छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछाया पानी की सतह पर फैली थी। कुछ मराठे नावों में कूद पड़े। उनमें से अनेक ने घोड़ों की लगाम हाथ में पकड़ रखी थी। ये नाव के सहारे तैरकर दूसरे किनारों पर जाने वाले थे। यहाँ के जंगलों में हाथी बहुत थे। हरजी राजा ने पाँच सौ हाथियों का दल तैयार किया था। उनकी पीठ पर भारी सामान लादा गया। शाम से सुबह तक नदी तट पर बड़ी व्यस्तता और हलचल रही। मशाल की रोशनी में शम्भूराजा की मुद्रा दृढ़ संकल्पी लग रही थी। उन्होंने कावेरी के दूसरे किनारे पर सोई हुई त्रिचनापल्ली नगरी और वहाँ की ऊँची पहाड़ी की ओर देखा। पहाड़ी की वह चोटी उन्हें रायगढ़ की चोटी जैसी लग रही थी। उन्होंने हँसते हुए हरजी राजा की ओर देखा। संकेत मिलते ही नावें पानी को काटते हुए सर-सर आगे बढ़ने लगीं। पतवारें हिलने लगीं, पानी से छपाक, छपाक की आवाज उठने लगी। उथले पानी का अन्दाजा लगाकर महावतों ने हाथियों को पानी में उतारा। वे जल्दी जल्दी आगे बढ़ने लगे। शम्भूराजा की चतुरंगिणी सेना सुबह होते-होते त्रिचनापल्ली से जा टकराई। अचानक हुए इस आक्रमण से अन्दर की सेना डर गयी। 'ऐदिरीऽ, ऐदिरीऽ' 'दुश्मनऽ दुश्मन' 'मराठाऽ मराठाऽ' ऐसी आवाज अन्दर से आने लगी। पर वे लोग जल्दी से उठ गये और तटबन्दी के बुर्ज पर खड़े हो गये। उनके जानलेवा तेज बाण सूंऽ सूंऽ करके छूटने लगे। अब तक पूरी तरह सवेरा हो चुका था। चिक्कदेव की सेना बाणों की वर्षा कर रही थी। किन्तु मराठे और उनकी साथी पीछे नहीं हट रहे थे। बुर्ज के कन्नड़ और तमिल सैनिक अवाक् होकर आगे देखने लगे। नावों की ओर चर्मधारी सेना थी। राजा ने सिपाहियों के लिए मोटे चमड़े के लिबास और सिर के लिए चमड़े के टोप बनवा दिये थे। आने वाले बाण नाकाम हो रहे थे। तेल लगे उन चमड़ों पर से नीचे फिसल रहे थे। चिक्कदेव के आदेश के अनुसार शस्त्रों के उपयोग का कोई लाभ नहीं हो रहा था। नाव पर शम्भूराजा, हरजी महाड़िक और इक्केरीकर मुस्करा रहे थे। चढ़ती धूप के साथ रणचंडी ने उग्र रूप धारण किया। त्रिचनापल्ली की सेना को पीछे खदेड़ने लगी। हाथी और हाथी जितना शक्ति रखने वाले मराठे भीतर घुसने लगे। प्रवेश द्वार के दरवाजे पर हाथियों ने टक्कर मारी। इन टक्करों से दरवाजे टूट गये। मराठा मित्रों की सेना अन्दर प्रवेश कर गयी। हर ओर संघर्ष होने लगा। शाम तक त्रिचनापल्ली शहर जीत लिया गया। विजेता शम्भूराजा को हँसी आयी। उसी शाम शम्भूराजा, हरजी महाड़िक, एकोजी, कलश सभी की पालकियाँ श्रीरंगमाला पहुँच गयीं। उनमें से एक पालकी में शम्भूराजा की बड़ी बहन अंबिका बाई थीं। वह अपने पराक्रमी छोटे भाई की ओर बड़े अभिमान से देख रही थीं। कावेरी और कोलडिम नदी के संगम पर शेष शैया पर लेटे भगवान विष्णु का सभी 412 :: सम्भाजी