छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारा बनवाई गयी लकड़ी की मीनार की ओर देखा तो उसे बहुत क्रोध आया। सामान बाँधने का काम उसने बन्द करवा दिया। पाँच सौ सैनिकों को साथ लेकर लकड़ी की मीनार की ओर दौड़ पड़ा। उस मीनार को बनाने के लिए हजारों लोगों ने तीन महीने कार्य किया था। किन्तु अब शहाबुद्दीन को इसकी कोई चिन्ता नहीं थी। उसने अपने सैनिकों को घास इकट्ठा करने के लिए कहा। मीनार के चारों ओर घास बिछा दी गयी। शहाबुद्दीन क्रोध से लाल हो गया था। अपनी आँखों का आँसू पोंछते हुए उसने घास में आग लगा दी। घास जलने लगी, उसके साथ मीनार भी जलने लगी। बहादुरखान दौड़ता हुआ वहाँ आया। शहाबुद्दीन का हाथ पकड़कर पूछने लगा— "आप पागल तो नहीं हो गये हैं?" "नहीं खान साहब, मैं अपने अशुभ हाथ की कोई निशानी यहाँ नहीं छोड़ना है। आप नये सिरे से सब कुछ शुरू करो, अल्लाह और बादशाह को जीत हासिल कराओ।" रात में वह महाकाय मीनार धाड़-धाड़ जल रही थी। उसका प्रकाश चारों ओर फैल रहा था। उस जंगल से शहाबुद्दीन का घोड़ा वापस जा रहा था। आँखों से निकलकर दाढ़ी पर गिरने वाले आँसुओं को शहाबुद्दीन बड़े कष्ट से पोंछ रहा था। पाँच पूरे महाराष्ट्र में मराठी सेना और मुगल सेना में जगह-जगह पर लड़ाई हो रही थी। दोनों ने जगह-जगह पर अपने झंडे गाड़े और कहीं-कहीं उखाड़े थे। किन्तु रामशेज के चारों ओर मुगल सेना का घेरा हट नहीं रहा था। मराठे मधुमक्खियों की तरह उन्हें डसते रहते थे। किसी को भी किले के ऊपर सरकने नहीं दे रहे थे। हमेशा की तरह बहादुरखान अत्यन्त हताश होकर किले की ओर देख रहा था। उसके साईस से उसकी यह दशा देखी न गयी। उसने दबी आवाज में कहा— "अजी हुजूर, छोटा मुँह बड़ी बात कर रहा हूँ। व्यर्थ में समय क्यों जाया कर रहे हैं? किसी मान्त्रिक से सलाह क्यों नहीं लेते?" "चुप बैठ, बेवकूफ!" खान साहब ने डाँटते हुए कहा। "लेकिन हुजूर, मरगठों ने भूत वश में किया है इसीलिए मैंने कहा...।" "हर बीमारी का इलाज रहता है तो भूत-प्रेत का क्यों नहीं?" 444 :: सम्भाजी