छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसलामत, हर बार इस प्रकार चुप रहने से कैसे चलेगा?" "फिर क्या करें?" "शहजादे को इनाम पाने की अपेक्षा है।" "हूँ।" एक क्षण चुप रहकर बादशाह ने मुँह खोला-"मुअज्जम बेटे, इस खत को जरा पढ़ो।" मुअज्जम द्वारा खत को पूरा पढ़ते ही, बादशाह ने रूहूल्लाखान को हुक्म दिया-"इसमें किस-किस ने क्या-क्या बहादुरी की? इसका ब्यौरा मुझे दीजिए।" ये आज्ञाएँ देने के बाद भी वह वजीरे-आलम की ओर देखता रहा। तब बादशाह ने खजांची से कहा, "शौकत मियाँऽऽ, शहजादा आजम की बहादुरी के लिए उसे एक लाख का ईनाम देना है। इसलिए खजाने से वह राशि निकालकर रखिए।" चार-पाँच दिनों में पन्हाला से सच्ची खबर आयी। पहले दो आक्रमणों में सेनापति हंबीरराव जानबूझकर पीछे हट गये थे। शहजादा आजम को उन्होंने अधिक से अधिक अपने प्रदेश में आने दिया था। तीसरी बार उसने खुद आक्रमण किया। अपने प्राण बचाने के लिए शहजादा आजम सातारा के रास्ते नीरा नदी के पार भाग गया।" उस पत्र को अपने उत्साही वजीर को पकड़ाते हुए, बादशाह ने कहा, "क्यों वजीरे-आजम? देखा? इसी वजह से शहजादे की बहादुरी पर हमें यकीन नहीं हो रहा था।" "गुस्ताखी माफ जहाँपनाह। आपका आदेश सुनकर मैंने खजाने से राशि निकाली थी, किन्तु उसे आगे नहीं भेजा। यह कितना अच्छा हुआ।" उस रात बड़ा शहजादा मुअज्जम और वजीर असदखान बहुत देर तक बातें करते रहे। बादशाह के आगे असहाय बने वजीर ने कहा, "बेटे मुअज्जम, मैं बादशाह को जीवनभर अपना उस्ताद मानता रहा हूँ। अभी भी उन्हीं से कुछ सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। "वह कैसे?" "अब यही देखिए न। छोटे शहजादे ने अपनी बहादुरी का पत्र भेजा। उसे बादशाह ने जानबूझकर आपको पढ़ने के लिए दिया। कारण यह था कि यदि उस तरह का पराक्रम छोटे शहजादे ने सचमुच किया हो तो आप भी उससे कुछ सीखें। रूहूल्लाखान को बारीकी से समझने के लिए कहा जिससे घटित घटना की विश्वसनीयता समझ में आ जाय। तीसरी बात, ईनाम के लिए ईनाम देने के लिए खजाने से एक लाख की राशि निकालने को कहा किन्तु बुद्धिमानी से भेजा नहीं क्योंकि इतनी बड़ी रकम व्यर्थ में नष्ट नहीं होने देनी थी। ऐसा बुद्धिमान पिता 424 . - संभाजी