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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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चिपकाने का सभी को शौक चढ़ा है।" येसूबाई हल्के से हँसी। अपनी हँसी को दबाते हुए किन्तु बड़े आत्मविश्वास के साथ कहने लगी—"स्वामीजी के सौन्दर्य की प्रशंसा और वाहवाही की एक से बढ़कर एक कहानियाँ आजकल सुनने को मिलती हैं। परसों रायप्पा और जोत्याजी बता रहे थे..." "क्या?" "...स्वामी पर भगवान ने सौन्दर्य का सारा वैभव, सब कुछ इस तरह निछावर कर दिया है कि आजकल स्वामी कहीं शिकार खेलने जाते हैं तो नदी में या किसी खुली जगह पर स्नान नहीं करते। क्योंकि युवराज का कम कपड़ों में गोरा चिट्टा शरीर जादू का असर करने लगता है। कलशे लेकर पानी भरने आने वाली युवतियाँ वहीं पर बेहोश होकर गिर पड़ती हैं। ऐसा चार पाँच बार हो चुका है।" "युवराज्ञी ! ऐसा लगता है कि आपका भी अपने पति राजा पर पूरा ध्यान रहता है।" "मेरे स्वामी में कितने विलक्षण गुणों का समन्वय है। तलवार हो या कलम दोनों ही स्वामी के वश में हैं। दोनों ही तेजी से चलती हैं। दोनों से संगी-साथी और शत्रु-मित्र डरते हैं। सौन्दर्य के बारे में तो कहना ही क्या ? एक बार भूल से भी स्वामी मदन के महल के सामने से गुजरें तो मदनदेवता अपने आसन से तुरन्त खड़े हो जाएँगे और स्वामी का हाथ पकड़कर अपने साथ भोजन पर बिठाकर सम्मानित करेंगे।" "परन्तु येसू, प्रेम करने की ठान लेने पर राजा को कोई कमी रहती है क्या ? सत्ताधीश से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ऐसे दुष्ट नामर्दों की कमी है क्या जो अपनी पत्नियों, जवान बहू-बेटियों का हाथ पकड़कर पीछे के दरवाजे से आ जाते हैं। परन्तु एकतरफा प्रेम करके कोई हंसा मेरे लिए पागल हो जाय तो इसमें मेरा क्या दोष है?" येसूबाई शम्भूराजा को एकटक देखने लगी। पवन की गति तेज हो गयी। झूले में लगी जंजीरों की कड़ियाँ करकराने लगीं। उसी समय किसी जरूरी काम से गोदू पीछे के दरवाजे से आयी। हंसा नाम जब उसके कान में पड़ा तो वह वहीं दीवार के साथ छिपकली-सी चिपककर अपने प्राण को कानों में रोककर सुनने लगी। शम्भूराजा उसी वेग से आगे कहने लगे, "येसू! वह हंसा हर जगह मेरा पीछा करती थी। देखने में वह चित्र जैसी सुन्दर थी। बहुत ही सात्विक स्वभाव की। अण्णाजी काका की पुत्री होने के कारण वह छोटी उम्र से ही राजमहल में खेलती- सम्भाजी :: 37