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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 793 में से

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“सच है, हजरत, हर एक पेड़ का तना पकड़कर जिस प्रकार भूत बैठते हैं उसी तरह किलों की बुर्जों पर मरगठों की फौजें बैठी थीं।” बादशाह की बातें सुनकर वजीर को चुप रहना ही ठीक लगा। औरंगजेब ने आगे कहा, “शाहजादा अकबर बेवकूफ या फिर भी इन्सान भला था।” औरंगजेब की इस टिप्पणी से वजीर की भौंहें तन गयीं। तब कड़ुआ करेला खाने पर जैसा चेहरा बनता है वैसा चेहरा बनाते हुए औरंगजेब ने नफरत भरे शब्दों में कहा, “वजीर हमने जो सुना वह सच है?” “क्या जहाँपनाह ?” चिरागों की रोशनी में बादशाह की मुद्रा बहुत क्रूर लग रही थी। वह दाँत पीसते हुए बोला- “हमारा बड़ा शाहजादा मुअज्जम भी मन से सम्भा को चाहता है। इतना ही नहीं वह उन कमबख्त मरहठों के साथ मिल षड्यन्त्र कर रहा है। क्या यह सच है?” वजीर ने चुप रहना ही उचित समझा। बादशाह के शक्की स्वभाव का पता उसे पहले से था ही। औरंगजेब बहुत व्यवहार कुशल था। दिल्ली के तख्त पर अधिकार करते समय उसने शुजा, मुराद और दारा- इन सभी भाइयों के ठंडे दिमाग से मार डाला था। शुजा का साथ देने के कारण उसने अपने बड़े शहजादे मुहम्मद सुल्तान को जीवन भर के लिए बन्दीखाने में डाल दिया था। अपने जन्मदाता शाहजहाँ की दशा उसने नर्क से भी बदतर बना दी थी। अकबर की महायता करने के लिए अपनी शहजादी जेबुन्निसा को भी जन्म भर के लिए बन्दीखाने में डाल दिया था। उसने जैसा बर्ताव अपने पिता और भाइयों के साथ किया था वैसा ही बर्ताव उसके बेटे भी उसके साथ करेंगे। औरंगजेब के मन में ऐसा दृढ़ विश्वास था। इसीलिए उसने अपने शहजादों और उनकी बेगमों पर स्थायी रूप से गुप्तचर लगा रखे थे। औरंगजेब के गुप्तचर किसी शहजादे के यहाँ धोबी बनकर किसी के यहाँ बावर्ची बनकर जीवन भर चाकरी करते रहे। उनमें से प्रत्येक के अन्तःपुर में क्या चलता है ? इसकी विस्तृत खबर बादशाह को नित्य मिलती रहती थी। किन्तु अपने शक्की स्वभाव के कारण बादशाह स्वयं बहुत परेशान होता था। कभी-कभी आधी रात को बेगम उदयपुरी के सामने अपना दुख प्रकट करता था- “बेगम यह सल्तनत, यह दौलत, यह शान शौकत, जैसी सारी बातों को आग लगा दूँ? हीरे जवाहरात से खजाना भरा पड़ा है। पर बादशाह के लिए पल भर की नींद हराम हो गयी है। बेगम साहिबा, हमसे अधिक तो मस्जिद की सीढ़ियों पर सोने वाले नंगे फकीर और वहाँ के मैदान में घूमने वाले आलसी कुत्ते भी भाग्यवान हैं।” 448 :: सम्भाजी