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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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स्नान के लिए उतरे। नाव से उतरते समय उस फकीर ने वाइसराय का हाथ बड़े प्रेम से अपने हाथ में ले लिया। अपनी उँगली से ताम्बे की अँगूठी निकालकर वाइसराय की उँगली में पहना दी। उस समय सिपाहियों को विजरई साहब बड़े भाग्यवान लगे। उन्होंने बड़े प्यार से वाइसराय से कहा, "हुजूर फकीर से ऐसा प्रसाद खुशकिस्मत को ही मिलता है। उसे कभी खोने न दें। फकीर की अँगूठी से बड़े- बड़े संकट दूर हो जाते हैं।" नाव थोड़ी दूर जाने के बाद वाइसराय को एकदम झटका लगा। माथे पर हाथ रखकर वे थानेदार से बोले, "ओ गाड ऑलमाइटी, इस फकीर बाबा ने सचमुच मेरी आँखें खोल दीं। अपने सभी सैनिकों को हुक्म दीजिए कि यहाँ स्नान के लिए आने वाले किसी भी हिन्दू वैरागी या गोसावी को जाने न दें। हर एक की तलाशी लो। वह शिवाजी भी अनेक बार गोसावी के वेश में घूमता था।" दिनभर स्नान करने वाले यात्रियों की भीड़ लगी रही। हिन्दू वैरागियों और गोसावियों को आज स्नान करने की इच्छा नहीं हो रही थी। पुर्तगाली सिपाही उनके पीछे पड़ गये थे। तलाशी निरन्तर चल रही थी। गोकुल अष्टमी का वह दिन बीत गया। पंचगंगा के पाट पर अँधेरा छा गया। वाइसराय के हाथ कुछ भी नहीं लगा वे निराश होकर राजभवन लौट गये। चार दिन बाद एकबार फिर वाइसराय ने विचार-विमर्श के लिए येसाजी गम्भीर राव को बुलवाया। चर्चा के दौरान येसाजी ने वाइसराय की अँगूठी की ओर देखा। येसाजी का बार-बार अँगूठी की ओर घूरना, वाइसराय से छिपा न रहा। उन्होंने अँगूठी निकालकर येसाजी के हाथ में दे दी। येसाजी ने उस अँगूठी को ध्यान से देखा और उसमें लिखे अक्षर को देखकर जोर-जोर से हँसने लगे। वाइसराय ने फिर अँगूठी अपने हाथ में लेते हुए येसाजी से पूछा-"इसमें क्या लिखा है?" "मुझसे अधिक अच्छी तरह आपके सचिव पढ़ सकेंगे। उन्हीं से पूछ लें।" येसाजी ने सुझाया। लुइस गोंसाल्विस ने अँगूठी पर लिखा हुआ अक्षर जोर से पढ़ा- "सम्भाजी"। वाइसराय को लगा जैसे उसके कान में किसी ने लोहे की सलाख डाल दी हो। वह पागल की तरह अँगूठी को देखता रहा। उसी समय वह हरा-भरा किनारा, वह जवान फकीर बाबा, उसकी काजल से अँजी आँखें कांट साहब के सामने घूमने लगीं। सम्भाजी 437