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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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महाराज के सेनापति रहे हैं और उनके प्रिय बहनोई भी। उनसे दो-चार अध्याय तो पढ़े ही हैं।" "मतलब?" "दूसरा एक बन्दा हंबीर बनकर बी गरी का स्वांग किये हमारी भूमिका निभा रहा है। हमारे शत्रुओं को ही नहीं मित्रों को भी यही विश्वास है कि मैं मोर्चे पर मौजूद हूँ।" "वाहऽऽ।" शम्भूराजा ने हंबीरराव की प्रशंसा की।" हंबीरराव की उपस्थिति से सभी में उत्साह आ गया। जिस समय किले पर जोरों की चर्चा चल रही उसी समय रायगढ़ किले की तलहटी में निर्माण कार्य जोरों पर था। नयी सेना गठित की जा रही थी। रायगढ़वाड़ी के अठारह कारखाने रात-दिन युद्ध सामग्री तैयार करने में लगे थे। पाँचवें दिन दोपहर को प्रमुख व्यक्तियों की बैठक आरम्भ हुई। उसके पूर्व ही कवि कलश राजधानी में वापस आ चुके थे। उन्होंने तोप गोलों का, कच्चे बारूद का, भावी योजना का सारा ब्यौरा शम्भूराजा के सम्मुख प्रस्तुत किया। बैठक शुरू हो गयी किन्तु महारानी येसूबाई अभी भी वहाँ पहुँच नहीं पायी थीं। राजा को अपनी सहचरी महारानी की प्रतीक्षा थी। उसी समय महल के बाहर पैरों की आहट सुनाई दी। महारानी के साथ गयी आठ-दस पालकियाँ वापस आयी थीं। अपनी पाँच महीने की गर्भावस्था में भी बिना किसी का सहारा लिए, अपने को सँभालते हुए येसूबाई बाहर निकलीं। उसी अवस्था में वे आकर बैठक में सम्मिलित हो गयीं। महारानी को कुछ विलम्ब हो जाने से राजा को चिन्ता हुई। उनकी प्रश्नातुर आँखों का भाव समझकर येसूबाई बोली- "जंजीरें की लड़ाई में काम आये चार सौ सैनिकों की सूची आयी थी। उनमें से तीस बालपरवेशी निकले। उनकी व्यवस्था देखने के बाद ही मैं यहाँ आयी।" बैठक में उपस्थित दुर्गादास राठौड़ ने शम्भूराजा की ओर दृष्टि घुमाई। शम्भूराजा ने उन्हें बताया- "हिन्दवी स्वराज्य के लिए जो युद्ध में वीरगति प्राप्त करते हैं उनके बाल-बच्चों की समुचित देखरेख के लिए पिताजी ने बालपरवेशी व्यवस्था आरम्भ की थी। आज भी हम उसका निर्वाह कर रहे हैं।" "बालपरवेशी, यानी क्या?" "युद्ध में जिन बच्चों के पिता काम आते हैं, उनका पालन-पोषण अपने बच्चे की तरह राज्य की ओर से किया जाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर जब तक स्वयं सेना में भर्ती नहीं हो जाते तब तक उनका सारा दायित्व राज्य पर होता है। उनकी माँ का यदि कोई दूसरा सहारा नहीं है तो उसकी भी व्यवस्था बालपरवेशी गृह में की जाती है।" "वाहऽ वाह! बहुत खूब-" 384 : सम्भाजी