छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुरन्त बुलाकर सामने की गुफाओं को नष्ट करने का आदेश दिया। कमाठियों ने अपने हथियार उठा लिए। देवताओं की छोटी-बड़ी मूर्तियों, पत्थरों में उकेरे गये पशु- पंछियों के चित्रों का विध्वंस आरम्भ हो गया। कैलाश मन्दिर के परिसर में पत्थरों पर हाथियों के अनेक चित्र उकेरे गये थे। अनेक मूर्तियाँ भी थीं। बेलदारों के मजबूत घनों से हाथियों के सिर उड़ाये गये। चारों ओर धूल ही धूल भर गयी। बादशाह जानता था कि उदयपुरी बेगम के अनुरोध पर वह इस नरक में आ पहुँचा था। इसीलिए रुष्ट बादशाह की सान्त्वना के लिए चार मीठी बातें करने की बेगम उदयपुरी का साहस नहीं हो रहा था। फिर भी उन्होंने बादशाह से कहा, "हजरत, आप इसके लिए इतना कष्ट न उठाएँ।" "यह भूतों से भरा हुआ काफिरों का पहाड़ है। इसे तोड़कर नष्ट करो। नहीं टूटता है तो जलाकर खाक कर दो।" "अब्बाजान! आप इतना कष्ट क्यों कर रहे हैं? अपने जुल्फिकार यह सब काम कर लेंगे। आपके शरीर में पहले से ही थोड़ा बुखार है। आप यहाँ से निकलें।" शहजादी ने सुझाव दिया। उदयपुरी बेगम मीठा बोलकर बादशाह को उस पहाड़ से दूर ले गयीं। उस रात बादशाह का पड़ाव बेरूल गाँव के पास पड़ा। अभेद्य चट्टानों से बनी मूर्तियों को तोड़ पाना आसान नहीं था। कारीगरों की अनेक पीढ़ियों ने खून पसीना एक करके इस वैभववान वस्तु को खड़ा किया था। मुगलों के बेलदारों और कमाठी बहुत देर तक प्रहार करते हुए थक गये थे। उनके हाथों से खून बहने लगा। कुछ छोटी-मोटी मूर्तियाँ विकृत अवश्य हुईं। किन्तु भव्य मेहराबें, सभामंडप, मन्दिर आदि अभी भी वैसे ही खड़े थे। जुल्फिकार ने निश्चय किया कि इस पागल बादशाह को समझाया जाय। उसने अपने सैनिकों से घास की गठियाँ और गोबर गाड़ियों में भरकर लाने को कहा। मन्दिर में घास और गोबर भरकर उसमें आग लगा दी गयी। रात में आग की लपटें आसमान छूने लगीं। अनेक मूर्तियाँ प्रहारों से बच गयीं थी। किन्तु दीवारों पर बने अमर चित्रों और उनके रंगों को आग से असीम हानि हो रही थी। बेरूल की गुफा से निकलने वाली आग की लपटों को बादशाह अपने डेरे से देख रहा था। बादशाह का मन अब प्रसन्न हो गया। दो दिन बाद उदयपुरी बेगम ने देखा कि बादशाह का मन प्रसन्न है और बेटी जीनत भी घर में नहीं है तो उसने धीमी आवाज में बादशाह से पूछा- "हजरत, उस दिन बेरूल में गुफा के अन्दर आपने ऐसा क्या देख लिया जो आपको इतना अधिक क्रोध आ गया?" "सुअरऽ" "सुअरऽऽ" ठंडी आवाज में औरंगजेब ने ही बेगम से सवाल पूछना आरम्भ कर दिया- "क्या मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि अगले जन्म में सुअर बन जाऊँ?" बादशाह के उस प्रश्न का बेगम ने कोई उत्तर नहीं दिया। सम्भाजी : 451