छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदो-तीन दिन तक घनघोर युद्ध होता रहा। मराठे सीढ़ियाँ लगाकर तटबन्दी पर साहसपूर्व चढ़ने का प्रयास करने लगे। हाथी सिंहद्वार को तोड़ने की कोशिश करने लगे। दोनों दलों में बाणों से, भालों से और गोला-बारूद से युद्ध हो रहा था। घोड़े खून में लथपथ होकर जमीन पर गिर रहे थे। तोपों के गोलों से आहत हाथी तांडव करने लगे थे। उनकी चिंग्घाड़ कान के पर्दे फाड़ रही थी। युद्ध भयानक हो उठा था। तीसरी शाम शम्भुराजा ने कवि कलश को आदेश दिया। उनके आदेश के अनुसार कविराज की तीन सौ तीरन्दाजों की सेना सामने खड़ी हो गयी। शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा- "हमारे मैसूरकर मित्र को बाण बहुत पसन्द हैं। उसे वही देंगे।" परन्तु कविराज के सैनिकों के पास बाँस की फट्टियों के बाण थे। इन बाणों से किसी का क्या बिगड़ने वाला था। अनेक लोग कवि कलश और शम्भुराजा की ओर देखकर हँसने लगे। इसी समय मशालची दौड़ते हुए आये। उन्होंने उन बाणों में कपड़े बाँधे। उन्हें तेल में भिगोकर आग लगाना शुरू किया। अब ये अग्निबाण सूँऽ सूँऽ करके ऊपर चढ़ने लगे। इन बाणों के बारूदखाने में गिरते ही भयंकर आग लग गयी। 'धुड़मऽऽ धामऽऽ, धुद्दूमऽऽ धामऽऽ' की आवाज के साथ विस्फोट होने लगे। किले के ऊपर ही शीशमहल धड़ाधड़ जलने लगा। एक बारूदखाना तटबन्दी के समीप ही था। उसमें इतने जोर का धमाका हुआ कि तटबन्दी ढहकर पानी भरी खंदक में जा गिरी। धुआँ, धूल और आग के कारण होहल्ला मच गया। किले के अनेक सैनिक उस आग में जलकर खाक हो गये। दीवार गिर जाने से किले के अन्दर की भाग-दौड़ साफ दिखाई दे रही थी। किले के सरदारों के बच्चे छाती पीट-पीटकर चिल्लाने लगे। 'कापातिंगऽऽ' 'कापातिंगऽऽ' 'बचाइए' 'बचाइए' 'निरतिंगऽऽ' 'निरतिंगऽऽ' 'रुकिएऽऽ रुकिएऽऽ' इस प्रकार करुण चीत्कार करने लगे। शम्भुराजा के संकेत पर अग्निबाण रुक गये। किला पूरी तरह पराजित हो गया। शम्भुराजा प्रसन्न हुए। हरजी और एकोजी ने राजा की पीठ थपथपायी। श्री रंगपट्टनम के उस पहाड़ी किले पर मराठों का भगवा झंडा पहली बार फहराया गया। इस विजय के बाद शम्भुराजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैसूर, कर्नाटक और तमिल के कुल बाईस किले मराठों के कब्जे में आ गये। एक ओर धर्मपुरी, होसूर का क्षेत्र तो दूसरी ओर नीचे मदुरा से जिंजी बेलूर तक का क्षेत्र मराठों के अधिकार में आ गया था। यह सारा क्षेत्र मराठों के घोड़ों की टापों से प्रतिध्वनित होने लगा। कावेरी में बाढ़ आयी और चली गयी किन्तु वह शिवपुत्र सम्भाजी के पराक्रम के 414 :: सम्भाजी