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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

एक दिन पहले से ही पंचगंगा के दोनों तटों पर पुर्तगाली सेना की अनेक टुकड़ियाँ आसपास के जंगलों में छुपकर बैठी थीं। प्रायः तीर्थस्थान या देवपूजा के लिए जाते समय शम्भूराजा अपने साथ बहुत कम सेना रखते थे। वह सूचना वाइसराय को भी मिल चुकी थी। फिर भी सात-आठ सौ शस्त्रधारी उनके साथ होंगे। फिर भी साहस के साथ आक्रमण करके शम्भूराजा को बन्दी बनाकर बदला लेना है। ऐसी वाइसराय की इच्छा थी। अब सुबह हो चुकी थी। पंचगंगा के दूसरे किनारे पर कुछ हिन्दू यात्री पानी में उतरते दिखाई देने लगे थे। दूसरा किनारा मराठों के अधिकार में होने पर भी पर्व के समय मराठे वहाँ नहीं आते। इस बात का वाइसराय के लोगों को अच्छी तरह पता था। यात्रियों की भीड़ बढ़ने से पहले ही आसपास चक्कर लगाएँगे और ठीक जगह से देख सकेंगे, ऐसा सोचकर कांट साहब पानी में उतरे। उनकी शाही नाव देखते-देखते दूसरे किनारे पर जा पहुँची। उसी समय पुर्तगाली थानेदार को एक बात सूझी। वह अपने मालिक से बोला, "विरजई सरकार की इस नाव को कौन नहीं पहचानता ?" अपनी भूल वाइसराय के ध्यान में आ गयी। उसने दूसरे किनारे से अपनी नाव पीछे घुमाई। उसके नाविकों को आदेश दिया कि वे नाव को झाड़ियों में छुपा दें। इसी समय सामने से मछुवारों की नाव आती हुई दिखाई पड़ी। थानेदार ने नाविक को रोका। वाइसराय साहब को कौन नकार सकता था। कांट और उसके आठ शस्त्रधारी सिपाही नाव में बैठे। सिपाही नाव में छुपकर बैठे। नाव में हरा कुर्ता और बूटेदार हरी कफनी बाँधे एक पीर बाबा भी बैठे थे। उनके साथ चार तरुण शिष्य थे। पीर बाबा ने अपनी आँखों में काजल लगा रखा था। पीर बाबा ने अपनी शंकु के आकार की दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए अपने लम्बे मयूर पंख वाले चँवर को उठाया और प्रत्येक सिपाही की पीठ पर हल्के से मारा। 'अल्लाह अल्लाह' बोलकर फकीर धीरे-धीरे कुछ बड़बड़ा रहा था। मयूर पंख का प्रसाद अर्थात् ईश्वर की कृपा। इसलिए पुर्तगालियों के हिन्दुस्तानी सिपाही भी प्रसन्न हो गये। उन्होंने उस फकीर के पाँव छुये। "कहाँ जा रहे हो, पीर बाबा ?" पुर्तगाली थानेदार ने पृछा। "आज तो जन्माष्टमी का दिन है।" फकीर हँसकर बोला। वाइसराय को फकीर के प्रति बड़ा कुतूहल हुआ। "मुसलमान होकर हिन्दुओं की तरह स्नान करने कैसे आए?" ऐसा कहकर वाइसराय ने फकीर का उपहास किया। फकीर ने कहा, "हम फकीर लोगों का क्या है ? अल्लाह और कृष्ण दोनों हमारे भगवान हैं। और पाक फकीर इस्लाम से अधिक हिन्दुओं में शिष्य मिलते हैं। नीचे थोड़ी दूरी पर नाव रुकी। नाखे के घाट पर वह फकीर और उसके शिष्य 436 :: सम्भाजी

स्नान के लिए उतरे। नाव से उतरते समय उस फकीर ने वाइसराय का हाथ बड़े प्रेम से अपने हाथ में ले लिया। अपनी उँगली से ताम्बे की अँगूठी निकालकर वाइसराय की उँगली में पहना दी। उस समय सिपाहियों को विजरई साहब बड़े भाग्यवान लगे। उन्होंने बड़े प्यार से वाइसराय से कहा, "हुजूर फकीर से ऐसा प्रसाद खुशकिस्मत को ही मिलता है। उसे कभी खोने न दें। फकीर की अँगूठी से बड़े- बड़े संकट दूर हो जाते हैं।" नाव थोड़ी दूर जाने के बाद वाइसराय को एकदम झटका लगा। माथे पर हाथ रखकर वे थानेदार से बोले, "ओ गाड ऑलमाइटी, इस फकीर बाबा ने सचमुच मेरी आँखें खोल दीं। अपने सभी सैनिकों को हुक्म दीजिए कि यहाँ स्नान के लिए आने वाले किसी भी हिन्दू वैरागी या गोसावी को जाने न दें। हर एक की तलाशी लो। वह शिवाजी भी अनेक बार गोसावी के वेश में घूमता था।" दिनभर स्नान करने वाले यात्रियों की भीड़ लगी रही। हिन्दू वैरागियों और गोसावियों को आज स्नान करने की इच्छा नहीं हो रही थी। पुर्तगाली सिपाही उनके पीछे पड़ गये थे। तलाशी निरन्तर चल रही थी। गोकुल अष्टमी का वह दिन बीत गया। पंचगंगा के पाट पर अँधेरा छा गया। वाइसराय के हाथ कुछ भी नहीं लगा वे निराश होकर राजभवन लौट गये। चार दिन बाद एकबार फिर वाइसराय ने विचार-विमर्श के लिए येसाजी गम्भीर राव को बुलवाया। चर्चा के दौरान येसाजी ने वाइसराय की अँगूठी की ओर देखा। येसाजी का बार-बार अँगूठी की ओर घूरना, वाइसराय से छिपा न रहा। उन्होंने अँगूठी निकालकर येसाजी के हाथ में दे दी। येसाजी ने उस अँगूठी को ध्यान से देखा और उसमें लिखे अक्षर को देखकर जोर-जोर से हँसने लगे। वाइसराय ने फिर अँगूठी अपने हाथ में लेते हुए येसाजी से पूछा-"इसमें क्या लिखा है?" "मुझसे अधिक अच्छी तरह आपके सचिव पढ़ सकेंगे। उन्हीं से पूछ लें।" येसाजी ने सुझाया। लुइस गोंसाल्विस ने अँगूठी पर लिखा हुआ अक्षर जोर से पढ़ा- "सम्भाजी"। वाइसराय को लगा जैसे उसके कान में किसी ने लोहे की सलाख डाल दी हो। वह पागल की तरह अँगूठी को देखता रहा। उसी समय वह हरा-भरा किनारा, वह जवान फकीर बाबा, उसकी काजल से अँजी आँखें कांट साहब के सामने घूमने लगीं। सम्भाजी 437

चार "क्यूँऽ क्यूँऽऽ फतेह नहीं हो रहा है रामशेज?" ऐसा कहते हुए बादशाह बेचैन हो रहा था। औरंगाबाद में बादशाह को ठीक से नींद नहीं आती थी। रायगढ़ की राजधानी से शम्भुराजा का घोड़ा सह्याद्रि की तलहटी में चारों ओर चौकड़ी भर रहा था। वे पूरी तरह सावधान थे। उनका ध्यान नासिक की ओर रामशेज पर भी बना हुआ था। रामशेज नासिक से सात मील की दूरी पर उत्तर की ओर था। प्रभुरामचन्द्र वनवास के समय सीता माता के साथ गोदावरी के तट पर आये थे। इसी स्थान पर उन्होंने कुछ दिन निवास किया था। यहीं उनका शयनस्थल था। इसीलिए इस स्थान को रामशेज कहने लगे। किसी जमाने में औरंगजेब के पिता शाहजहाँ ने दक्खिन पर आक्रमण किया था। उस समय रामशेज एक शुभशकुन सिद्ध हुआ था। यहीं से उसने दक्षिण दिग्विजय आरम्भ की थी। औरंगजेब के लिए रामशेज एक भावनात्मक विषय बन गया था। इस किले पर चाँद सितारों वाला झंडा फहराने के बाद त्र्यम्बक, अहिवंत, मार्केडा और साल्हेर के किलों पर क़ब्ज़ा करके शहजादा अकबर के लिए दिल्ली का रास्ता बन्द कर दिया जाय और फिर पूरी शक्ति से कोंकण में जाकर उस काफिर के बच्चे को पकड़ा जाय। ऐसी औरंगजेब की कल्पना थी। किन्तु महीनों बीत गये, बड़ी मात्रा में गोला बारूद व्यर्थ बर्बाद हुआ, रामशेज के आसपास हजारों लाशें गिर गयीं। फिर भी रामशेज का किला हाथ नहीं आ रहा था। औरंगजेब की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। रामशेज का किला मराठों और मुगलों के हठ, उनके द्वेष और उनके अस्तित्व की निशानी बन गया था। देखने में वह अन्य किलों की भाँति सुन्दर और भव्यदिव्य नहीं था। किन्तु वह बेलाग, मुस्तंडा और कठोर चट्टानों की छाती वाला था। उसकी पाषाणी तटबन्दी को गिराने और किले पर क़ब्ज़ा करने के लिए शहाबुद्दीन तीस-पैंतीस हजार की फौज लेकर किले पर घेरा डाले हुए था। किला प्राकृतिक रूप से खुला हुआ था। अगल-बगल अन्य पहाड़ियों या घाटियों का साथ न था। किले पर केवल आठ-नौ सौ मराठों की सेना। इतना अवश्य था कि किले के ये सिपाही संकल्पशील और फौलादी छाती वाले थे। रामशेज का बूढ़ा किलेदार सूर्याजी जेधे मावल का हट्टा-कट्टा साहसी, निर्भीक और बहादुर मराठा था। उसे रोलारमामा के अखाड़े में तालीम मिली थी। 438 :: सम्भाजी

उन्हें शम्भूराजा के हाथ का पत्र मिला था—"सूर्याजी जेधे मामा, आप तो पिताजी के अखाड़े के पहलवान हैं। आप जैसों को हम क्या उपदेश देंगे? लेकिन शिवाजी महाराज के उस कथन को कभी न भूलें। उन्होंने कहा था—'हमारा एक एक किला औरंगजेब से पाँच पाँच वर्ष तक लड़ेगा। ऐसे हमारे तीन सौ साठ किले हैं। औरंगजेब को पूरा महाराष्ट्र जीतने के लिए कितने जन्म लेने पड़ेंगे?' जेधे मामा मैं इतना ही कहूँगा कि आपका किला महाराष्ट्र का प्रवेशद्वार है। दिल्ली के उस बूढ़े दूल्हे को प्रवेशद्वार पर ही रोक दो। मराठों के प्रदेश में राक्षस विवाह करने का बादशाह का स्वप्न मिट्टी में मिला दो।'" बस इसी पत्र से सूर्याजी का जीवन ही बदल गया। उनकी बलवान हड्डियाँ एक अभेद्य बुर्ज बन गयी थीं। बहुमूल्य खजाने से भरे घड़े के चारों ओर जिस प्रकार कालसर्प घूमता रहता है, उसी प्रकार सूर्याजी किले के चारों ओर घूमते रहते थे। उन्होंने दिन रात एक कर दिया था। कब सोते थे इसका किसी को भी पता न था। थोड़ी सी रसद के सहारे ही उन्होंने लड़ाई चालू रखी। लड़ाई शुरू करके दोपहर की नमाज की चादर किले पर बिछाने का स्वप्न देखने वाले शहाबुद्दीन को सूर्याजी ने अच्छा सबक सिखाया था। शहाबुद्दीन ने आरम्भ में बहुत जोर का आक्रमण किया। तटबन्दी के ऊपर का हिस्सा गिरा दिया। रात को मुगल गोलंदाज हँस रहे थे। सुबह होते सिंहद्वार को गिरा देंगे। यही सोचकर अपने डेरे में चले गये थे। दूसरी सुबह मुगल सेना तटबन्दी को देखती रह गयी। तटबन्दी का गिरा हुआ हिस्सा रातभर में फिर से जोड़ दिया गया था। हाथियों के सूंड से मनुष्यों के हाथों से सभी आबाल वृद्ध रात भर जागकर अभूतपूर्व पराक्रम प्रदर्शित किये थे। मुगलों को इस घटना पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्हें विश्वास हो गया था कि मराठों के साथ भूत-प्रेत रहते हैं। पिछले कुछ महीनों से वहाँ युद्ध चल रहा था। तोपों के गोले-बारूद और घोड़ों की दौड़ से पूरा प्रदेश उद्ध्वस्त हो गया था। आसपास की बस्ती से लोग गाँव छोड़कर चले गये थे। शम्भूराजा को पता था किले पर सात-आठ सौ लोग हैं। वे बार बार हंबीरराव मोहिते को रामशेज पर नजर रखने के लिए कहते थे। मोहिते को भी इस बात का पता था। इसलिए कभी कभी रात में सात आठ सौ मराठा सैनिक जंगलों से भूत की तरह निकलते थे और तीस पैंतीस हजार मुगल सैनिकों से भिड़ जाते थे। दिन में सूर्याजी रामशेज की ओर आँख नहीं उठाने देते थे और रात को हंबीरराव सोने नहीं देते थे। इसी तरह कई महीनों तक चलता रहा। मुगलों का दो सौ मन बारूद समाप्त हो गया। 1682 के मई महीने में शरीफखान नाम का मुगल सरदार रामशेज परिसर में पहुँच रहा था। उसके साथ सम्भाजी :. 439

रसद से लदे पाँच सौ हाथी एक हजार बैल थे। लेकिन दिन में ही गड़बड़ी हो गयी। सीटियों से पूरा जंगल गूँजने लगा। बगल की घाटी में छुपे सात हजार मराठा सैनिक उस रसद पर टूट पड़े। दो घंटे तक घमासान लड़ाई हुई। जाहिर खान, फैजुल्लाखान जैसे अनेक मुगल अधिकारी मारे गये। अपनी रसद का मराठों द्वारा लूटा जाना सुनकर रामशेज के आसपास घेरा डाले मुगल सिपाही मदद के लिए दौड़े। घमासान लड़ाई हुई। लगभग छः सौ मराठा सैनिक मारे गये। दो हजार के आसपास जख्मी हो गये। परन्तु उन्होंने रसद का बहुत नुकसान किया था। मुगलों की विशाल सेना के सामने मराठा सेना पीछे हट गयी। इस अचानक हमले से मुगलों का कलेजा फट गया था। किन्तु इस छोटी-सी जीत से शरीफखान बहुत आनंदित हो गया। उसने अपने पराक्रम की बड़ाई का पत्र औरंगजेब के पास भेजा। असदखान को यह अच्छी तरह मालूम था कि रामशेज की विजय का समाचार सुनने के लिए बादशाह कितना आतुर है? उस पत्र सच्चाई को पक्का किये बिना ही वह दौड़ता हुआ गया। "बधाई हो मेरे मालिक बधाई हो। हमारी विजय हो गयी—रामशेज पर हमारी बड़ी जीत हुई है।" "विजय? कहाँ? किले पर या किले के नीचे?" असदखान गड़बड़ा गया। खिन्न स्वर में बोला. "जी हाँ, हुजूर! किले के नीचे तलहटी में।" बादशाह की भूरी आँखें इस तरह नाचीं, मान कह रही हों—'आप कितने मूर्ख हो?' उस समय वजीर को पसीना छूट गया। बादशाह ने विषाद के स्वर में कहा— "अपने बेवकूफ सेनाधिकारी मराठों के तरीके क्यों नहीं सीखते? मराठे किस तरह घूम-घूमकर आक्रमण करते हैं?" महीनों बीत गये किन्तु रामशेज हाथ नहीं आया। इसलिए बादशाह बहुत बेचैन था। शहाबुद्दीनखान भी हैरान था। किले पर थोड़ी सी ही सेना थी लेकिन अपना घोर प्रतिकार रोक नहीं रही थी। शहाबुद्दीन ने नयी रसद आने के लिए सभी रास्ते बन्द कर दिये थे। किले पर तोपें नहीं थीं फिर भी सूर्याजी पीछे हटने को तैयार नहीं था। किले में भैंसों-बैलों का चमड़ा इकट्ठा करके उन्होंने लकड़ी और चमड़े की तोपें बना ली थीं। इन तोपों का धमाका साधारण तोपों से दस गुना अधिक था। शहाबुद्दीन भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। किला जीतने के लिए नये-नये उपाय खोजने लगा। किले का मोर्चा तोड़ने के लिए ज़मीन से गोले दागना कारगर नहीं हो रहा था। इससे विजय मिलने वाली नहीं थी। यह अनुभव करके शहाबुद्दीन ने सभी लुहारों और बढ़इयों को एकत्र किया। बड़े बड़े वृक्षों को काटकर उसने एक 440 : सम्भाजी

बड़ा बुर्ज तैयार किया। उसके ऊपर एक साथ पाँच सौ सैनिक खड़े होकर सहजता से किले पर आक्रमण करने लगे। वह लकड़ी की ऊँची मीनार जमीन से आकाश को छूने वाले पहाड़-सी दिखाई पड़ती थी। शहाबुद्दीन ने वहाँ से बहुत गोलाबारी की। किन्तु रामशेज अजेय बना रहा। रामशेज की विजय मुगलों और मराठों दोनों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गयी थी। प्रतिदिन औरंगाबाद और रायगढ़ से गुप्तचर आते थे और रामशेज का ताजा समाचार लेकर जाते थे। रोज नयी-नयी योजनाएँ बनाई जाती थीं फिर भी एक मामूली-सा किला हाथ नहीं आ रहा था। इससे बादशाह बहुत त्रस्त हो गया था। रामशेज की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। इसी बीच बादशाह को सूचना मिली कि सम्भाजी अपनी सेना की सहायता के लिए एक बड़ी फौज रामशेज भेज रहे हैं। शीघ्र ही मराठों की सेना वहाँ पहुँचेगी। बादशाह ने बहादुरगढ़ से अपने दूधभाई खानजहाँन बहादुरखान को तुरन्त बुलवाया। उसे आगाह किया-"भाईजान पहले आपकी लापरवाही के कारण ही उस काफिर के बच्चे की बानरी सेना ने बुरहानपुर को बेचिरागी कर दिया। सम्भाजी सही सलामत निकल गया। अब रामशेज को तो हाथ से न निकलने दें।" हजरत ऐसा नहीं है कि जो भूल एक बार हो गयी वही बार बार दुहराई जाएगी।" "मत बताओ ज्यादा कुछ, आपकी लापरवाही बार-बार हमारा रास्ता रोकती है।" बहादुरखान ने लज्जा से गर्दन नीचे झुका ली। थोड़ी देर बाद उसने कहा, "लेकिन हजरत, शहाबुद्दीन तो यकीन दिला रहा है कि वह रामशेज जीते बिना वापस नहीं आएगा।" "फिजूल यकीन दिलाने में उसका क्या जाता है?- एक छोटे से किले से हमारी जो बेइज्जती हो रही है, उसका क्या ? अपनी फौज का मनोबल गिरना नहीं चाहिए। चाहें तो आप दोनों मिलकर कुछ दिन कोशिश करके देखो इसके लिए हमें कोई एतराज नहीं होगा।" रायगढ़ में सम्भाजी राजा को मालूम पड़ा कि बहादुर खान अपना सारा सामान बहादुरगढ़ पर छोड़कर नासिक की ओर जा रहा है। सम्भाजी ने शहापुर के पास माहुली किले में अपनी सेना रखी थी। रूपाजी भोसले और मामाजी मोरे की आठ हजार सेना रामशेज की ओर चल पड़ी। बादशाह ने बहादुरखान को पन्द्रह हजार की सेना दी थी। बहादुरखान किले की तलहटी में पहले पहुँचा। मुगलों की सेना इकट्ठा हो गयी। उन्हें नष्ट करने के लिए रूपाजी और मानाजी की सेना आ रही है। ऐसी सूचना पाते ही मुगलों की सेना पीछे मुड़ गयी। गणेश गाँव के पास दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ। मराठों की बहुत हानि हुई और रूपाजी तथा मानाजी पीछे हट सम्भाजी :: 441

गये। किन्तु दोनों की सेनाएँ पूरी सावधानी के साथ आसपास के क्षेत्रों में घूमने लगी। शहाबुद्दीन किला जीते बिना जाने को बिलकुल तैयार नहीं था। बूढ़े बहादुरखान के साथ उसका विचार-विमर्श चल रहा था। उस शाम को शहाबुद्दीन और बहादुरखान अपने डेरे पर खड़े थे। सन्ध्याकाल की तेज हवा में रामशेज के ऊपर भगवा झंडा फहरा रहा था। ये दोनों उसकी ओर पूँछ कुचले साँप की तरह क्रोध से देख रहे थे। थके हुए बूढ़े आदमी की तरह सूरज डूब रहा था। अँधेरा घिरता आ रहा था। दिन में निश्चित की गयी योजना के अनुसार मुगलों के हजारों सैनिक जमा हो गये। उन सभी को दोनों ने संकेत किया- "धीरे- धीरे किले के सिंहद्वार की ओर चलना है नीचे जमीन से और दूसरी ओर लकड़ी की बनी ऊँची मीनार के ऊपर से रात भर गोले दागते रहना है।" "कब तक?" "पूरी रात।" शहाबुद्दीन ने कहा। रणभेरी बजी। मशालें जल गयीं। अँधेरे का परदा फाड़कर 'अल्ला हो अकबर' का घोष आसमान से टकराने लगा। दस-बारह हजार की मुगल सेना आगे सरक रही थी। उसमें ईरानी, तूरानी, रूहेले, दक्खिनी आदि अनेक जातियों के लोग थे। रामशेज के मराठा सैनिक यह तमाशा ऊपर से देख रहे थे। मराठों को विश्वास था कि कुछ भी हो पर रामशेज की तटबन्दी को कुछ होने वाला नहीं है। उसी समय किले की तलहटी में दूसरा एक अलग नाटक चल रहा था। नारे लगाते हुए आगे बढ़ने वाले सैनिकों में शहाबुद्दीन और बहादुर खान नहीं थे। अँधेरे का फायदा उठाते हुए दोनों के घोड़े तेजी से निकले। उनके दाहिने-बायें कुछ साथी भी थे। अँधेरे में पीछे की ओर हजार-डेढ़ हजार मुगल सैनिक जमा थे। शहाबुद्दीन घोड़े से उतर कर धीरे से बोला, "दोस्तो! किसी को भी मशाल नहीं जालानी है। चिलम पीने के लिए भी आग नहीं जलानी है।" "जी हुज़ूर।" उत्तर आया। "इसी अँधेरे में साँप की तरह किले पर सर-सर चढ़ने वाले साहसी जवान हमें चाहिए।" "जिसे मौत चाहिए वही आगे आएगा।" बहादुरखान ने कहा। देखते-देखते मुगल सेना के सात आठ सौ जवान आगे आये। सिंहद्वार की ओर से तोपों की आवाज आ रही थी और यहाँ अँधेरे में नयी चाल चली जा रही थी। ऊपर से मराठे नीचे का खेल देख रहे थे। लोगों की भीड़ के पीछे बूढ़ा सूर्याजी जेधे खड़ा था। वह घोड़े पर सवार था। सामने का तमाशा देखकर उसने तम्बाकू की चुटकी मुँह में डाली। उसके साले सुभान ने सूर्याजी से कहा- "जीजा जी, ये बन्दर आज इतना अधिक क्यों नाच रहे हैं?" 442 .. सम्भाजी

सूर्याजी ने मुँह की तम्बाकू एक ओर थूक दी और धीरे-से कहा, "सुभान, तुमने अच्छी याद दिलाई। शेलार मामा कुश्ती खेल रहे थे तब उन्होंने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही थी।" "कौन-सी?" "उन्होंने कहा था कि जिस सुबह मुर्गा अधिक जोर से बोले तो समझना चाहिए कि कुछ-न-कुछ गड़बड़ है।" तमाशा देखने वालों के बीच से सूर्याजी पीछे हटे। पीछे के लोगों को धीरे से संकेत किया। देखते-ही-देखते दो सौ लोग चुपचाप अँधेरे में निकल गये। सामने जो शोर हो रहा था उसकी अपेक्षा पीछे की ओर पूर्ण शान्ति थी। पीछे की ओर से कुछ मुगल सैनिक चुपचाप किले पर चढ़ रहे थे। वे पेड़ों से रस्सियाँ बाँधकर अपने साथियों की सहायता कर रहे थे। रस्सियों के सहारे मुगल होशियार बन्दरों की तरह ऊपर सरक रहे थे। झाड़ियों को पकड़कर, कहीं-कहीं रस्सियाँ बाँधकर उनसे लटकते हुए, अपने पीछे आने वालों को सहारा देते हुए धीरे-धीरे ऊपर सरक रहे थे। अन्ततः तीन चार जन एक साथ ऊपर आ गये। उनके सिर तट से ऊपर दिखे नहीं कि मराठों की गुलेलों के रबड़ तन गये। मुगलों के माथे पर सटासट बड़े-बड़े पत्थर टकराये। 'अल्लाऽऽ', 'अरे भागोऽऽ' जैसी करुण चीत्कारों से वन प्रदेश की आँखें बाहर आ गयीं। ऊपर चढ़ने वाले धड़ाधड़ नीचे गिरने लगे। 'सम्भाजी महाराज की जयऽऽ!' 'शिवाजी महाराज की जयऽऽ'। किले के ऊपर आयी आफत का अन्दाजा शहाबुद्दीन को हो गया। तब तक मराठे आगे आ चुके थे। जो लोग दिखाई दिये उन्हें ऊपर के ऊपर ही सपासप काटकर रख दिया। जो बचे वे पेड़ों और रस्सियों का सहारा लेकर नीचे उतरने लगे। उसी समय किले के बुर्ज से बड़े-बड़े पत्थर और तेल-भीगी जलती मशालें नीचे की ओर फेंके जाने लगे। कुछ लोग पत्थरों के तो कुछ आग के शिकार बने। चार सौ सैनिकों में से केवल बीस पचीस मुगल सैनिक ही बच पाये। शेष सभी को इस काली रात ने निगल लिया। रातभर जागते रहने से शहाबुद्दीन थक गया था। वह दिनभर अपने शिविर में आराम करता रहा। किन्तु पराजय के कारण उसका सिर फटा जा रहा था। तलहटी में दिन भर सामान बाँधने का कार्य होता रहा। कनातों की डोरियाँ लपेटी जा रही थीं। बीच बीच में शहाबुद्दीन की दुखती आँखें किले की ओर क्रोध से देख लेती थीं। सामने का वह पत्थर, वह दरवाजा, वह बुर्ज देखकर वह संतृप्त होता था। इस अशुभ जगह में रुकने की उसकी बिलकुल इच्छा नहीं थी। आज रात को उसे नासिक के पास कहीं रुकना था। शहाबुद्दीन ने घोड़े पर सवार होते-होते अपने सम्भाजी 443

द्वारा बनवाई गयी लकड़ी की मीनार की ओर देखा तो उसे बहुत क्रोध आया। सामान बाँधने का काम उसने बन्द करवा दिया। पाँच सौ सैनिकों को साथ लेकर लकड़ी की मीनार की ओर दौड़ पड़ा। उस मीनार को बनाने के लिए हजारों लोगों ने तीन महीने कार्य किया था। किन्तु अब शहाबुद्दीन को इसकी कोई चिन्ता नहीं थी। उसने अपने सैनिकों को घास इकट्ठा करने के लिए कहा। मीनार के चारों ओर घास बिछा दी गयी। शहाबुद्दीन क्रोध से लाल हो गया था। अपनी आँखों का आँसू पोंछते हुए उसने घास में आग लगा दी। घास जलने लगी, उसके साथ मीनार भी जलने लगी। बहादुरखान दौड़ता हुआ वहाँ आया। शहाबुद्दीन का हाथ पकड़कर पूछने लगा— "आप पागल तो नहीं हो गये हैं?" "नहीं खान साहब, मैं अपने अशुभ हाथ की कोई निशानी यहाँ नहीं छोड़ना है। आप नये सिरे से सब कुछ शुरू करो, अल्लाह और बादशाह को जीत हासिल कराओ।" रात में वह महाकाय मीनार धाड़-धाड़ जल रही थी। उसका प्रकाश चारों ओर फैल रहा था। उस जंगल से शहाबुद्दीन का घोड़ा वापस जा रहा था। आँखों से निकलकर दाढ़ी पर गिरने वाले आँसुओं को शहाबुद्दीन बड़े कष्ट से पोंछ रहा था। पाँच पूरे महाराष्ट्र में मराठी सेना और मुगल सेना में जगह-जगह पर लड़ाई हो रही थी। दोनों ने जगह-जगह पर अपने झंडे गाड़े और कहीं-कहीं उखाड़े थे। किन्तु रामशेज के चारों ओर मुगल सेना का घेरा हट नहीं रहा था। मराठे मधुमक्खियों की तरह उन्हें डसते रहते थे। किसी को भी किले के ऊपर सरकने नहीं दे रहे थे। हमेशा की तरह बहादुरखान अत्यन्त हताश होकर किले की ओर देख रहा था। उसके साईस से उसकी यह दशा देखी न गयी। उसने दबी आवाज में कहा— "अजी हुजूर, छोटा मुँह बड़ी बात कर रहा हूँ। व्यर्थ में समय क्यों जाया कर रहे हैं? किसी मान्त्रिक से सलाह क्यों नहीं लेते?" "चुप बैठ, बेवकूफ!" खान साहब ने डाँटते हुए कहा। "लेकिन हुजूर, मरगठों ने भूत वश में किया है इसीलिए मैंने कहा...।" "हर बीमारी का इलाज रहता है तो भूत-प्रेत का क्यों नहीं?" 444 :: सम्भाजी

"महँगा इलाज होगा, हुजूर।" "खर्चे की फिक्र न कर बोल।" उसी दिन साईस एक मान्त्रिक को खान के सामने लेकर आया। मान्त्रिक ने आत्मविश्वास से कहा, "खान साहब मात्र सौ तोले सोने का एक साँप मुझे बनवाने दीजिए और फिर मेरे पीछे-पीछे किले के दरवाजे तक आइए। देखिये कि दरवाजा किस तरह अपने आप खुल जाता है?" नासिक के एक सोनार को यह काम सौंपा गया। स्वर्ण सर्प तैयार होने लगा। बादशाह रोज तगादा कर रहा था। "रामशेज जीतने के लिए क्या कोशिश जारी है?" इसका समाचार बहादुरखान ने आलमगीर के पास भेज दिया था, उसमें सोने के साँप का भी जिक्र था और भी तमाम छोटी-छोटी बातें लिख दी थीं। वह मान्त्रिक उस दिन बड़े उत्साह में था। हाथ में वह सौ तोले का सर्पराज नचा रहा था। अब दरवाजा अपने आप खुल जाएगा, यह सोचकर सारे लोग मान्त्रिक और साईस के पीछे चल रहे थे। साथ में सवार राऊत, शौकीन लोग बहादुर खान भी चले। दरवाजे के समीप पहुँचते ही किले के ऊपर से पत्थर गिरने लगे। एक पत्थर साईस के सीने में लगा। वह वहीं पर चक्कर खाकर गिर गया। दूसरा पत्थर मान्त्रिक के सर में लगा। स्वर्णसर्प उसके हाथ से छूट गया। 'या अल्लाहऽऽ' करते हुए, अपना खून से सना सिर एक हाथ से पकड़े वह आते ही जा रहे थे। रामशेज की तटबन्दी ठठाकर हँसने लगी। बादशाह ने थोड़े दिनों बाद अपने भाई शाहजहान बहादुर खान को आड़े हाथों लिया—"आपकी उम्र जैसी-जैसी बढ़ रही है अक्ल छोटी होती जा रही है। याद है आपको बहादुरगढ़ की घटना? एक छोटी-सी फौज के साथ शिवाजी ने आपको चकमा दिया था और आप किले का दरवाजा खुला छोड़कर बेवकूफ की तरह अपनी फौज लेकर दौड़ पड़े थे। करोड़ों का खजाना लूटकर शिवाजी ने आपको मूर्ख बनाया था। इस सम्भा ने तो और भी कमाल किया। अपने ही जानवरों और लोगों की लाशें लेकर उल्टी दिशा में फेंक दीं। आप लोगों को उल्टियाँ आने लगीं और इस गड़बड़ी में अपनी रसद और बारूद किले पर पहुँचा दिया। खैर, शिवाजी का यह बच्चा भी अपने बाप की तरह हमारा बाप निकला। यह कैसी है हमारी तकदीर?" छह सम्भाजी :: 445

औरंगाबाद का महल बादशाह को कैदखाने से भी बदतर लग रहा था। अँधेरी रात में नगर द्वार पर आपातकाल की घोषणा करने वाले नगाड़े के बजने से जिस तरह कँपकँपी छूटती है, वैसी ही दशा बादशाह को डेढ़ वर्ष बीत चुका था फिर भी उसके हाथ क्या लगा? दो-तीन अच्छे सरदारों को बदलने पर भी रामशेज जैसा छोटा किला मुगलों के हाथ नहीं आया। चालीस-पचास हजार की सेना लेकर दो बड़े सरदार दो-दो बार कोंकण में भेजने के बावजूद सफलता नहीं मिली। शहजादा अकबर मिला नहीं और वह जहन्नुमी काफिर का बच्चा सम्भा पकड़ में नहीं आया। जंजीरे के कासिम और खैरियत खान के तकदीर किला तो बचा लिया किन्तु वे भी सम्भाजी से अत्यन्त भयभीत थे। बादशाह ने उन्हें बारूद और रसद से भरी जहाजें सूरत के रास्ते से भेजी थीं लेकिन बादशाह के हजार कहने पर भी सिद्दी बन्धु मराठा प्रदेश पर आक्रमण करने के लिए तैयार न थे। बादशाह के अनेक बार उकसाने पर भी गोवा का पुर्तगाली वाइसराय अपनी ओर सम्भाजी पर हथियार उठाने का साहस नहीं कर रहा था। सम्भाजी के डर से अँग्रेज अपनी कोठियों के बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं थे। स्वयं सम्भाजी त्रिचनापल्ली में अड्डा जमाकर बैठे थे। तब मैसूर के चिक्कदेवराय ने सहायता के लिए बुलाया था। लेकिन अब यह भी अपने स्वार्थ के लिए चुप बैठ गया था। हाल ही में बादशाह का छोटा शहजादा पराजित होकर वापस आया था। हंबीरराव ने उसे नीरा नदी के पार खदेड़ दिया था। इन घटनाओं ने बादशाह को विचलित कर दिया था। वह चाँदनी रात उसे काटने दौड़ रही थी। उसने असद खान से बड़े पीड़ा भरे स्वर में पूछा- "वजीरे आजम, पचीस-छब्बीस वर्ष का एक लड़का हमें हैरान करके रख दे रहा है। इसका मतलब क्या है? कौन-सी चीज नहीं है हमारे पास? खजाना?'' "वह तो बहुत है।'' "जंगी फौज? जंग बहादुर सिपाही?'' "जरूरत से कुछ ज्यादा हजरत, अपनी फौज का विशाल सागर किसी ने दूर से भी देखा तो उसे कँपकँपी छूट जाती है।'' "असल बात कुछ और है वजीरे आजम।'' बादशाह ने बड़े दुख से कहा। "यहाँ के पहाड़ों में जाने की कल्पना और सम्भाजी के नाम से अपने फौजी डरते हैं।'' बादशाह अपनी मसनद से झटके से उठा और फिर बड़ी बेचैनी से बैठ गया। बेचैनी से बड़बड़ाया-"हमारी उम्र पैंसठ साल की और वह काफिर का बच्चा पचीस-छब्बीस का होगा। एक ओर हिन्दुस्तान का शाहंशाह और दूसरी ओर गाँव के जमींदार का लौंडा। वह हमारा कुछ कर ही नहीं सकता। लेकिन हम उसे रोक 446 :: सम्भाजी

नहीं पा रहे हैं। यही हमारी पीड़ा है। असदखान...'' बादशाह के मन की दशा बहुत बिगड़ गयी थी। उसने वजीर से कहा, "चाचा जान उस कमबख्त दारा की छाया आज भी मेरा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं।" "यह रोहिला दिलेर खान दारा के ही पक्ष में था।" "हजरत, आप जरा धैर्य से काम लें। यों ही हर एक पर शक करने से सल्तनत कैसे चलेगी? आपने जब दिल्ली पर आक्रमण किया था, उसी समय दिलेरखान दारा का साथ छोड़कर आपसे आकर मिला था। उसके बाद उस बेचारे ने जहाँपनाह की खिदमत करने के अतिरिक्त और किया ही क्या ?" "लेकिन यह न भूलिए वजीरे आजम, इसी बेवकूफ दिलेरखान के हाथ मे वह काफिर का बच्चा निकल गया था। उसी समय अगर उसने सम्भा को न निकलने दिया होता तो आज ये दुर्दिन न देखने पड़ते।" "हुजूर! होती है कभी कभी आदमी से ऐसी भूल। कभी कभी थोड़ी लापरवाही हो जाती है।" बादशाह से आँख न मिलाते हुए, फिर भी स्पष्ट स्वर में वजीर ने कहा, "हुजूर को अगर याद हो ? आगरा के कैदखाने में शिवाजी और सम्भाजी दोनों सड़ रहे थे। क्या उन्हें किसी ने जानबूझकर रिहा किया था? ऐसा कोई करेगा भी क्या?" ठंडी साँस छोड़ते हुए बादशाह बहुत देर तक वहीं बैठा रहा। चार लाख जानवर लेकर उसने कितनी उम्मीद से तापी नदी को पार किया था। लेकिन महाराष्ट्र के काँटों भरे पठारों ने उसे परेशान करके रख दिया। बुरहानपुर की सीमा पार करके जब उसका हाथी दल खानदेश की ओर बढ़ रहा था, तब उसने अपने सिर की रत्नजटित टोपी दो-तीन बार हाथ में लेकर ध्यान से देखी थी। एक साथ चार शिरपेच अपनी टोपी में जोड़ने की उसकी उत्कट अभिलाषा थी। सम्भाजी के हाथों में बेड़ियाँ डालना, अपने नादान शहजादे को पकड़ना, अन्त में बीजापुर और गोलकुंडा के शियापन्थी मुसलमानों के राज्य को मिट्टी में मिलाना। बादशाह का स्वप्न था कि महाराष्ट्र के पठार पर पैर रखते ही छः महीने में पूरा प्रदेश कब्जे में कर लेंगे। जिस प्रकार हिन्दू राजा अश्वमेध यज्ञ करते थे, उसी प्रकार उत्सव मनायेंगे। लेकिन डेढ़ साल में उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा था। अपने मुकुट में सम्भाजी नाम का मयूर पंख लगाना तो दूर रहा उल्टे एक विषैला काँटा उसके कलेजे में चुभ गया था, उसे बार बार डंस रहा था, उसके हृदय को खून से तरबतर कर रहा था। उन सारी बातों का स्मरण करते हुए बादशाह त्रस्त स्वर में गुर्राया-"रामशोज, त्र्यम्बक, साल्हेर, सतारा पुणे, पुरन्दर कितनी-कितनी जगहों पर सेनायें भेजें और एक ही समय में कितनी बार आक्रमण करते रहें ?" सम्भाजी . 447

“सच है, हजरत, हर एक पेड़ का तना पकड़कर जिस प्रकार भूत बैठते हैं उसी तरह किलों की बुर्जों पर मरगठों की फौजें बैठी थीं।” बादशाह की बातें सुनकर वजीर को चुप रहना ही ठीक लगा। औरंगजेब ने आगे कहा, “शाहजादा अकबर बेवकूफ या फिर भी इन्सान भला था।” औरंगजेब की इस टिप्पणी से वजीर की भौंहें तन गयीं। तब कड़ुआ करेला खाने पर जैसा चेहरा बनता है वैसा चेहरा बनाते हुए औरंगजेब ने नफरत भरे शब्दों में कहा, “वजीर हमने जो सुना वह सच है?” “क्या जहाँपनाह ?” चिरागों की रोशनी में बादशाह की मुद्रा बहुत क्रूर लग रही थी। वह दाँत पीसते हुए बोला- “हमारा बड़ा शाहजादा मुअज्जम भी मन से सम्भा को चाहता है। इतना ही नहीं वह उन कमबख्त मरहठों के साथ मिल षड्यन्त्र कर रहा है। क्या यह सच है?” वजीर ने चुप रहना ही उचित समझा। बादशाह के शक्की स्वभाव का पता उसे पहले से था ही। औरंगजेब बहुत व्यवहार कुशल था। दिल्ली के तख्त पर अधिकार करते समय उसने शुजा, मुराद और दारा- इन सभी भाइयों के ठंडे दिमाग से मार डाला था। शुजा का साथ देने के कारण उसने अपने बड़े शहजादे मुहम्मद सुल्तान को जीवन भर के लिए बन्दीखाने में डाल दिया था। अपने जन्मदाता शाहजहाँ की दशा उसने नर्क से भी बदतर बना दी थी। अकबर की महायता करने के लिए अपनी शहजादी जेबुन्निसा को भी जन्म भर के लिए बन्दीखाने में डाल दिया था। उसने जैसा बर्ताव अपने पिता और भाइयों के साथ किया था वैसा ही बर्ताव उसके बेटे भी उसके साथ करेंगे। औरंगजेब के मन में ऐसा दृढ़ विश्वास था। इसीलिए उसने अपने शहजादों और उनकी बेगमों पर स्थायी रूप से गुप्तचर लगा रखे थे। औरंगजेब के गुप्तचर किसी शहजादे के यहाँ धोबी बनकर किसी के यहाँ बावर्ची बनकर जीवन भर चाकरी करते रहे। उनमें से प्रत्येक के अन्तःपुर में क्या चलता है ? इसकी विस्तृत खबर बादशाह को नित्य मिलती रहती थी। किन्तु अपने शक्की स्वभाव के कारण बादशाह स्वयं बहुत परेशान होता था। कभी-कभी आधी रात को बेगम उदयपुरी के सामने अपना दुख प्रकट करता था- “बेगम यह सल्तनत, यह दौलत, यह शान शौकत, जैसी सारी बातों को आग लगा दूँ? हीरे जवाहरात से खजाना भरा पड़ा है। पर बादशाह के लिए पल भर की नींद हराम हो गयी है। बेगम साहिबा, हमसे अधिक तो मस्जिद की सीढ़ियों पर सोने वाले नंगे फकीर और वहाँ के मैदान में घूमने वाले आलसी कुत्ते भी भाग्यवान हैं।” 448 :: सम्भाजी

औरंगजेब ने वजीर को अधिक सोचने का अवसर नहीं दिया। उसने ठंडी आवाज में कहा- "वजीरे-आजम हमारे उस छोटे शहजादे आजम पर भी कड़ी नजर रखिये।" "क्या किब्लाए आलम ?" औरंगजेब के संशय का भूत दूसरे शहजादे को ग्रसेगा। इसका धक्का वजीर को लगा। "हाँ, उस पर कड़ी निगाह रखो।" "निगाह? क्या बात कर रहे हैं जहाँपनाह ?" "हमारे हुक्म की सिर्फ तामील करो? उस बेवकूफ दिलेरखान और शहजादे आजम को तुरन्त वापस बुलाओ।" "मोर्चे से?" "जी हाँ, बिलकुल।" वजीर विवश हो गया। उसने दोनों को वापस आने का आदेश भेज दिया। यह समाचार सुनते ही शहजादे की बेगम और बच्चे भयभीत हो गये। उदयपुरी बेगम और शहजादी जीनतउन्निसा घबरा गयी। बादशाह के पीछे असदखान उन दोनों से मिला। उसने चिन्तित स्वर में कहा "बेगम साहिबा! बेटी जीनत! सफलता मिलने से आदमी खुश होता है।, असफलता से दुख होता है। इतनी प्रचंड सेना और तीस पैंतीस बड़े बड़े सरदार युद्ध में उतरे फिर भी बादशाह को जीत नहीं मिल पायी। उसी दर्द मे वे पागलो जैसा बर्ताव करने लगे हैं। संशय के भूत ने तो उनके दिमाग पर कब्जा कर लिया है। इस भयानक पीड़ा से उन्हें मुक्त करने के लिए महल से बाहर निकलने दीजिए। उन्हें किसी यात्रा पर ले जाइये। उनके दिमाग को थोड़ा विश्राम दीजिए।" बादशाह का मन किस तरह बहलाया जाये? यह उदयपुरी बेगम की समझ में नहीं आ रहा था। अन्त में उसे एक अच्छा विषय मिल गया। उन्होंने एक सुबह की नमाज के बाद बादशाह से प्रार्थना की-"मेरे आका अपनी जिन्दगी में इस नाचीज ने जहाँपनाह से किसी बात के लिए प्रार्थना नहीं की। अब एक ही विनती है! आप हमारे साथ एक दिन के लिए बेरूल चलें।" बादशाह ने हँसते हुए बेगम की ओर देखा। उन्होंने कहा, "वह बेरूल काफिरों का भूतखाना है। यह मालूम है न बेगम साहिबा को।" "जी अब्बाजान! पर वहाँ पर एक चमत्कार है। वहाँ की एक गुफा में एक नीलरंग का पंछी रहता है। उसे नीलकंठ कहते हैं। उस पंछी को आप एक बार सम्भाजी . 449

आँख भरकर देख लीजिए।" बादशाह ने उपहास की मुद्रा में बेगम की ओर देखा। वहाँ पर असदखान, उसका बेटा जुल्फिकारखान और बादशाह की बहू शहरबानू बेगम उपस्थित थे। उन सभी को बेगम और शहजादी साहिबा के विचित्र अनुरोध से आश्चर्य हो रहा था। बादशाह ने हँसते हुए कहा, "बेगम साहिबा सीने पर तलवार की नोंक रखने पर भी मेरे सामने कोई काफिर उस देवता का नाम लेने का साहस नहीं करेगा। इस तरह के उस नर्क में आप मुझे ले जाना चाहती हैं?" "गुस्ताखी माफ़ हजरत ! किसी फालतू निरर्थक बात के स्वामी से हम प्रार्थना करें ही कैसे?" "फिर ऐसा वहाँ क्या है?" "वही तो असली चमत्कार है हजरत ! जो व्यक्ति उस नीलकंठ को एक टक निहारता है, उसे धीरे-धीरे उस गुफा में अपने भविष्य का आईना दिखाई देने लगता है। अगले जन्म में हमें क्या होना है? जानवर कि पंछी इसका वहाँ प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है।" बादशाह का मन स्थिर नहीं था। किन्तु बेगम उदयपुरी की बताई कहानी में उसे बहुत मजा आ रहा था। अपनी लाडली शहजादी जीनत का मन भी वह तोड़ नहीं पा रहा था। दूसरे दिन शाही दल बेरूल की ओर निकला। बहू-बेगम, पोते, बच्चे सभी साथ लेकर बादशाह बेरूल के लिए निकल पड़ा। उन्हें ले जाने के लिए सजे-सजाए सत्तर हाथी, कुछ हजार घोड़े और ऊँट साथ जा रहे थे। शाम को लगभग चार बजे शाही दल बेरूल गुफा के पास पहुँचा। ऊँचा कैलाश मन्दिर देखकर बादशाह की भौंहें तन गयीं। वह जुल्फिकारखान से बोला, "बेटेऽऽ सम्भा के साथ इन मरहठों की हड्डी नरम करते ही हम इस कैलाश मन्दिर की जगह पर ही एक खूबसूरत मस्जिद खड़ी करेंगे। इस बात को याद रखना।" आखिर सभी लोग गुफा के पास पहुँचे। नीले रंग के उस पंछी की ओर औरंगजेब आँखें फाड़-फाड़कर देख रहा था। कुछ समय तक उसे कुछ साफ दिखाई नहीं पड़ा। थोड़ी देर में उसे कुछ अस्पष्ट-सा दिखाई पड़ा। वह डर गया। नहीं, उसकी मुखमुद्रा विकृत हो गयी। उसने अपने माथे का पसीना पोंछा। फिर बारीक नजर से देखकर वह चिल्लाया, "पागल कहीं के, चलो, भागो यहाँ से दूर, काफ़िरों के इस कबरिस्ता से।" बादशाह ने अपना एक छोटा-सा चबूतरा बेरूल गुफा के सामने बनाने का हुक्म दिया। वहाँ के देवता, नाचनेवाले यक्ष-किन्नर, पत्थरों में उकेरे गये पशु-पक्षी इन सभी पर बादशाह को बहुत क्रोध आ रहा था। उसने कमाठियों की टोली को 450 :: सम्भाजी

तुरन्त बुलाकर सामने की गुफाओं को नष्ट करने का आदेश दिया। कमाठियों ने अपने हथियार उठा लिए। देवताओं की छोटी-बड़ी मूर्तियों, पत्थरों में उकेरे गये पशु- पंछियों के चित्रों का विध्वंस आरम्भ हो गया। कैलाश मन्दिर के परिसर में पत्थरों पर हाथियों के अनेक चित्र उकेरे गये थे। अनेक मूर्तियाँ भी थीं। बेलदारों के मजबूत घनों से हाथियों के सिर उड़ाये गये। चारों ओर धूल ही धूल भर गयी। बादशाह जानता था कि उदयपुरी बेगम के अनुरोध पर वह इस नरक में आ पहुँचा था। इसीलिए रुष्ट बादशाह की सान्त्वना के लिए चार मीठी बातें करने की बेगम उदयपुरी का साहस नहीं हो रहा था। फिर भी उन्होंने बादशाह से कहा, "हजरत, आप इसके लिए इतना कष्ट न उठाएँ।" "यह भूतों से भरा हुआ काफिरों का पहाड़ है। इसे तोड़कर नष्ट करो। नहीं टूटता है तो जलाकर खाक कर दो।" "अब्बाजान! आप इतना कष्ट क्यों कर रहे हैं? अपने जुल्फिकार यह सब काम कर लेंगे। आपके शरीर में पहले से ही थोड़ा बुखार है। आप यहाँ से निकलें।" शहजादी ने सुझाव दिया। उदयपुरी बेगम मीठा बोलकर बादशाह को उस पहाड़ से दूर ले गयीं। उस रात बादशाह का पड़ाव बेरूल गाँव के पास पड़ा। अभेद्य चट्टानों से बनी मूर्तियों को तोड़ पाना आसान नहीं था। कारीगरों की अनेक पीढ़ियों ने खून पसीना एक करके इस वैभववान वस्तु को खड़ा किया था। मुगलों के बेलदारों और कमाठी बहुत देर तक प्रहार करते हुए थक गये थे। उनके हाथों से खून बहने लगा। कुछ छोटी-मोटी मूर्तियाँ विकृत अवश्य हुईं। किन्तु भव्य मेहराबें, सभामंडप, मन्दिर आदि अभी भी वैसे ही खड़े थे। जुल्फिकार ने निश्चय किया कि इस पागल बादशाह को समझाया जाय। उसने अपने सैनिकों से घास की गठियाँ और गोबर गाड़ियों में भरकर लाने को कहा। मन्दिर में घास और गोबर भरकर उसमें आग लगा दी गयी। रात में आग की लपटें आसमान छूने लगीं। अनेक मूर्तियाँ प्रहारों से बच गयीं थी। किन्तु दीवारों पर बने अमर चित्रों और उनके रंगों को आग से असीम हानि हो रही थी। बेरूल की गुफा से निकलने वाली आग की लपटों को बादशाह अपने डेरे से देख रहा था। बादशाह का मन अब प्रसन्न हो गया। दो दिन बाद उदयपुरी बेगम ने देखा कि बादशाह का मन प्रसन्न है और बेटी जीनत भी घर में नहीं है तो उसने धीमी आवाज में बादशाह से पूछा- "हजरत, उस दिन बेरूल में गुफा के अन्दर आपने ऐसा क्या देख लिया जो आपको इतना अधिक क्रोध आ गया?" "सुअरऽ" "सुअरऽऽ" ठंडी आवाज में औरंगजेब ने ही बेगम से सवाल पूछना आरम्भ कर दिया- "क्या मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि अगले जन्म में सुअर बन जाऊँ?" बादशाह के उस प्रश्न का बेगम ने कोई उत्तर नहीं दिया। सम्भाजी : 451

सात औरंगजेब के यहाँ गहरा सन्नाटा था। बादशाह ने कासिमखान, रणमस्तखान, पन्नी, खानजहानखान, बक्शी बरामदखान, मुहम्मद अमीन, असदखान, जुल्फिकारखान जैसे अपने खास सरदारों को विचार-विमर्श के लिए बुलाया था। किन्तु सभी लोग अन्दर से बहुत घबराये हुए थे। बादशाह की ऐसी अस्थिर और संशयी मनःस्थिति पहले कभी नहीं देखी गयी थी। दिलेरखान जैसे जिन्दगी भर के बादशाह के सेवक की हालत बुरी हो गयी थी। उसे लड़ाई के मोर्चे से वापस बुला लिया गया था। उसके आगे-पीछे बादशाह की पाँच हजार की सेना लगी थी। उसके हाथ में अभी तक जंजीरें नहीं पड़ी थीं किन्तु वह दिन अब अधिक दूर नहीं था। उसे पूरी तरह अपमानित करके उसे खींचकर वापस लाया जा रहा था। वापसी की यात्रा में पड़ाव की जगहों पर कड़ा पहरा बिठाया जाता है। बादशाह का चेहरा खिन्न था। वह हँसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन हँसी आ नहीं रही थी। वह उदास होकर बोला, ‘‘खैर, असदखान डेढ़-दो साल से सम्भा के इस मनहूस मुल्क में इतनी बड़ी सेना लेकर इधर उधर घूम रहे हैं। भेड़ बकरियाँ लेकर घूमने वाले गड़ेरियों की तरह हम भी यहाँ वहाँ भटक रहे हैं। पर बताइए क्या लगा हमारे हाथ? सह्याद्रि की पहाड़ी में उस काफिर के बच्चे सम्भा का हुड़दंग हम एक बार समझ सकते हैं। किन्तु यहाँ अहमदनगर और बराह तक वह हंबीरराव रात-दिन दौड़ रहा है। दस-पन्द्रह हजार की फौज लेकर हमारे प्रदेश को बर्बाद कर रहा है।’’ ‘‘हजरत, वह हंबीरराव पूरा शैतान है। उसके घोड़ों के पैरों में आसमानी बिजली के घुँघरू बँधे हैं। शत्रु ही नहीं हमारे सैनिक भी खुलेआम यही बात कहते हैं।’’ मुमदरखान बीच में ही उठकर बोला। ‘‘बैठ जाओ मूर्ख! यह तो उस काफिर की बदनामी नहीं तारीफ है, बेवकूफ!’’ बादशाह गुर्रया। आज बादशाह का क्रोध देखने लायक हो गया था। असदखान भी डर गया था। उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। औरंगजेब ने जैसे ही अपनी निगाह घुमाई सभी सिर झुकाकर खड़े हो गये। बादशाह ने कहा, ‘‘आखिर मैं भी इन्सान हूँ। आप दख्खन में एक दिन में बहुत बड़ी विजय प्राप्त कर लें ऐसा मैं नहीं करता। मेरा सवाल बस इतना है—जुल्फिकारखान?’’ 452 :: सम्भाजी

“जी मेरे आका।” जुल्फिकारखान ने आदर से घुटने टेक दिये। “सिर्फ इतना ही बता दो कि डेढ़-दो वर्षों में उस सम्भा के चेहरे पर एक भी खरोंच आयी है? क्यूँऽ?” बादशाह के उस प्रश्न से जुल्फिकारखान की ही नहीं, सभी की गर्दन शर्म से नीचे झुक गयी। सभी की आवाज बन्द हो गयी। बादशाह धीरे से उस बैठक से उठा। उसने बड़े रूखे शब्दों में इतना ही कहा, “मैंने अपने लिए फैसला कर लिया है। मैं दिल्ली वापस जा रहा हूँ। आक्रमण की जिम्मेदारी सँभालने के लिए शहजादा मुअज्जम, हमारे बहादुरखान कोकल्ताश साहब, ये वजीरे आजम असदखान और आप सभी हर तरह से काबिल हैं।” औरंगजेब अपने ऊँचे आसन से धीरे-धीरे उतरकर नीचे आया। उसका यह क्रोध हमेशा की तरह नहीं था। आजकल उसकी मनोदशा में अस्थिरता, अपयश, आदि उत्पन्न निराशा का समावेश था। बादशाह का निर्णय अकाट्य था। इसलिए सभी डरे हुए सरदार अपने में सबसे बुजुर्ग और जिम्मेदार असदखान की ओर देखने लगे। बातचीत के दौरान 'तोबाऽऽ, तोबाऽऽ' ' या अल्लाह' जैसे पीड़ाबोधक उद्गार निकलने लगे। असदखान से भी रहा नहीं गया। वह वैसे ही आगे की ओर दौड़ा और औरंगजेब के पैरों पर गिर गया। उसने बादशाह का दुर्बल पीला हाथ अपने हाथ की ओर खींचा। वह जोर-जोर से रोते हुए बोला, “आप रिश्ते नाते में मेरे लड़के लगते हो। लेकिन मेरे आका आपकी शक्ति समुद्र जैसी है। हमें छोड़कर कहाँ जा रहे हो, किब्लाए आलम?” “नहीं चाचाजान मुझे मत रोको...।” “जहाँपनाह, आप हमारे इस्लाम के रखवाले हैं। हमारे सरताज हैं, जिन्दा पीर हैं। आप हैं इसलिए यह सेना है, यह सल्तनत है। आप वापस चले जा रहे हैं। यह समाचार यदि उस सम्भा को मिला तो आप की अनुपस्थिति में वह हमारी सेना को कुत्ते की मौत मारेगा। हममें से किसी का काफिला दिल्ली-आगरा तक नहीं पहुँचेगा।” असदखान के बाद जुल्फिकारखान, फिर बरामदखान ऐसे एक-एक करके सभी बादशाह के सामने आ गये। वे घुटनों पर बैठकर, आसमान की ओर हाथ फैलाकर बादशाह को मानने लगे। औरंगजेब को विश्वास हुआ कि सरदारों की प्रार्थनाएँ अक्षरशः सत्य हैं। वह मन में प्रसन्न हुआ। फिर मन्दगति से चलता हुआ अपने ऊँचे आसन पर जाकर बैठ गया। फिर भी उसके सीने की आग शान्त नहीं हुई। सभी की ओर निगाह घुमाते हुए बादशाह ने धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में कहा, सम्भाजी :: 453

"आप सभी इस्लाम के रखवाले हो। इस कमबख्त दक्षिण देश में हम बदनसीबी से अटके पड़े हैं। गोलकुंडा की कुतुबशाही, बीजापुर की आदिलशाही की शिया मुसलमानों की हुकूमतें काफिरों से कम खतरनाक नहीं हैं। और दोस्तोऽऽ यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि यह सम्भा नाम का एक मामूली जमींदार का नटखट बेटा सालों-साल आपके शाहंशाह को नचाता रहा है? सताता रहा है? तो बोलो—दिल से इस्लामी कौम का काम करोगे?" "जी हुजूरऽऽ! जी आकाऽऽ!" इस प्रस्ताव को चारों ओर से प्रतिसाद मिल रहा था। "अपने शाहंशाह की खातिर अपने इस्लाम की खातिर हम मर मिटेंगे।" "बिलकुल हजरत हम जान की कुर्बानी देंगे।" वहाँ के सभी लोगों पर आलमगीर ने जादू कर दिया था। वहाँ का हर एक सदस्य जरूरत पड़ने पर खाई में कूदने को तैयार था। किन्तु बादशाह को अभी समाधान नहीं मिल रहा था। उसने अपने सिर का मुकुट हाथ में लिया। उस जरीदार टोप की कला अपूर्व थी। उसमें बहुत महँगे हीरे-जवाहरात जड़े थे। बादशाह के उस किरीट की प्रभा इतनी चमकदार थी कि हीरों-जवाहरातों से निकलने वाला प्रकाश उसके चेहरे को भी मंडित कर रहा था। औरंगजेब ने पलभर में उस किरीट को हाथ से ऊपर उठाया और दूसरे ही क्षण जोर से बाईं ओर फेंक दिया। वह किरीट दीवार से टकराकर नीचे गिर गया। उसमें जड़े रत्न और मोती टूटकर बिखर गये। अपने ऊँचे आसन पर औरंगजेब सिर उठाये खड़ा था। उसकी आँखों में झलकता निश्चय, उसकी बँधी मुट्ठियाँ, उसकी फूली हुई छाती, उसके चेहरे की तनी हुई नसें उस पैंसठ वर्ष के शाहंशाह का कुछ और ही रूप प्रकट कर रही थीं। उसके माथे पर लटकते सुनहरे-सफेद बाल और आँखें किसी को भी आकर्षित कर सकते थे। नीचे बिखरे हुए किरीट की ओर उसने संकेत किया। सभी की निगाहें उस ओर मुड़ गयीं। उस समय जैसे किसी महावृक्ष की डाल टूटकर नीचे गिरी हो ऐसे बादशाह गरजा— "इस्लाम के रखवालेऽ दोस्तोऽऽ, यह आलगगीर कसम खाता है कि जब तक हम उस काफिर के बच्चे सम्भा को दक्षिण की इस सीमा से पार नहीं कर देते, उसके टुकड़े टुकड़े करके उसे जिन्दा फाड़ नहीं देते, तब तक यह किरीट यह राजमुकुट मैं अपने सिर पर नहीं पहनूँगा।" 454 :: सम्भाजी

गोवा पर आक्रमण एक जैसे कोई व्यक्ति बीमारी के बाद स्वस्थ होकर पुनः अपने नियमित कार्य पर लग जाये, उसी प्रकार असफलताओं और निराशाओं से बाहर निकलकर औरंगजेब ने भी अपने कार्य को सँभाल लिया। जीवन के पैंसठवें साल में भी औरंगजेब ने नयी आशाओं के साथ फिर से अपने कार्य को आरम्भ किया। उसकी इस अभिनव तत्परता ने सरदारों, शहजादों, पोतों आदि सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। असदखान अपने स्तर पर लोगों को बड़े गर्व से बता रहा था—‘‘आलमगीर के लिए काम काम बस काम, यही एक नित्य की धुन है।’’ किसी बड़ी मुहिम में संलग्न होने पर भी आलमगीर अपनी विस्तृत सल्तनत के हर कोने की खबर रखता था। इन दिनों फौजदार बलोचखान का लड़का अबूमुहम्मद बादशाह के महल में आते जाते दिखाई पड़ता था। तेईस वर्ष के इस लड़के के बादशाह के साथ बढ़ते सम्बन्ध से लोग आश्चर्यचकित थे। उस दिन बादशाह ने जानबूझकर अबूमुहम्मद को अपनी बैठक में बुलाया। यह व्यक्तिगत बैठक थी, जिसमें विशिष्ट सरदार और अधिकारी उपस्थित थे। किसी के मुँह पर उसकी प्रशंसा करना औरंगजेब के स्वभाव में नहीं था। किन्तु उस दिन अबूमुहम्मद की की गयी खुली प्रशंसा से सभी बुजुर्ग चकित थे। अपने शहजादे मुअज्जम की ओर देखते हुए बादशाह प्रसन्न होकर बोला, ‘‘शहजादे, इस छोकरे की कच्ची उम्र को मत देखो, इसकी करामात को देखो।’’ शाहंशाह के संकेत करते ही, अबूमुहम्मद ने काँख में दबाए नक्शे की तहें खोलीं और उसे बैठक के सामने फैला दिया। सम्पूर्ण सह्याद्रि पर्वत का स्पष्ट नक्शा देखकर सभी की आँखें चमक उठीं। बादशाह प्रसन्नता से पूछने लगा, ‘‘बेटे अबू! इन पर्वत श्रृंखलाओं के बारे में सम्भाजी :: 455