छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 429, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"कविराज, रणमस्तखान की मस्ती मिटाने के लिए ही हम यहाँ आये हैं। पर उससे अधिक पुर्तगाली नाम का मूर्ख शत्रु मुझे सता रहा है।" शम्भूराजा ने चिन्ता व्यक्त की। "सच है राजन, वह गोवा का वाइसराय बातें तो बड़ी मीठी करता है। व्यवहार में भी अच्छा है। तभी तो पुत्ररत्न की प्राप्ति के अवसर पर उसने आपको बधाईपत्र और बालक के लिए पुर्तगाल के कीमती आभूषण भेजे थे।" कविराज के स्मरण दिलाते ही शम्भूराजा मुक्त भाव से हँस पड़े। उन्होंने कहा, "आपने उस कपटी को अच्छी तरह पहचाना। आपको क्या बताएँ। हमारे पुत्र के लिए शृंगारपुर से उसके मामा गणोजी के यहाँ से आभूषणों का उपहार समय पर नहीं पहुँचा किन्तु, इस कपटी मामा का घोड़ा गांगोली के महल में उपस्थित हो गया।" शम्भूराजा उस विशाल खाड़ी, पुर्तगालियों के प्रदेश और बाई ओर अभी मराठों से मुगलों द्वारा अपहृत कल्याण का क्षेत्र देखने लगे। उन्होंने कुछ उत्तेजित होकर पूछा- "कविराज जैसा मैंने कहा था गांवा को दूत भेजा गया या नहीं?" "राजन, इस दिशा से आप सदैव ही निश्चिन्त रहें। अपने दूत अब तक मांडवी नदी पार करके गोवा के राजप्रासाद में पहुँच चुके होंगे।" "क्या सन्देश भेजा है उस वाइसराय को ?" "यही, कि हम मराठा और मुगलों के झगड़े में बिलकुल न पड़ें और आराम से रहें। पुर्तगालियों की अधिकार वाली नदियों से यदि मुगलों की जहाजों का आना जाना आरम्भ हुआ तो शम्भूराजा किसी भी समय गोवा पर आक्रमण करेंगे।" मुंब्रा की पहाड़ी से शम्भूराजा जल्दी जल्दी नीचे उतरने लगे। मुंब्रा का पहाड़ खड़ी चट्टानों वाला था। वहाँ बकरियों का चढ़ पाना भी कठिन था। घोड़ों के वहाँ पहुँचने का तो प्रश्न ही नहीं था। राजा वहाँ के पत्थरों से होते हुए शीघ्रता से नीचे आ रहे थे। पारसिक के किले की हो रही जुड़ाई की ओर बार बार देख रहे थे। पानी की सतह से पचीस फीट की ऊँचाई की प्रचंड चट्टान पर यह किला बनाया जा रहा था। उसकी नीव बहुत मजबूत थी। राजा के सामने समुद्र में लकड़ी की अनेक मजबूत फल्लियाँ बिछाकर उस पर किला जैसा बनाया था। उस पर अनेक तोपें बिठाई गयी थीं। पारसिक किले की पाषाणी तटबन्दी पर भी अनके बुर्जियाँ बनाकर उनमें बत्तियाँ लगाने की व्यवस्था की गयी थी। शम्भूराजा मन से आश्वस्त थे। कल को अगर पुर्तगाली मुगलों से जा मिलें तो उनकी नावों और जहाजों को ध्वस्त करने की तैयारी हो गयी थी। पहाड़ी से उतरने हुए शम्भूराजा ने कवि कलश से पूछा- "कविराज, इस रणमस्तखान का नाम इससे पहले कभी सुना था ?" सम्भाजी : 427