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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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सूर्याजी ने मुँह की तम्बाकू एक ओर थूक दी और धीरे-से कहा, "सुभान, तुमने अच्छी याद दिलाई। शेलार मामा कुश्ती खेल रहे थे तब उन्होंने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही थी।" "कौन-सी?" "उन्होंने कहा था कि जिस सुबह मुर्गा अधिक जोर से बोले तो समझना चाहिए कि कुछ-न-कुछ गड़बड़ है।" तमाशा देखने वालों के बीच से सूर्याजी पीछे हटे। पीछे के लोगों को धीरे से संकेत किया। देखते-ही-देखते दो सौ लोग चुपचाप अँधेरे में निकल गये। सामने जो शोर हो रहा था उसकी अपेक्षा पीछे की ओर पूर्ण शान्ति थी। पीछे की ओर से कुछ मुगल सैनिक चुपचाप किले पर चढ़ रहे थे। वे पेड़ों से रस्सियाँ बाँधकर अपने साथियों की सहायता कर रहे थे। रस्सियों के सहारे मुगल होशियार बन्दरों की तरह ऊपर सरक रहे थे। झाड़ियों को पकड़कर, कहीं-कहीं रस्सियाँ बाँधकर उनसे लटकते हुए, अपने पीछे आने वालों को सहारा देते हुए धीरे-धीरे ऊपर सरक रहे थे। अन्ततः तीन चार जन एक साथ ऊपर आ गये। उनके सिर तट से ऊपर दिखे नहीं कि मराठों की गुलेलों के रबड़ तन गये। मुगलों के माथे पर सटासट बड़े-बड़े पत्थर टकराये। 'अल्लाऽऽ', 'अरे भागोऽऽ' जैसी करुण चीत्कारों से वन प्रदेश की आँखें बाहर आ गयीं। ऊपर चढ़ने वाले धड़ाधड़ नीचे गिरने लगे। 'सम्भाजी महाराज की जयऽऽ!' 'शिवाजी महाराज की जयऽऽ'। किले के ऊपर आयी आफत का अन्दाजा शहाबुद्दीन को हो गया। तब तक मराठे आगे आ चुके थे। जो लोग दिखाई दिये उन्हें ऊपर के ऊपर ही सपासप काटकर रख दिया। जो बचे वे पेड़ों और रस्सियों का सहारा लेकर नीचे उतरने लगे। उसी समय किले के बुर्ज से बड़े-बड़े पत्थर और तेल-भीगी जलती मशालें नीचे की ओर फेंके जाने लगे। कुछ लोग पत्थरों के तो कुछ आग के शिकार बने। चार सौ सैनिकों में से केवल बीस पचीस मुगल सैनिक ही बच पाये। शेष सभी को इस काली रात ने निगल लिया। रातभर जागते रहने से शहाबुद्दीन थक गया था। वह दिनभर अपने शिविर में आराम करता रहा। किन्तु पराजय के कारण उसका सिर फटा जा रहा था। तलहटी में दिन भर सामान बाँधने का कार्य होता रहा। कनातों की डोरियाँ लपेटी जा रही थीं। बीच बीच में शहाबुद्दीन की दुखती आँखें किले की ओर क्रोध से देख लेती थीं। सामने का वह पत्थर, वह दरवाजा, वह बुर्ज देखकर वह संतृप्त होता था। इस अशुभ जगह में रुकने की उसकी बिलकुल इच्छा नहीं थी। आज रात को उसे नासिक के पास कहीं रुकना था। शहाबुद्दीन ने घोड़े पर सवार होते-होते अपने सम्भाजी 443