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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

ने दर्शन किया। भगवान का अभिषेक किया गया। परन्तु मन्दिर से बाहर आते समय शम्भूराजा की दृष्टि बार-बार सामने के पहाड़ की चोटी से टकरा रही थी। वहाँ के बुर्जों पर खड़े पहरेदार दिखाई पड़ रहे थे। राजा की उदास मुद्रा को देखकर हरजी राजा ने कहा, "शम्भूराजा, इस समय किले पर आक्रमण करना धोखादायक है। वहाँ पर मदुरेकर नायक चोक्कनाथ रहता है।" और कुछ दिनों तक किले के आसपास छोटी मोटी लड़ाइयाँ होती रहीं। किन्तु दोनों सेनाएँ एक दूसरे की शक्ति का सही अन्दाजा लगा रही थीं। किले की तलहटी में सात आठ एकड़ का एक तेपाकुलम नाम का तालाब था। वहाँ कावेरी के पानी में मराठा सैनिक आराम से स्नान करते थे। बीच-बीच में वे किले की ओर ललचायी दृष्टि से देख लिया करते थे। थोड़े दिनों में ऊपर किले में रहने वाले राजा चोक्कनाथ नायक की मृत्यु हो गयी। नायक दीवान शम्भूराजा से मिलने आया। वह अपने राजा चोक्कनाथ के शव को राजधानी मदुरई ले जाने की आज्ञा माँगने लगा। शम्भूराजा ने बड़े उदार मन से उसे अनुमति दे दी। बसप्पा संकेत से शम्भूराजा को बुलाकर एक ओर ले गया। उसने धीरे से कहा, "शम्भूराजा, समय अच्छा है। राजा का शव बाहर ले जाने के लिए सिंहद्वार खुलेगा। इस अवसर को हम हाथ से जाने नहीं देंगे, अपनी सेना अन्दर ले जाएँगे।" शम्भूराजा ने रुष्ट होकर हुक्केरीकर की ओर देखा। उन्होंने कहा, "बसप्पा, हम राजा हैं, कोई चोर डकैत नहीं।" शम्भूराजा बहुत सावधान थे। एकोजी राजा कुछ चिंतित थे। उन्हें मैसूर के राजा का भय सता रहा था। हरजी महाड़िक और कवि कलश के घोड़े रातभर नगर की सीमा पर घूमते रहे। त्रिचनापल्ली जैसी समृद्ध नगरी मराठों के अधिकार में आना चिक्कदेव से सहन नहीं होगा। वह किसी भी क्षण आक्रमण करेगा। ऐसी चर्चा चल रही थी। चार-आठ दिन तक कुछ भी नहीं हुआ। उसके बाद आसमान में काले मेघों ने भविष्य का भय दिखाना आरम्भ कर दिया। एक दिन शम्भू महाराज ने अपने घोड़े को बाहर निकाला और ललकारा— 'हरऽ हरऽ महादेव' 'जय शिवाजीऽऽ' 'जय सम्भाजीऽ' जैसे नारों से आसमान गूँजने लगा। दस हजार की सेना ने उस पाषाणी किले को घेर लिया। किला बहुत बड़ा और खड़ी ऊँचाई उसकी ऊँचाई। सौ गज थी। किनारों पर बहुत मजबूत तटबन्दी थी और उसके बाद पानी से भरी गहरी खन्दक। मराठी और कन्नड़ सैनिक आगे बढ़े। अन्दर की सेना बुर्ज पर आ गयी। वहाँ से उन्होंने बाणों की वर्षा आरम्भ की। मराठा, हैदराबादी और हुक्केरीकर सैनिकों ने चमड़े के लिबास का सहारा लिया। इसलिए बाणों का उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ। सम्भाजी :: 413

दो-तीन दिन तक घनघोर युद्ध होता रहा। मराठे सीढ़ियाँ लगाकर तटबन्दी पर साहसपूर्व चढ़ने का प्रयास करने लगे। हाथी सिंहद्वार को तोड़ने की कोशिश करने लगे। दोनों दलों में बाणों से, भालों से और गोला-बारूद से युद्ध हो रहा था। घोड़े खून में लथपथ होकर जमीन पर गिर रहे थे। तोपों के गोलों से आहत हाथी तांडव करने लगे थे। उनकी चिंग्घाड़ कान के पर्दे फाड़ रही थी। युद्ध भयानक हो उठा था। तीसरी शाम शम्भुराजा ने कवि कलश को आदेश दिया। उनके आदेश के अनुसार कविराज की तीन सौ तीरन्दाजों की सेना सामने खड़ी हो गयी। शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा- "हमारे मैसूरकर मित्र को बाण बहुत पसन्द हैं। उसे वही देंगे।" परन्तु कविराज के सैनिकों के पास बाँस की फट्टियों के बाण थे। इन बाणों से किसी का क्या बिगड़ने वाला था। अनेक लोग कवि कलश और शम्भुराजा की ओर देखकर हँसने लगे। इसी समय मशालची दौड़ते हुए आये। उन्होंने उन बाणों में कपड़े बाँधे। उन्हें तेल में भिगोकर आग लगाना शुरू किया। अब ये अग्निबाण सूँऽ सूँऽ करके ऊपर चढ़ने लगे। इन बाणों के बारूदखाने में गिरते ही भयंकर आग लग गयी। 'धुड़मऽऽ धामऽऽ, धुद्दूमऽऽ धामऽऽ' की आवाज के साथ विस्फोट होने लगे। किले के ऊपर ही शीशमहल धड़ाधड़ जलने लगा। एक बारूदखाना तटबन्दी के समीप ही था। उसमें इतने जोर का धमाका हुआ कि तटबन्दी ढहकर पानी भरी खंदक में जा गिरी। धुआँ, धूल और आग के कारण होहल्ला मच गया। किले के अनेक सैनिक उस आग में जलकर खाक हो गये। दीवार गिर जाने से किले के अन्दर की भाग-दौड़ साफ दिखाई दे रही थी। किले के सरदारों के बच्चे छाती पीट-पीटकर चिल्लाने लगे। 'कापातिंगऽऽ' 'कापातिंगऽऽ' 'बचाइए' 'बचाइए' 'निरतिंगऽऽ' 'निरतिंगऽऽ' 'रुकिएऽऽ रुकिएऽऽ' इस प्रकार करुण चीत्कार करने लगे। शम्भुराजा के संकेत पर अग्निबाण रुक गये। किला पूरी तरह पराजित हो गया। शम्भुराजा प्रसन्न हुए। हरजी और एकोजी ने राजा की पीठ थपथपायी। श्री रंगपट्टनम के उस पहाड़ी किले पर मराठों का भगवा झंडा पहली बार फहराया गया। इस विजय के बाद शम्भुराजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैसूर, कर्नाटक और तमिल के कुल बाईस किले मराठों के कब्जे में आ गये। एक ओर धर्मपुरी, होसूर का क्षेत्र तो दूसरी ओर नीचे मदुरा से जिंजी बेलूर तक का क्षेत्र मराठों के अधिकार में आ गया था। यह सारा क्षेत्र मराठों के घोड़ों की टापों से प्रतिध्वनित होने लगा। कावेरी में बाढ़ आयी और चली गयी किन्तु वह शिवपुत्र सम्भाजी के पराक्रम के 414 :: सम्भाजी

आड़े न आ सकी। अनेक जगहों से वसूली एकत्र की जा रही थी। एकत्र किये गये द्रव्य की गठरियाँ घोड़ों और बैलों की पीठ पर लादकर रायगढ़ को भेजी जा रही थीं। चिक्कदेवराजा को दुबारा सम्भाजी का सामना करने का साहस नहीं हुआ। तिलुगा, कोडग और मलायला जैसे दाक्खिनी राजाओं ने चिक्कदेव का साथ छोड़ दिया था। वे मराठों के मित्र बन गये थे। शम्भूराजा को वे कर दे रहे थे। मराठों के गुप्तचर चारों ओर घूमते थे। चिक्कदेव ने औरंगजेब को पत्र लिखकर कहा था— 'दक्षिण में आकर सभी को कष्ट देने वाले सम्भा को काबू में करो। हमारी सहायता के लिए शीघ्र आओ।' पर जाने क्यों बादशाह की ओर से उन पत्रों की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। शम्भूराजा ने दशहरे का सोना त्रिचनापल्ली में ही लूटा। उनकी सेना आस- पास से शीघ्रतापूर्वक कर वसूल कर रही थी। दशहरा बीत गया फिर भी शम्भूराजा वापस महाराष्ट्र लौटने का नाम नहीं ले रहे थे। उनकी उपस्थिति से दक्षिण के अमीर उमराव निश्चिन्त हो गये थे। चिक्कदेव को कर देना बन्द कर दिया था। कर न मिलने से चिक्कदेव बौखला गया था। उसकी स्थिति का पता शम्भूराजा को लगा तो उन्होंने अपने गुप्तचरों से चिक्कदेव के पास सन्देश भिजवाया—'हम कर्नाटक और तमिल राज्य पर शासन करें, ऐसी हमारी पिताजी की इच्छा थी। हमारे चाचा एकोजी राजा जैसे चाचा और हरजी राजा जैसे जीजा यहीं पर हैं। हम उस सह्याद्रि के जंगल में वापस क्यों जायें? हम यहीं पर आनन्द से रहेंगे।' इस सन्देश से चिक्कदेवराजा डर गया। उसने बिना शर्त समझौते की बातें शुरू कीं। दीवाली के बाद त्रिचनापल्ली के पहाड़ी किले में सौ खंभों वाले सभागार में समझौता वार्ता निश्चित की गयी। उसके लिए दो करोड़ की पूँजी लेकर चिक्कदेवराजा स्वयं आने वाला था। समझौता वार्ता का दिन आ गया। चिक्कदेवराजा के बदले उसका ग्यारह साल का छोटा बेटा चिक्कदेव के हस्ताक्षर वाले कागजात लेकर आया। वह दो करोड़ के स्थान एक करोड़ की पूँजी लेकर आया था। शेष द्रव्य बाद में देने का वादा किया गया था। अपना राज्य छोड़कर इतने दिनों तक दूर रहना शम्भूराजा को भी ठीक नहीं लग रहा था। अन्ततः समझौता हो गया। अपनी दक्षिण की विजय में यशस्वी होकर शम्भूराजा महाराष्ट्र की ओर जाने के लिए निकले। सेना में इस बात की चर्चा हो रही थी कि चिक्कदेव समझौता वार्ता के लिए क्यों नहीं आया। लोगों ने अनुमान लगाया कि उसे किसी ने बताया होगा कि सम्भाजी उसी शिवाजी के पुत्र हैं जिसने अफजल खान को मिलने के लिए बुलाया था। अफजल खान धोखा खा गया था इसीलिए चिक्कदेव ने ऐन वक्त पर अपना इरादा बदल लिया। सम्भाजी :: 415

त्रिचनापल्ली की सीमा पर आने पर शम्भूराजा ने हरजी राजा को बाँहों में भर लिया। उम्र में छोटे शम्भूराजा को हरजी और अम्बिका दीदी ने असंख्य आशीर्वाद दिये। हरजी ने कहा, "शम्भूराजा, रायगढ़ और हिन्दवी स्वराज्य आपके हाथ में सदा सुरक्षित रहे।" शम्भूराजा ने भावुक होकर कहा, "दुर्भिक्ष के कारण आजकल अपना राज्य जर्जर हो गया है। जीजाजी आप दक्षिण रसद आपूर्ति सँभालें। फिर दस औरंगजेब भी हमारे ऊपर आक्रमण करें तो भी उसकी परवाह कौन करता है?" दस शम्भूराजा कर्नाटक की लड़ाई के बाद वापस आ गये थे। झंडे लगाकर उनका जोरदार स्वागत किया गया। आते आते ही शम्भूराजा ने येसूबाई को धन्यवाद दिया और बोले, "रानी साहब, हरजी राजा को दक्षिण का सूबेदार बनाने की आपकी सलाह बहुत उचित सिद्ध हुई। वरना मुझे तो यही लग रहा था कि हम पुराने कर्मचारी हणमन्त के साथ अन्याय कर रहे हैं। इस संवाद से येसूबाई प्रसन्नता से खिल उठीं। शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में यह भी कहा कि निंबालकर और शिर्के जैसे लोगों से महाड़िक कहीं अच्छे हैं। दो ही दिनों के बाद दुर्गादास राजा से मिलने आये और धीमी आवाज में कहने लगे— "शम्भूराजा शहजादा अकबर की प्रार्थना कुछ अलग है।" "क्या है?" "उनका कहना है कि आप शहजादे के साथ दिल्ली चलें।" "रायगढ़ को छोड़कर ? औरंगजेब जैसा अजगर मुँह खोलकर बैठा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे जा सकते हैं?" "वे कहते हैं कि आप कर्नाटक-जिंजी तक इतना बड़ा युद्ध लड़कर कैसे आ गये?" "वह वर्षा का मौसम था दुर्गादास ! मेरे पिता द्वारा जीते गये क्षेत्र में गड़बड़ी चल रही थी। उसे समय रहते ठीक करना आवश्यक था।" "महाराज, शहजादे के साथ कम से कम सेना तो दीजिए।" "दुर्गादास, आपकी समझ में यह क्यों नहीं आता? हमारे हिन्दवी स्वराज्य की, उसकी प्रतिष्ठा की ध्वजा भले ही आकाश में उड़ रही हो। किन्तु हमारा 416 :: सम्भाजी

स्वराज्य बहुत छोटा है। हमारी साधन-सामग्री सीमित है। बड़े महाराज के समय से आज तक हमारी सेना कभी भी सत्तर-पचहत्तर हजार से आगे नहीं गयी। औरंगजेब की सैनिक शक्ति हमसे सात-आठ गुना अधिक है। द्रव्य, साधन सामग्री और हाथी-घोड़ों की संख्या तो बहुत अधिक है। " दुर्गादास ने गर्दन नीचे झुका ली। तब शम्भुराजा ने कहा- "इस तरह नाराज न हों दुर्गादास। एक बार इस महासंग्राम में फँसे हमारे पैर एक बार बाहर निकल जायें तो आपकी ओर ध्यान देना हमारे लिए सम्भव होगा।" दुर्गादास ने उत्तर के हिन्दू राजाओं, जमींदारों, कुछ मुसलमान और राजपूत सरदारों की सूची पढ़कर सुनाई। इस पर कवि कलश, दुर्गादास और शम्भुराजा में वाद-विवाद हुआ। बीच में ही शम्भुराजा ने कहा- "हमारा पुर्तगालियों से अघोषित युद्ध चल रहा है। यदि आवश्यक हुआ तो आपको और शहजादे को गुजरात के रास्ते बाहर निकलना पड़ेगा आप तैयारी रखें।" "हम उत्तर की ओर जाने के लिए कब से व्यग्र हैं।" दुर्गादास ने कहा। "आज की बैठक में शहजादे नहीं पहुँच पाये?" राजा ने पूछा। "महल में आराम कर रहे हैं।" दुर्गादास ने कहा। "महाराज, शहजादे ने आपके लिए सन्देशा भेजा है। उनका कहना है कि उन्हें विचार विमर्श की जगह प्रत्यक्ष कार्य करना पसन्द है। अपने घोड़े तैयार रखें, हम उन्हें दिल्ली ले जाएँगे।" इस सन्देश को सुनकर शम्भुराजा और उनके बाद दुर्गादास भी हँसे। शम्भुराजा ने कहा, "यदि ये शहजादे सचमुच बातों से अधिक कार्य में विश्वास रखने तो कितना अच्छा होता?" कहते-कहते शम्भुराजा मौन हो गये। उन्होंने स्पष्ट किया- "मरे हुए हाथी के चमड़े की भी कीमत होती है। जो भी हो आखिर ये हैं तो शहजादे ही न। यदि हम इन्हें दिल्ली की गद्दी पर बिठाने में सफल हो जायें तो उत्तर के सारे अमलदार शहजादे के प्रेम कारण नहीं औरंगजेब के डर से, कठोर दंड के भय से अकबर के पीछे खड़े हो जाएँगे, विद्रोह करेंगे।" "शम्भू महाराजा, कुछ कीजिए। राजपूताना से हमें अनेक सन्देश आ रहे हैं। औरंगजेब के दानवी जजिया समझौते के कारण मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी धर्मों और जातियों के लोग परेशान हैं। बादशाह के विरुद्ध खड़ा होने वाला कोई मसीहा प्रजा को चाहिए।" "दुर्गादास जी, अम्बर के उस राजा राम सिंह जैसे लोग इस अत्याचार के विरोध में आगे क्यों नहीं आते?" दुर्गादास के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। वे उठकर वकीली महल सम्भाजी 41-

में चले गये। बादशाह औरंगजेब को अपनी प्रचंड सेना के साथ दक्षिण में आये चौदह- पन्द्रह महीने बीत चुके थे। उसे अभी भी अपेक्षा के अनुसार कोई सफलता नहीं मिली थी। इसलिए वह बहुत निराश था। इसके विपरीत शम्भूराजा, हंबीरराव, मानाजी, रूपा जी, निलोपन्त आदि ने महाराष्ट्र में मुगल सत्ता को नष्ट करना आरम्भ कर दिया था। शम्भूराजा ने राजा राम सिंह के सम्बन्ध में कविराज से पूछा- "कविराज, इस अम्बर नरेश से आगरा दौरे के समय हमारी भेंट हुई थी। आप भी उसे पहचानते हैं। कैसा लगता है, वह आदमी आपको?" "राज्य के कार्यों की अपेक्षा उन्हें शिकार का अधिक शौक है।" "फिर भी वे मिर्जा राजा के पुत्र हैं। मिर्जा राजा को औरंगजेब ने बुढ़ापे में कष्ट दिया था। राम सिंह का भी बार-बार अपमान किया है। हमारे आह्वान से यदि वे खड़े हो जाएँ तो अच्छा होगा। कविराज, कुछ करना चाहिए।" राजा राम सिंह द्वारा भेजे गये पहले के पत्र को शम्भूराजा ने कविराज से मँगवा लिया। उन्होंने तत्काल कवि कलश को पत्र लिखने के लिए कहा और स्वयं पत्र संस्कृत भाषा में लिखवाने लगे- 'राजाधिराज अम्बर नरेश राजा राम सिंह को सादर प्रणाम। अपने हिन्दवी स्वराज्य में हमने शहजादा अकबर को आश्रय दिया है। इस सम्बन्ध में सन्तोष व्यक्त करने वाला आपका पत्र मिला। आप सभी हिन्दू हैं और सभी को मिलकर सभी के भले के लिए कुछ करना चाहिए। आपका यह विचार हमारे मन को बहुत भला लगा। किन्तु हम औरंगजेब का विरोध न करके उसकी हुकूमत को स्वीकार करें, आपका यह सुझाव एक राजपूत को शोभा नहीं देता। बादशाह का मांडलिक बनने का प्रस्ताव किसी भी स्वाभिमानी मराठा को स्वीकार न होगा। शिवाजी के पुत्र के लिए तो इसका प्रश्न ही नहीं उठता। आपके पुत्र कृष्ण सिंह को औरंगजेब ने किम निर्दयता से मार डाला? यह बताने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु यदि धर्म की रक्षा और विकास के लिए सभी हिन्दुओं को संगठित करने का उद्देश्य है तो आप जैसे अनुभवी लोगों को इस कार्य के लिए आगे बढ़ना चाहिए। उस दुष्ट औरंगजेब को ऐसा लगने लगा है कि हम हिन्दू तत्व शून्य और दुर्बल हैं। हममें अपने देश और धर्म के प्रति कोई अभिमान नहीं है। बादशाह का यह बर्ताव हमें सह्य नहीं है। हम क्षत्रिय हैं। अपनी धार्मिक भावना और संस्कृति का अपमान हमारा क्षात्र तेज सहन नहीं करेगा। आप अनुभव और उम्र में बड़े हैं। हम अभी नये अनुभवहीन हैं। आपके धर्माभिमान और शौर्य की बातें मैंने सुनी हैं। आप सप्तांग-राज्य सम्पन्न हैं। थोड़ा 418 :: सम्भाजी

साहस दिखायें। उस नीच यवन के अहंकार को मिटाने में हमारी सहायता करें। फिर देखें कि हम किस तरह का दिव्य पराक्रम करते हैं। इस संकट के समय में आप जैसा बलशाली और विवेकवान राजा शान्त कैसे बैठ सकता है? हमें इसी का आश्चर्य हो रहा है। हम अकबर और दुर्गादास को गुजरात के रास्ते उत्तर की ओर भेजने की सोच रहे हैं। हमारी धैर्य और साहस की वृत्ति को आप भी प्रोत्साहित करें। वह पठानों का बादशाह ईरान नरेश अब्बास भी अकबर की सहायता अवश्य करेगा। उसने ऐसा वचन दिया है। कल की यदि अकबर को गद्दी मिली तो उसमें सभी को लाभ होगा। हमारे मन्त्री कवि कलश और जनार्दन पंडित तो आपको अलग से पत्र लिखेंगे ही।' ग्यारह बहुत दौड़ धूप के दिन थे। बागलान की ओर मराठा मुगल युद्ध आरम्भ था। साल्हेर के किले को मुगल सेना ने चारों ओर से घेर लिया था। रामशेज विजित नहीं हो रहा था। बलशाली मुगल सेना को चिढ़ाते हुए सीधी गर्दन किये खड़ा था। वीर हंबीरराव अपनी सेना लेकर भीमा के प्रवाह की ओर प्रवेश कर गये थे। वे अपने अचानक आक्रमण से मुगलों को पीड़ित कर रहे थे। येसूबाई फिर से दरबार में आकर कार्य- भार सँभालने लगीं। उनके पुत्र शाहू राजा वहीं बड़े हो रहे थे। दरबार के कामों, कागजात और हिसाब किताब में खोई येसूबाई महारानी को बीच-बीच में अपने राजकुमार का स्मरण हो आता था। वे उन्हें उठाकर सीने से लगा लेती थीं। आसपास चार-पाँच किलों की देखभाल करके शम्भूराजा शाम को ही महल में आ गये थे। किस किले पर किस चीज की कमी है क्या अधिक है आदि बातों की चर्चा हुई। भोजन के समय भी राजा उदास थे। रात को राजा अपने महल में चौक के झूले पर बहुत देर तक बैठे रहे। पिछले महीने फल्टन के बजाजी निंबालकर का निधन हो गया था। अपने मामा के दुखद निधन की छाया तो उन पर थी ही, किन्तु आज वे बहुत उदास दिख रहे थे। “महाराज, तबियत ठीक नहीं है क्या?” येसूबाई ने धीमे स्वर में पूछा। “हमारे बजाजी मामा बहादुर और साहसी मराठा थे, किन्तु उनका सारा जीवन मुगलों की चाकरी में चला गया।” “जाने दीजिए। अब उन पुरानी बातों को याद करने से क्या फायदा? उनके सम्भाजी :: 419

पुत्र महादजी बाबा आपकी सगी बहन सखुबाई के पति हैं। भविष्य में आप पर यदि कोई विपत्ति आयी तो वे शेर की तरह आपके पीछे खड़े रहेंगे।" अब शम्भुराजा के लिए चुप बैठना असम्भव हो गया। वे दाँत पीसते हुए बोले, "शेर की खाल पहनने वाली लोमड़ी जब सामने आती है तो बड़ी बदसूरत लगती है, येसू।" "मतलब?" "खबर बुरी है पर दुर्भाग्य से सही है—हमारे सगे बहनोई साहब महादजी बाबा मुगलों से मिले हुए हैं ऽऽ।" येसूबाई झट से नीचे झूले पर बैठ गयीं। उनके पेट में गोला उठ गया था। शम्भुराजा ने कहा, "पिता के स्थान पर मुगलों ने महादजी को मनसबदार बनाया है। चार हजार जाति और तीन हजार सवारों की अच्छी मनसब दी है। इसके अतिरिक्त उनके चचेरे भाई को खानजहान की सेना में समाविष्ट कर लिया गया है।" "पर ये लोग इतने बेशर्म कैसे हो गये?" "उस महादजी पर उनके अन्य सम्बन्धियों ने दबाव डाला होगा। उन्होंने कहा होगा कि बादशाह की कृपा को अपनी झोली में डाल लो। यह शिवाजी और सम्भाजी का कल का स्वराज्य कितने दिन सुरक्षित रहेगा?" चार-आठ दिन बीते नहीं कि एक दूसरी बुरी खबर राजधानी में पहुँची। महारानी येसूबाई के चचेरे भाई कान्होजी शिर्के जाकर औरंगजेब से मिल गये। यह खबर सुनकर शम्भुराजा को धक्का लगा। उन्होंने पूछा— "येसू, अब आपके सगे भाई गणोजी राव का क्या है?" येसूबाई ने गर्दन नीचे झुका ली। उन्हें भी इस विषैली हवा पर भरोसा नहीं था। तब शम्भुराजा ने पीड़ा भरे स्वर में कहा— "गणोजी राव तो केवल शरीर से स्वराज्य में घूमते हैं, मन से तो वे कब के मुगलों के राज्य में जा पहुँचे हैं।" रात में शम्भुराजा को नींद नहीं आ रही थी। वे बहुत बेचैन थे। छत में लगी झूमर की ओर देखते हुए शम्भुराजा ने कहा— "येसू मुझे कभी-कभी लगता है कि यह भूमि केवल ज्ञानियों, सन्तों और महन्तों की ही नहीं कृतघ्नों, मक्कारों और दलबदलू लोगों की भी हैं यह केवल राज्य की सेवा के लिए अपना सिर कमल चढ़ा देने वालों की ही नहीं, जमीन के छोटे टुकड़े के लिए, अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए अपने ईमान और स्वराज्य में बेच देने वाले पाजियों की भी है।" येसूबाई बहुत दुखी हुईं। राजा ने दर्द भरे स्वर में पूछा— "एक ही समय में हम क्या-क्या करें? मुगलों की पाँच लाख की सेना की 420 : सम्भाजी

महाबाढ़ का सामना करें या शत्रु से जाकर मिलने वाले इन धोखेबाज लोगों को सँभालें? कुछ भी करके इन दगाबाज लोगों को काबू में ले आना होगा।" येसूबाई अपने आँसू नहीं रोक पायीं। राजा की बाँह पर अपना सिर रखकर उन्होंने कहा, "महाराज क्षमा कीजिये। मेरे मायके वालों ने आपको धोखा दिया है।" शम्भूराजा ने येसूबाई का सिर अपने सीने से लगा लिया। उन्हें थपकी देते हुए वे भारी मन से बोले "आप अपने मायके का क्या लेकर बैठी हैं? अब तो अपना ननिहाल फलटन भी हमारा नहीं रहा। वे लोग औरंगजेब के शरणागत होकर प्रसन्न हैं।" सम्भाजी :: 421

मुकुट-हरण एक आज बादशाह अत्यन्त उदास दिख रहा था। पिता के सम्बन्ध का फायदा उठाते हुए अन्त में असदखान ने पूछा— "बादशाह सलामत, आपकी तबीयत ठीक नहीं है क्या?" "अब बिगड़ने के लिए क्या बचा है वजीरे-आजम ? वह काफिर का बच्चा सम्भा समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। हमारे शहजादे अकबर का कुछ पता नहीं। वे जंजीरे के साथ शेर चीते जैसा बर्ताव करते हैं किन्तु भीतर से वे सम्भाजी से डरते हैं। वह बेवकूफ गोवा का वाइसराय मराठों के विरुद्ध खुली लड़ाई का एलान करने के लिए तैयार नहीं होता। रामशेज का वह नटखट किला इतने दिनों के बाद भी हाथ नहीं आ रहा है। हमारी सल्तनत में कोई अच्छी खबर सुनी है आपने?" "लोग कह रहे हैं कि आपके छोटे शहजादे आजम बीजापुर की सीमा से पन्हाला की ओर वापस चले गये हैं। वहाँ पर उन्होंने मराठों के सेनानायक हंबीरराव को संकट में डाल दिया है।" "लोग तो कुछ भी कहते हैं।" असदखान का उपहास करते हुए बादशाह ने कहा, "हमारे चारों शहजादे, बहादुर, वफादार और साहसी हैं, हम भी ऐसा ही मानते थे। लेकिन क्या फायदा ? सब के सब नादान निकले। वजीरे आजम एक-एक किले से इतनी लम्बी टक्कर देनी पड़ी तो हमारी जिन्दगी कम पड़ जाएगी। बादशाह बूढ़ा, शहजादे नादान और पोते बेवकूफ ! हमारे सारे अमीर उमराव गधे। हमें अब आप में से किसी से कोई उम्मीद नहीं रही।" "लेकिन जहाँपनाह...।" "पहले बताइए कि जयपुर के रामसिंह को भेजे सन्देश का क्या हुआ?" 422 :: सम्भाजी

‘‘दो महीने पहले उन्होंने खत में लिखा है—‘हम स्वयं सम्भाजी को पत्र ‘ लिखकर पीछे रहने के लिए कहेंगे। उनसे कहेंगे कि कम से कम अकबर को तो पकड़कर हमारे हवाले करें।‘’ उसी दोपहर में बादशाह के बड़े शहजादे मुअज्जम और असदखान के बीच विचार-विमर्श हुआ। मुअज्जम ने चिढ़कर असदखान से कहा-‘‘वजीर साहब, हमारे अब्बाजान का संशयी स्वभाव और अविश्वास उनकी परेशानी और हमारी बर्बादी का मुख्य कारण है।’’ ‘‘मतलब?’’ ‘‘मैं और आजम दोनों पैंतालीस वर्ष के हो गये हैं पर अब्बाजान को लगता है कि हम अभी अबोध और अनजान बच्चे हैं। उन्हें किसी पर रंचमात्र का भरोसा नहीं है।’’ ‘‘हमारे आजम को उन्होंने रायगढ़ न भेजकर बीजापुर-कोल्हापुर की ओर क्यों भेजा है? पता है?’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘चौदह साल पहले शिवाजी ने सम्भा को हमारे यहाँ मनसबदार के पद पर रखा था। तब आजम और सम्भा की थोड़ी जान-पहचान हुई थी। रायगढ़ जाने से उस दोस्ती को नयी शुरुआत मिलेगी और दोनों मिलकर बादशाह के विरुद्ध बगावत करेंगे। ऐसा उन्हें शक था।’’ कुछ दिन ऐसे ही बीते। एक दिन पन्हाला से आजम का एक हरकारा आया। बादशाह के दरबार में वह समाचार बताने लगा—‘‘खुशखबरी है हजरत! आजम साहब ने बहुत बहादुरी की है उस हंबीर मरगट्ठे को पूरी तरह कुचल डाला। उनके अनेक सैनिकों को मारकर घायल कर दिया। बहुत बहादुरी दिखाई।’’ हरकारा समझता था कि इस खुशखबरी को सुनकर बादशाह अपनी रत्नों की माला उसे पुरस्कार में दे देगा परन्तु बादशाह ने उसकी बातों पर विशेष ध्यान नहीं दिया। फिर दस दिनों के बाद आजम का एक खास दूत पत्र लेकर दरबार में विजयी मुद्रा में उपस्थित हुआ। वजीर ने उस पत्र को स्वयं पढ़कर बादशाह को सुनाया। उसमें लिखा था—‘अब्बाजान दुश्मन के साथ ढाल तलवार से जोरदार मुकाबला किया। हजरत साहब की खुश किस्मती से दुश्मन के आठ सौ सैनिकों को कत्ल किया। सात सौ को जिन्दा पकड़ा है। प्रमुख स्थानों और छतरियों पर क़ब्ज़ा किया। बहुत बड़ी विजय हासिल की।’ बादशाह ने इस ताजी खबर को सुनते हुए एक बीमार पंछी की तरह आधी आँख खोली। फिर से वह कौड़ियों की माला आँखों से लगाकर अल्लाह के चिन्तन में डूब गया। जब नहीं रहा गया तो वजीर ने बादशाह के कान में कहा, ‘‘बादशाह सम्भाजी :: 423

सलामत, हर बार इस प्रकार चुप रहने से कैसे चलेगा?" "फिर क्या करें?" "शहजादे को इनाम पाने की अपेक्षा है।" "हूँ।" एक क्षण चुप रहकर बादशाह ने मुँह खोला-"मुअज्जम बेटे, इस खत को जरा पढ़ो।" मुअज्जम द्वारा खत को पूरा पढ़ते ही, बादशाह ने रूहूल्लाखान को हुक्म दिया-"इसमें किस-किस ने क्या-क्या बहादुरी की? इसका ब्यौरा मुझे दीजिए।" ये आज्ञाएँ देने के बाद भी वह वजीरे-आलम की ओर देखता रहा। तब बादशाह ने खजांची से कहा, "शौकत मियाँऽऽ, शहजादा आजम की बहादुरी के लिए उसे एक लाख का ईनाम देना है। इसलिए खजाने से वह राशि निकालकर रखिए।" चार-पाँच दिनों में पन्हाला से सच्ची खबर आयी। पहले दो आक्रमणों में सेनापति हंबीरराव जानबूझकर पीछे हट गये थे। शहजादा आजम को उन्होंने अधिक से अधिक अपने प्रदेश में आने दिया था। तीसरी बार उसने खुद आक्रमण किया। अपने प्राण बचाने के लिए शहजादा आजम सातारा के रास्ते नीरा नदी के पार भाग गया।" उस पत्र को अपने उत्साही वजीर को पकड़ाते हुए, बादशाह ने कहा, "क्यों वजीरे-आजम? देखा? इसी वजह से शहजादे की बहादुरी पर हमें यकीन नहीं हो रहा था।" "गुस्ताखी माफ जहाँपनाह। आपका आदेश सुनकर मैंने खजाने से राशि निकाली थी, किन्तु उसे आगे नहीं भेजा। यह कितना अच्छा हुआ।" उस रात बड़ा शहजादा मुअज्जम और वजीर असदखान बहुत देर तक बातें करते रहे। बादशाह के आगे असहाय बने वजीर ने कहा, "बेटे मुअज्जम, मैं बादशाह को जीवनभर अपना उस्ताद मानता रहा हूँ। अभी भी उन्हीं से कुछ सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। "वह कैसे?" "अब यही देखिए न। छोटे शहजादे ने अपनी बहादुरी का पत्र भेजा। उसे बादशाह ने जानबूझकर आपको पढ़ने के लिए दिया। कारण यह था कि यदि उस तरह का पराक्रम छोटे शहजादे ने सचमुच किया हो तो आप भी उससे कुछ सीखें। रूहूल्लाखान को बारीकी से समझने के लिए कहा जिससे घटित घटना की विश्वसनीयता समझ में आ जाय। तीसरी बात, ईनाम के लिए ईनाम देने के लिए खजाने से एक लाख की राशि निकालने को कहा किन्तु बुद्धिमानी से भेजा नहीं क्योंकि इतनी बड़ी रकम व्यर्थ में नष्ट नहीं होने देनी थी। ऐसा बुद्धिमान पिता 424 . - संभाजी

मिलना मुश्किल है। " उस रात बादशाह को थोड़ा-सा बुखार आ गया था। उदयपुरी बेगम रातभर बादशाह के पास बैठी रहीं। उन्होंने मुअज्जम को भी वहीं रोक रखा था। बादशाह को गहरी नींद आयी।, सवेरे उनका चेहरा प्रसन्न दिख रहा था। अवसर पाकर मुअज्जम ने धीरे से पूछा—"अब्बाजान, आदमी को अपनी औलाद पर तो भरोसा रखना चाहिए। कम-से-कम हर बात को अविश्वास से तो न देखें?" औरंगजेब मुस्कराया। अपनी सफेद दाढ़ी पर हल्के से हाथ फेरकर बोला, "बेटे मुअज्जम जिसे हुकूमत का घोड़ा दौड़ाना है उसे अपनी परछाईं की ओर भी संशय से देखना चाहिए।" दो मुंब्रादेवी का दर्शन करके शम्भुराजा बगल की पहाड़ी की चोटी पर चढ़े। उनके साथ कवि कलश, रूपाजी भोसले एवं अन्य सहयोगी थे। उस पहाड़ी की चोटी से राजा ने बाई ओर देखा। दूर घोड़बन्दर किले की दिशा में थाना गाँव के पास सामने की पहाड़ी से लगी विशाल खाड़ी दिखाई पड़ी। वहीं खाड़ी आगे कल्याण बन्दरगाह तक पहुँच रही थी। दाहिनी ओर नारियल के घने जंगलों में थाना और उसके आसपास के गाँव छुपे थे। वहाँ मछुआरों की बस्ती के आसपास सफेद बालू की चमचमाती पर्त दिखाई पड़ रही थी। वहीं पर अपनी तटबन्दी को पानी में डुबोये थाना का किला एक सुस्त राक्षस की तरह खड़ा था। किले की तटबन्दी पर लम्बी टोपी वाले सैनिकों का पहरा था। शम्भुराजा बीच बीच में कल्याण बन्दर की ओर चिन्तित दृष्टि से देख रहे थे। पिछले साल इसी जंगल से मराठों ने रूहूल्लाखान को भगाया था। दो-तीन महीने बाद औरंगजेब का सेनापति रणमस्तखान कल्याण पर आक्रमण करने आया था। चोले, डोंबिवली अंबरनाथ से दूसरी ओर मुरखाड तक का क्षेत्र उसने जलाकर राख कर दिया था। मराठी क्षेत्र पर दहशत पैदा करके कल्याण के बन्दरगाह पर क़ब्ज़ा कर लिया था। "कविराज कल्याण का बन्दरगाह वैश्विक आयात-निर्यात का केन्द्र है। यहीं सम्भाजी :: 425

से ही इस्ताम्बूल, पेरिस, लंदन से लेकर अफ्रीका, जावां. सुमात्रा तक का व्यापार चलता है। इस सोने की लंका को अधिक दिन के लिए औरंगजेब के अधिकार में छोड़ना, उसकी शक्ति को बढ़ावा देना है।" "राजन, एक और मुद्दा भी बड़े महत्त्व का है।" "कौन-सा?" "औरंगजेब के सरदारों का यहाँ पैर जमाकर बैठ जाना अनुचित और धोखादायक होगा। मराठों का कोंकण से नासिक और बाग़लान की ओर जाने का रास्ता दुश्मनों के क़ब्ज़े में आ जाएगा। एक बार रसद पहुँचाना बन्द हुआ कि खानदेश के अपने बीस-पचीस किले अपने आप पके जामुन की तरह हमेशा के लिए औरंगजेब के मुँह में चले जाएँगे। शम्भूराजा ने गर्दन हिलाकर हामी भरी। पहाड़ी से उतरते-उतरते सूबेदार बिट्ठलराव ने राजा और कविराज को जानकारी दी—"महाराज, अभी हाल में समुद्री क्षेत्र में अरबों के जंगेखान और अँग्रेजो के नौसैनिकों में बड़ी अनबन हुई।" "कैसी अनबन सूबेदार?" "अँग्रेजों के प्रेसिडेंट नामक जहाज पर आक्रमण करने के लिए जंगेखान ने अपनी पाँच जहाजें भेजी थीं। उस जहाज को जला देने की अरबों ने पूरी कोशिश की।" "आगे?" "जहाज बहुत बड़ा था। उसका नुकसान भी बहुत हुआ। किन्तु वह डूबा नहीं। इससे मुम्बई के सारे अँग्रेज विचलित हो गये हैं।" "अरब लोग छूट गये?" राजा ने जानना चाहा। "नहीं, नहीं, जंगेखान के तीन जहाज जला दिये गये। आखिर में वे पीछे हटे। कुछ भी हो निलोपन्त पेशवा से पता चला है कि जंगेखान ने अँग्रेजों को अच्छा सबक सिखाया।" शम्भूराजा और कविराज एक दूसरे की ओर देखकर सन्तोष व्यक्त करते हुए हँसे। शम्भूराजा की दृष्टि नीचे तलहटी की ओर गयी। वहीं पर खाड़ी में घुसी हुई पहाड़ी की सूँड़ पर बसा हुआ पारसिक गाँव था। शम्भूराजा ने हाल ही में वहाँ एक किला बनाना आरम्भ किया था। पास खुदाई का काम चल रहा था। वहाँ सैकड़ों की संख्या में कमाठी मजदूर और कारीगर काम कर रहे थे। हाथियों की पीठ पर और ऊँटगाड़ी में लादकर पत्थर इकट्ठे किये जा रहे थे। इन्हीं पत्थरों से पानी के तट पर बड़े-बड़े बुर्जों का निर्माण हो रहा था। 426 :: सम्भाजी

"कविराज, रणमस्तखान की मस्ती मिटाने के लिए ही हम यहाँ आये हैं। पर उससे अधिक पुर्तगाली नाम का मूर्ख शत्रु मुझे सता रहा है।" शम्भूराजा ने चिन्ता व्यक्त की। "सच है राजन, वह गोवा का वाइसराय बातें तो बड़ी मीठी करता है। व्यवहार में भी अच्छा है। तभी तो पुत्ररत्न की प्राप्ति के अवसर पर उसने आपको बधाईपत्र और बालक के लिए पुर्तगाल के कीमती आभूषण भेजे थे।" कविराज के स्मरण दिलाते ही शम्भूराजा मुक्त भाव से हँस पड़े। उन्होंने कहा, "आपने उस कपटी को अच्छी तरह पहचाना। आपको क्या बताएँ। हमारे पुत्र के लिए शृंगारपुर से उसके मामा गणोजी के यहाँ से आभूषणों का उपहार समय पर नहीं पहुँचा किन्तु, इस कपटी मामा का घोड़ा गांगोली के महल में उपस्थित हो गया।" शम्भूराजा उस विशाल खाड़ी, पुर्तगालियों के प्रदेश और बाई ओर अभी मराठों से मुगलों द्वारा अपहृत कल्याण का क्षेत्र देखने लगे। उन्होंने कुछ उत्तेजित होकर पूछा- "कविराज जैसा मैंने कहा था गांवा को दूत भेजा गया या नहीं?" "राजन, इस दिशा से आप सदैव ही निश्चिन्त रहें। अपने दूत अब तक मांडवी नदी पार करके गोवा के राजप्रासाद में पहुँच चुके होंगे।" "क्या सन्देश भेजा है उस वाइसराय को ?" "यही, कि हम मराठा और मुगलों के झगड़े में बिलकुल न पड़ें और आराम से रहें। पुर्तगालियों की अधिकार वाली नदियों से यदि मुगलों की जहाजों का आना जाना आरम्भ हुआ तो शम्भूराजा किसी भी समय गोवा पर आक्रमण करेंगे।" मुंब्रा की पहाड़ी से शम्भूराजा जल्दी जल्दी नीचे उतरने लगे। मुंब्रा का पहाड़ खड़ी चट्टानों वाला था। वहाँ बकरियों का चढ़ पाना भी कठिन था। घोड़ों के वहाँ पहुँचने का तो प्रश्न ही नहीं था। राजा वहाँ के पत्थरों से होते हुए शीघ्रता से नीचे आ रहे थे। पारसिक के किले की हो रही जुड़ाई की ओर बार बार देख रहे थे। पानी की सतह से पचीस फीट की ऊँचाई की प्रचंड चट्टान पर यह किला बनाया जा रहा था। उसकी नीव बहुत मजबूत थी। राजा के सामने समुद्र में लकड़ी की अनेक मजबूत फल्लियाँ बिछाकर उस पर किला जैसा बनाया था। उस पर अनेक तोपें बिठाई गयी थीं। पारसिक किले की पाषाणी तटबन्दी पर भी अनके बुर्जियाँ बनाकर उनमें बत्तियाँ लगाने की व्यवस्था की गयी थी। शम्भूराजा मन से आश्वस्त थे। कल को अगर पुर्तगाली मुगलों से जा मिलें तो उनकी नावों और जहाजों को ध्वस्त करने की तैयारी हो गयी थी। पहाड़ी से उतरने हुए शम्भूराजा ने कवि कलश से पूछा- "कविराज, इस रणमस्तखान का नाम इससे पहले कभी सुना था ?" सम्भाजी : 427

कविकल्श ने राजा की ओर देखा तब राजा स्वयं बताने लगे—"यह रणमस्तखान फन्नी पहले आदिलशाह का सरदार था। पर बाद में मुगलों से मिल गया। कविराज, हमारे पिताजी जालना से पन्हाला जाने के लिए निकले थे। तब इसी ने उनको संगमनेर के जंगल में तीन दिन तक बन्दी बना रखा था।" एक ठंडी साँस लेकर शम्भूराजा ने कहा, "कविराज, एक बात का स्मरण रखिये। उत्तर से मुगल सेना के साथ आये सरदारों की हमें कोई चिन्ता नहीं होती किन्तु, दक्षिण के लोग अधिक खतरनाक हैं।" शम्भूराजा पारसिक किला बनवाने में व्यस्त थे। फिर अनेक मराठा दल सोलापुर क्षेत्र में धावा करते हुए दहशत फैला रहे थे। शहाबुद्दीन खान की सेना के साथ पुरन्दर, शिवापुर और राजगढ़ में निरंतर झड़प हो रही थी। राजा ने केशव त्रिमल, निलो मोरेश्वर पेशवा और रूपाजी भोसले जैसे सरदारों को पुनः कल्याण पर आक्रमण करने के लिए भेजा था। एक समय में बादशाह के साथ राज्य में अनेक स्थानों पर आग का खेल चालू था। इसलिए कुछ प्रशासकीय कार्य भी रुके हुए थे। उन्हें निपटाने के लिए राजा रायगढ़ के लिए निकले। शम्भूराजा ने मुंब्रा के अपने स्थान पर सन्देशा भेजा—"कविराज, पन्हाला में हंबीरराव को तत्काल सन्देश भेजिये और कहिये कि वहाँ का आक्रमण शान्त हो गया हो तो अपने घोड़े तुरन्त कल्याण की ओर ले आइए। बरसात शुरू होने से पहले रणमस्तखान की गर्दन तोड़नी चाहिए।" "और महाराज तब तक हमारे लिए क्या आज्ञा है?" तुकोजी शिंदे ने पूछा। "कल्याण का किला फिर से अपने क़ब्ज़े में लेकर राजा पर उपकार कीजिए। दूसरा क्या है?" राजा ने कहा। पारसिक का किला और खाड़ी की व्यवस्था अपने सहयोगियों को सौंपकर राजा रायगढ़ चले गये। राजा रायगढ़ जा रहे तभी गुप्तचरों ने सूचना दी— "महाराज, वह फिरंगी पलट गया है। थाने की खाड़ी से पुर्तगालियों के जहाज कल्याण की ओर जाने लगे हैं?" "अच्छा तो अपना पारसिक का किलेदार क्या कर रहा है?" राजा ने उसी जगह लगाम खींचकर घोड़ा खड़ा कर दिया। "अपने पारसिक किले की सेना रात-दिन गोले फेंक रही है। उनकी छोटी- मोटी जहाजें और नावें जलाकर खाक कर दी गयीं। पर खाड़ी बहुत बड़ी है। उसकी चौड़ाई भी बहुत है, महाराज।" राजा ने सुझाव दिया—"फिर आप लोग निराश न होना। जितना सम्भव हो फिरंगी को उतना नष्ट कीजिए।" महाराज रायगढ़ पर आए। बहुत दिनों के बाद येसूबाई से भेंट हुई थी। बेटा 428 :: सम्भाजी

शाहू अब एक वर्ष का हो गया था। हाथ-पैर झाड़कर आगे निकल रहे थे। शीघ्र ही चलने की सम्भावना दिख रही थी। अभी चार ही दिन हुए थे कि सेनापति हंबीरराव राजा से भेंट करने के लिए किले पर पधारे। महाराज उन्हें एकटक देख रहे थे। औरंगजेब भी हंबीरराव को 'आसमान में चलने वाला बिजली का गोला' कहकर उनकी तारीफ करता था। बुरहानपुर जैसे समृद्ध नगर में तीन दिन तक चलने वाली लूट हो या खानदेश में की गयी घुड़दौड़ हो, विदर्भ में अकोला और मुतिजापुर तक मुगलों का पीछा करना हो, जुन्नर और अहमदनगर का दौरा ही या अभी-अभी पन्हाला में शहजादा आजम की हार हो, 'हंबीर आयाऽऽ, हंबीर आयाऽ' ऐसा चिल्लाते हुए मुगल सैनिक इधर- उधर भाग जाते थे। थोड़े ही दिनों में कल्याण की ओर से बुरी खबरें आने लगीं पारसिक किले से होने वाली गोलाबारी को पुर्तगालियों ने कोई महत्त्व नहीं दिया। वे अपने संरक्षण में रसद और गोला-बारूद कल्याण की ओर ले जा रहे थे। इतना ही नहीं एक रात को पुर्तगालियों की गोला बारूद मे भरी पाँच जहाजें पारसिक किले पर आक्रमण करने आ गयीं। रातभर पानी के तट पर आग नाचती रही। सुबह होने से पहले ही पुर्तगालियों ने आधे से अधिक किला जलाकर खाक कर दिया था। पुर्तगालियों का यह समाचार सुनकर शम्भुराजा बेचैन हो गये। उन्होंने सेनापति से पूछा-"हंबीरराव, यह फिरंगी मुगलों की थूक चाटने के लिए इतना क्यों नाच रहा है?" "महाराज, आपने भी सुना होगा कि उन दोनों के बीच एक समझौता हुआ है। कोंकण का जितना क्षेत्र मुगल जीतेंगे उसे पुर्तगालियों को देकर, उपकार का बदला चुकाएँगे।" "हंबीरराव पुर्तगालियों और मुगलों को मिलने से पहले उन्हें तोड़ना आवश्यक है। तो तत्काल निकलिए और उन टोपीधारियों को जलाकर राख कर दीजिए।" "जैसी आपकी आज्ञा, महाराज।" हंबीरराव ने अपने पूर्व निश्चित स्थान की ओर न जाकर कल्याण की ओर दौड़ लगाई। हंबीरराव के पहुँचने से पहले रणमस्तखान ने बिठोजी माने नामक मगठा सरदार को बहुत पीड़ित किया था। हंबीरराव के नेतृत्व में बीस हजार सवार और दस हजार की पैदल सेना कल्याण पहुँची। औरंगजेब को पता था कि अकेले रणमस्तखान को मराठे संकट में डाल देंगे इसलिए उसने अपने मौसरे भाई रूहूल्लाखान को रणमस्तखान की सहायता के लिए भेजा। कल्याण की खाड़ी पर युद्ध शुरू हुआ। पानी के किनारे से होने वाले सम्भाजी 429

आक्रमण का उत्तर मराठे बाहर से दे रहे थे। मराठों ने रणमस्तखान की मस्ती उतारने की शुरुआत की। कल्याण और डोंबिवली परिसर से उठने वाला धुआँ और आग की लपटें पुर्तगाली थाने किले बुर्ज से देखते रह गये। मराठों के आक्रमण से रणमस्तखान कठिनाई में आ गया। कभी मुरबाड़ के जंगल से 'हर हर महादेव' का उद्घोष करते हुए मराठे कल्याण बन्दगाह पर आक्रमण करते थे तो कभी दूर मलंगगढ़ की तलहटी से धुआँ उठने लगता था। कल्याण की खाड़ी में दौड़ते हुए घुड़सवारों की परछाइयाँ पड़ रही थीं। कल्याण की तटबन्दी गिर गयी। दुर्गाड़ी किला सूना सूना दिखने लगा। रणमस्तखान पीछे हटकर टिटवाला की ओर चला गया। टिटवाला के घाटी में गजानन की साक्षी में युद्ध आरम्भ हुआ। उसी समय डोंबिवली के शम्भुराजा के आने का समाचार हंबीरराव तक पहुँचा। यह समाचार सुनकर मराठों के शरीर का खून उबलने लगा। कल्याण बन्दरगाह परिसर के पीछे उठता हुआ धुआँ देखकर शम्भुराजा में उत्तेजना आ गयी। उन्हें खाने-पीने की भी सुध न रही। सारा दिन निलोपन्त पेशवा, कवि कलश और मानाजी मोरे की तैयारी चलती रही। शाम को ही आसपास के मछुआरों की बस्ती में खबर भेजी गयी। जंगल के निवासी और डोंबिवली के लोग तमतमा कर खड़े हो गये। सुबह होने के पहले ही मुगल और पुर्तगाली खाड़ी में कूद पड़े। अनेक लोग डूबकर मर गये। रातभर चलने वाली मराठों की भुतही लीला टिटवाला के पहाड़ से साफ-साफ दिख रही थी। रात की यह दहशत मुगलों के भीतर बैठ गयी थी। उस दिन दोपहर को भयंकर युद्ध हुआ। अट्ठावन वर्ष के हंबीरराव के शरीर में हाथी जितनी शक्ति आ गयी। रूहूल्लाखान पर हंबीरराव की सेना तेजी से टूट पड़ी। अकरमखान, इब्राहिम बेग, राजा दुर्गा सिंह, माधोराम जैसे अनेक मुसलमान और राजपूत सरदार लड़ाई मे मारे गये। डरा हुआ रूहूल्लाखान टिटवाला के रास्ते से भागने लगा। किन्तु उसे इस बात का पता न था कि बीस हजार की सेना लेकर स्वयं शम्भुराजा स्वागत के लिए खड़े हैं। भागती हुई रुहुल्ला की सेना के दिखाई पड़ते ही शम्भुराजा ने उन पर आक्रमण किया। संयोग से रणमस्तखान और रुहुल्लाखान दोनों ही घाटी में अटक गये। रात में निश्चित की गयी योजना के अनुसार एक ओर से हंबीरराव और दूसरी ओर से शम्भुराजा ने जोरदार आक्रमण किया। इसमें खान की स्थिति कुचली हुई सुपारी जैसी हो गयी। दोपहर तक खान की सारी सेना नष्ट हो गयी। जिधर भी रास्ता मिला उसी ओर लोग भागने लगे। 'हर हर महादेव ऽ ऽ', 'जय शिवा जी', 'जय सम्भाजी' ऐसा जयघोष करते हुए विजयी सेना डोंबीवेली के अपने शिविर में पहुँची। रास्ते में 430 :. सम्भाजी

हंबीरराव के निकट सम्बन्धी रंगोजी के युद्ध में मारे जाने की बुरी खबर मिली। इसलिए शिविर में वापस आने में उन्हें बिलम्ब हो गया था। शाम को शम्भूराजा विश्राम कर रहे थे। उसी समय रायप्पा बाहर से दौड़ता हुआ अन्दर आया। भयभीत होकर कहने लगा—"महाराज, हंबीरराव को पालकी में डालकर ले आये हैं। उनका हाथ कट गया।" "क्या कह रहे हो?" महाराज झट से बाहर आये और पालकी की ओर बढ़ गये। मशाल की रोशनी में उन्होंने हंबीरराव के चेहरे की ओर देखा। हंबीरराव की काली आँखों को मुस्कराते देखकर उनकी जान में जान आयी। हंबीरराव ने धीमी आवाज में बताया— "महाराज व्यर्थ में चिन्तित न होइए। एक बाण से हाथ का टुकड़ा टूट गया। इसलिए बायाँ हाथ चला गया। इतना ही तो हुआ।" "हंबीरराव थोड़ा सँभालिए अपने आपको।" शम्भूराजा ने कहा, "दाहिना हाथ तो बचा है न? चिन्ता क्यों करते हो?" हंबीरराव मुस्करा दिये। शिविर में हंबीरराव की देखभाल हो रही थी। स्वयं शम्भू महाराज उनके घावों पर पट्टी बाँध रहे थे। शम्भूराजा की दिनचर्या और चिन्ता की छाया देखकर हंबीरराव हँसकर बोले, "शम्भू बेटे मेरे सगे भाँजे राजाराम को गद्दी मिले, सोयराबाई जैसी महत्त्वाकांक्षी बहन की इच्छा पूरी हो इसलिए शक्ति होने पर भी मैं कभी आगे नहीं आया। अपना तो रिश्ता ही अलग है।" शम्भूराजा ने हंबीरराव की ओर प्रश्नार्थक दृष्टि से देखा। तब हंबीरराव ने हँसते हुए कहा, "जो रिश्ता शिवाजी महाराज का इस मिट्टी के साथ था वही हमारा और आपका है।" शम्भूराजा थोड़ी देर वैसे ही बैठे रहे। हंबीरराव को उन्होंने बर्तन से निकालकर वनस्पति की औषधि दी। उसी समय हरकारों ने सूचित किया कि वर्षा का मौसम समीप आ रहा है इसलिए औरंगजेब ने कल्याण के लिए भेजी हुई सेना को वापस आने का हुक्म दिया है। हंबीरराव के थोड़ा सावधान होने पर शम्भूराजा ने कहा, "हंबीरराव काल देवता हमारे पहाड़ जैसे पिता को लेकर चला गया। उसके बाद दूसरे पहाड़ के रूप में आप मेरे पीछे खड़े रहे। आपके साथ रहने पर मुझे अनेक बार ऐसा लगा कि पिताजी के ही साथ हूँ। पर सँभालिए अपने आप को हंबीरराव...आप ही हमारी बाँहों की शक्ति हैं। आपके हाथ का घाव बढ़ेगा तो हमारा कन्धा टूट जाएगा। कृपा कीजिए, थोड़ा धीरज रखिए।" सम्भाजी :: 431

तीन "दिल्ली के बादशाह की शक्ति गैंडे की थी। उसके सामने मराठों का यह उत्साही राजा बकरी का बच्चा था। एक बार यह गैंडा सम्भाजी और उसके महाराष्ट्र को कुचल दिया तो फिर अपना फायदा-ही-फायदा है।" गोवा के पुर्तगाली वाइसराय कांट द आल्होर ने चिढ़कर कहा। "वह कैसे?" उनके सचिव गोंसाल्विस ने पूछा। "औरंगजेब जिस उत्साह से आएगा उसी उत्साह से पीछे लौट भी जाएगा फिर हम धीरे से मालवण से थाना तक का क्षेत्र अपने राज्य में मिला लेंगे। गोवा का महाराष्ट्र बनाएँगे।" कांट साहब अपने ऊँचे राजमहल के भव्य मयखाने में मदिरा का घूँट लेते हुए बोल रहे थे। बढ़-चढ़कर बोलने वाला वाइसराय शम्भूराजा के उस पत्र की ओर बार बार वितिष्णा के साथ देख रहा था। वह जितना विलासी था, उतना ही खुशदिल हद दर्जे का स्वार्थी और धूर्त भी था। पुर्तगालियों की राजसेवा के सारे अधिकारी और कर्मचारी सरकारी सेवा के साथ-साथ अपना स्वतन्त्र व्यापार भी करते थे। पूर्वी गोलार्ध में कुस्तुनतुनियाँ और दुला के बाद पणजी व्यापार की दृष्टि मे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था। गोवा का वाइसराय अपनी तुलना पुर्तगाल के राजा से करता था। उसकी अपनी स्वतन्त्र सेना तो थी ही। उसमें उमने अनेक काले अफ्रीकी हबशी भी भर्ती किये थे। पणजी शहर के चारों ओर डेढ़ पोरसा ऊँची भव्य पाषाणी प्राचीर बनाकर वह प्रसन्नता से रह रहा था। दोनों ओर पंख फैलाकर बैठे हुए मशक्त पंछी की तरह दिखाई देने वाला उसका राजमहल, चाँदनी को तरह चमचमाती रेत पर खड़ा था। उसका पिछला हिस्सा समुद्र की ओर झुका हुआ था। चारों ओर हवा के साथ झूमने वाले ऊँचे नारियल के पेड़ थे। बीच में वाइसराय के पारिवारिक जनों के तैरने के लिए नीले पानी से भरा तालाब था। इस परिसर में विशेष मेहमानों के लिए अनेक महल थे। ऐसा लगता था। मानो इस राजप्रासाद के सामने स्वर्ग ही उतर आया है। कांट साहब का व्यक्तित्व भी बहुत आकर्षक था। मध्यम ऊँचाई, थोड़े मोटे, लम्बी बाँहों वाला फूला हुआ कोट और ढीला पैंट, गालों तक कटी हुई मूँछें, भूरी दाढ़ी और भूरी भूरी आँखें उन आँखों में समीप से झाँकने पर भी यह पता लगाना कठिन था कि कांट साहब के मन में क्या चल रहा है? उनकी टाई हमेशा अच्छी 432 :: सम्भाजी