छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"आप सभी इस्लाम के रखवाले हो। इस कमबख्त दक्षिण देश में हम बदनसीबी से अटके पड़े हैं। गोलकुंडा की कुतुबशाही, बीजापुर की आदिलशाही की शिया मुसलमानों की हुकूमतें काफिरों से कम खतरनाक नहीं हैं। और दोस्तोऽऽ यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि यह सम्भा नाम का एक मामूली जमींदार का नटखट बेटा सालों-साल आपके शाहंशाह को नचाता रहा है? सताता रहा है? तो बोलो—दिल से इस्लामी कौम का काम करोगे?" "जी हुजूरऽऽ! जी आकाऽऽ!" इस प्रस्ताव को चारों ओर से प्रतिसाद मिल रहा था। "अपने शाहंशाह की खातिर अपने इस्लाम की खातिर हम मर मिटेंगे।" "बिलकुल हजरत हम जान की कुर्बानी देंगे।" वहाँ के सभी लोगों पर आलमगीर ने जादू कर दिया था। वहाँ का हर एक सदस्य जरूरत पड़ने पर खाई में कूदने को तैयार था। किन्तु बादशाह को अभी समाधान नहीं मिल रहा था। उसने अपने सिर का मुकुट हाथ में लिया। उस जरीदार टोप की कला अपूर्व थी। उसमें बहुत महँगे हीरे-जवाहरात जड़े थे। बादशाह के उस किरीट की प्रभा इतनी चमकदार थी कि हीरों-जवाहरातों से निकलने वाला प्रकाश उसके चेहरे को भी मंडित कर रहा था। औरंगजेब ने पलभर में उस किरीट को हाथ से ऊपर उठाया और दूसरे ही क्षण जोर से बाईं ओर फेंक दिया। वह किरीट दीवार से टकराकर नीचे गिर गया। उसमें जड़े रत्न और मोती टूटकर बिखर गये। अपने ऊँचे आसन पर औरंगजेब सिर उठाये खड़ा था। उसकी आँखों में झलकता निश्चय, उसकी बँधी मुट्ठियाँ, उसकी फूली हुई छाती, उसके चेहरे की तनी हुई नसें उस पैंसठ वर्ष के शाहंशाह का कुछ और ही रूप प्रकट कर रही थीं। उसके माथे पर लटकते सुनहरे-सफेद बाल और आँखें किसी को भी आकर्षित कर सकते थे। नीचे बिखरे हुए किरीट की ओर उसने संकेत किया। सभी की निगाहें उस ओर मुड़ गयीं। उस समय जैसे किसी महावृक्ष की डाल टूटकर नीचे गिरी हो ऐसे बादशाह गरजा— "इस्लाम के रखवालेऽ दोस्तोऽऽ, यह आलगगीर कसम खाता है कि जब तक हम उस काफिर के बच्चे सम्भा को दक्षिण की इस सीमा से पार नहीं कर देते, उसके टुकड़े टुकड़े करके उसे जिन्दा फाड़ नहीं देते, तब तक यह किरीट यह राजमुकुट मैं अपने सिर पर नहीं पहनूँगा।" 454 :: सम्भाजी