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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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“जी मेरे आका।” जुल्फिकारखान ने आदर से घुटने टेक दिये। “सिर्फ इतना ही बता दो कि डेढ़-दो वर्षों में उस सम्भा के चेहरे पर एक भी खरोंच आयी है? क्यूँऽ?” बादशाह के उस प्रश्न से जुल्फिकारखान की ही नहीं, सभी की गर्दन शर्म से नीचे झुक गयी। सभी की आवाज बन्द हो गयी। बादशाह धीरे से उस बैठक से उठा। उसने बड़े रूखे शब्दों में इतना ही कहा, “मैंने अपने लिए फैसला कर लिया है। मैं दिल्ली वापस जा रहा हूँ। आक्रमण की जिम्मेदारी सँभालने के लिए शहजादा मुअज्जम, हमारे बहादुरखान कोकल्ताश साहब, ये वजीरे आजम असदखान और आप सभी हर तरह से काबिल हैं।” औरंगजेब अपने ऊँचे आसन से धीरे-धीरे उतरकर नीचे आया। उसका यह क्रोध हमेशा की तरह नहीं था। आजकल उसकी मनोदशा में अस्थिरता, अपयश, आदि उत्पन्न निराशा का समावेश था। बादशाह का निर्णय अकाट्य था। इसलिए सभी डरे हुए सरदार अपने में सबसे बुजुर्ग और जिम्मेदार असदखान की ओर देखने लगे। बातचीत के दौरान 'तोबाऽऽ, तोबाऽऽ' ' या अल्लाह' जैसे पीड़ाबोधक उद्गार निकलने लगे। असदखान से भी रहा नहीं गया। वह वैसे ही आगे की ओर दौड़ा और औरंगजेब के पैरों पर गिर गया। उसने बादशाह का दुर्बल पीला हाथ अपने हाथ की ओर खींचा। वह जोर-जोर से रोते हुए बोला, “आप रिश्ते नाते में मेरे लड़के लगते हो। लेकिन मेरे आका आपकी शक्ति समुद्र जैसी है। हमें छोड़कर कहाँ जा रहे हो, किब्लाए आलम?” “नहीं चाचाजान मुझे मत रोको...।” “जहाँपनाह, आप हमारे इस्लाम के रखवाले हैं। हमारे सरताज हैं, जिन्दा पीर हैं। आप हैं इसलिए यह सेना है, यह सल्तनत है। आप वापस चले जा रहे हैं। यह समाचार यदि उस सम्भा को मिला तो आप की अनुपस्थिति में वह हमारी सेना को कुत्ते की मौत मारेगा। हममें से किसी का काफिला दिल्ली-आगरा तक नहीं पहुँचेगा।” असदखान के बाद जुल्फिकारखान, फिर बरामदखान ऐसे एक-एक करके सभी बादशाह के सामने आ गये। वे घुटनों पर बैठकर, आसमान की ओर हाथ फैलाकर बादशाह को मानने लगे। औरंगजेब को विश्वास हुआ कि सरदारों की प्रार्थनाएँ अक्षरशः सत्य हैं। वह मन में प्रसन्न हुआ। फिर मन्दगति से चलता हुआ अपने ऊँचे आसन पर जाकर बैठ गया। फिर भी उसके सीने की आग शान्त नहीं हुई। सभी की ओर निगाह घुमाते हुए बादशाह ने धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में कहा, सम्भाजी :: 453