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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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एक दिन पहले से ही पंचगंगा के दोनों तटों पर पुर्तगाली सेना की अनेक टुकड़ियाँ आसपास के जंगलों में छुपकर बैठी थीं। प्रायः तीर्थस्थान या देवपूजा के लिए जाते समय शम्भूराजा अपने साथ बहुत कम सेना रखते थे। वह सूचना वाइसराय को भी मिल चुकी थी। फिर भी सात-आठ सौ शस्त्रधारी उनके साथ होंगे। फिर भी साहस के साथ आक्रमण करके शम्भूराजा को बन्दी बनाकर बदला लेना है। ऐसी वाइसराय की इच्छा थी। अब सुबह हो चुकी थी। पंचगंगा के दूसरे किनारे पर कुछ हिन्दू यात्री पानी में उतरते दिखाई देने लगे थे। दूसरा किनारा मराठों के अधिकार में होने पर भी पर्व के समय मराठे वहाँ नहीं आते। इस बात का वाइसराय के लोगों को अच्छी तरह पता था। यात्रियों की भीड़ बढ़ने से पहले ही आसपास चक्कर लगाएँगे और ठीक जगह से देख सकेंगे, ऐसा सोचकर कांट साहब पानी में उतरे। उनकी शाही नाव देखते-देखते दूसरे किनारे पर जा पहुँची। उसी समय पुर्तगाली थानेदार को एक बात सूझी। वह अपने मालिक से बोला, "विरजई सरकार की इस नाव को कौन नहीं पहचानता ?" अपनी भूल वाइसराय के ध्यान में आ गयी। उसने दूसरे किनारे से अपनी नाव पीछे घुमाई। उसके नाविकों को आदेश दिया कि वे नाव को झाड़ियों में छुपा दें। इसी समय सामने से मछुवारों की नाव आती हुई दिखाई पड़ी। थानेदार ने नाविक को रोका। वाइसराय साहब को कौन नकार सकता था। कांट और उसके आठ शस्त्रधारी सिपाही नाव में बैठे। सिपाही नाव में छुपकर बैठे। नाव में हरा कुर्ता और बूटेदार हरी कफनी बाँधे एक पीर बाबा भी बैठे थे। उनके साथ चार तरुण शिष्य थे। पीर बाबा ने अपनी आँखों में काजल लगा रखा था। पीर बाबा ने अपनी शंकु के आकार की दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए अपने लम्बे मयूर पंख वाले चँवर को उठाया और प्रत्येक सिपाही की पीठ पर हल्के से मारा। 'अल्लाह अल्लाह' बोलकर फकीर धीरे-धीरे कुछ बड़बड़ा रहा था। मयूर पंख का प्रसाद अर्थात् ईश्वर की कृपा। इसलिए पुर्तगालियों के हिन्दुस्तानी सिपाही भी प्रसन्न हो गये। उन्होंने उस फकीर के पाँव छुये। "कहाँ जा रहे हो, पीर बाबा ?" पुर्तगाली थानेदार ने पृछा। "आज तो जन्माष्टमी का दिन है।" फकीर हँसकर बोला। वाइसराय को फकीर के प्रति बड़ा कुतूहल हुआ। "मुसलमान होकर हिन्दुओं की तरह स्नान करने कैसे आए?" ऐसा कहकर वाइसराय ने फकीर का उपहास किया। फकीर ने कहा, "हम फकीर लोगों का क्या है ? अल्लाह और कृष्ण दोनों हमारे भगवान हैं। और पाक फकीर इस्लाम से अधिक हिन्दुओं में शिष्य मिलते हैं। नीचे थोड़ी दूरी पर नाव रुकी। नाखे के घाट पर वह फकीर और उसके शिष्य 436 :: सम्भाजी