भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 415

ने दर्शन किया। भगवान का अभिषेक किया गया। परन्तु मन्दिर से बाहर आते समय शम्भूराजा की दृष्टि बार-बार सामने के पहाड़ की चोटी से टकरा रही थी। वहाँ के बुर्जों पर खड़े पहरेदार दिखाई पड़ रहे थे। राजा की उदास मुद्रा को देखकर हरजी राजा ने कहा, "शम्भूराजा, इस समय किले पर आक्रमण करना धोखादायक है। वहाँ पर मदुरेकर नायक चोक्कनाथ रहता है।" और कुछ दिनों तक किले के आसपास छोटी मोटी लड़ाइयाँ होती रहीं। किन्तु दोनों सेनाएँ एक दूसरे की शक्ति का सही अन्दाजा लगा रही थीं। किले की तलहटी में सात आठ एकड़ का एक तेपाकुलम नाम का तालाब था। वहाँ कावेरी के पानी में मराठा सैनिक आराम से स्नान करते थे। बीच-बीच में वे किले की ओर ललचायी दृष्टि से देख लिया करते थे। थोड़े दिनों में ऊपर किले में रहने वाले राजा चोक्कनाथ नायक की मृत्यु हो गयी। नायक दीवान शम्भूराजा से मिलने आया। वह अपने राजा चोक्कनाथ के शव को राजधानी मदुरई ले जाने की आज्ञा माँगने लगा। शम्भूराजा ने बड़े उदार मन से उसे अनुमति दे दी। बसप्पा संकेत से शम्भूराजा को बुलाकर एक ओर ले गया। उसने धीरे से कहा, "शम्भूराजा, समय अच्छा है। राजा का शव बाहर ले जाने के लिए सिंहद्वार खुलेगा। इस अवसर को हम हाथ से जाने नहीं देंगे, अपनी सेना अन्दर ले जाएँगे।" शम्भूराजा ने रुष्ट होकर हुक्केरीकर की ओर देखा। उन्होंने कहा, "बसप्पा, हम राजा हैं, कोई चोर डकैत नहीं।" शम्भूराजा बहुत सावधान थे। एकोजी राजा कुछ चिंतित थे। उन्हें मैसूर के राजा का भय सता रहा था। हरजी महाड़िक और कवि कलश के घोड़े रातभर नगर की सीमा पर घूमते रहे। त्रिचनापल्ली जैसी समृद्ध नगरी मराठों के अधिकार में आना चिक्कदेव से सहन नहीं होगा। वह किसी भी क्षण आक्रमण करेगा। ऐसी चर्चा चल रही थी। चार-आठ दिन तक कुछ भी नहीं हुआ। उसके बाद आसमान में काले मेघों ने भविष्य का भय दिखाना आरम्भ कर दिया। एक दिन शम्भू महाराज ने अपने घोड़े को बाहर निकाला और ललकारा— 'हरऽ हरऽ महादेव' 'जय शिवाजीऽऽ' 'जय सम्भाजीऽ' जैसे नारों से आसमान गूँजने लगा। दस हजार की सेना ने उस पाषाणी किले को घेर लिया। किला बहुत बड़ा और खड़ी ऊँचाई उसकी ऊँचाई। सौ गज थी। किनारों पर बहुत मजबूत तटबन्दी थी और उसके बाद पानी से भरी गहरी खन्दक। मराठी और कन्नड़ सैनिक आगे बढ़े। अन्दर की सेना बुर्ज पर आ गयी। वहाँ से उन्होंने बाणों की वर्षा आरम्भ की। मराठा, हैदराबादी और हुक्केरीकर सैनिकों ने चमड़े के लिबास का सहारा लिया। इसलिए बाणों का उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ। सम्भाजी :: 413

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास) · पृष्ठ 415, कुल 793 में से · BharatKosha