सह्याद्रि के कवच से चकनाचूर कर देंगे।” शम्भूराजा के इस आत्मविश्वास से सभी के भीतर स्वाभिमान और वीरत्व की लहर दौड़ गयी। किन्तु आरम्भ में ही उन्होंने सभी को एक संकेत दिया। ‘‘एक बात स्मरण रखो। औरंगजेब की इतनी बलशाली सेना का खुले मैदान में मुकाबला करना हमारे लिए वज्रघात होगा। नेसरी के जंगल में प्रतापराव गूजर ने आदिलशाही फौज पर आक्रमण करके अपने प्राण गँवा दिये। वे अमर हो गये। सम्भाजी :: ३४५