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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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इन सब को बताओ।" "जहाँपनाह ! यह सह्याद्रि पर्वत, बेर, बबूल जैसे अनेक काँटेदार वृक्षों के जंगल से भरा है। इसमें बड़ी खतरनाक पहाड़ियाँ और गहरी घाटियाँ हैं।" "कुल मिलाकर कितने रास्ते और कितने घाट हैं?" बादशाह ने प्रश्न किया, "जहाँपनाह, सह्याद्रि के इन कठिन घाटों को पार करने के लिए कुल मिलाकर छोटे-बड़े तीन सौ साठ रास्ते हैं जिनमें पैंसठ रास्ते ऐसे हैं जिनसे हाथी, ऊँट आदि लेकर जाया जा सकता है।" "और बचे हुए दूसरे जंगली रास्ते?" "वे बहुत छोटे और बड़े खतरनाक हैं। वहाँ से गुजरते हुए तो शेर भी डरते हैं।" मुहम्मद पर सभी को आश्चर्य हो रहा था। मुहम्मद के सम्बन्ध में सभी के मन में उठ रहा एक प्रश्न बादशाह के मुँह से बाहर आया, "बेटे इतनी छोटी-छोटी बातों की जानकारी तुमने कैसे हासिल की ?" "हजरत, पहाड़ों और नदियों के साथ घूमना मेरा बचपन का शौक है। यहाँ की पर्वत श्रृंखलाओं को देखने के उद्देश्य से ही छः वर्ष पहले अपने क्षेत्र से मैं यहाँ आया। अनेक साधुओं, फकीरों, बैरागियों की संगति में मैंने यहाँ की पहाड़ियों के चप्पे-चप्पे को छान मारा। अपने इसी अनुभव से मैंने यह नक्शा बनाया जिससे भविष्य में मेरे जैसे यात्रियों के काम आये।" औरंगजेब ने अपने पास के कच्चे नक्शे बाहर निकाले। उनका सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण किया। अबूमुहम्मद के नक्शे के कुछ स्थलों पर उसने उँगली रखी। औरंगजेब के इस सूक्ष्म अध्ययन से अबूमुहम्मद भी चकित हुआ। बादशाह ने अबूमुहम्मद को मुल्यवान वस्त्र और हीरे जवाहरात देकर सम्मानित किया। बादशाह ने उसी समय वजीर से कहा, "इसी दिशा से अपना पूरा जोर लगाओ। सह्याद्रि की इन ऊँची पहाड़ियों और गुफाओं में की जानकारी प्राप्त करो। इस इलाके के रहने वाले लोगों को ढूँढ़ो। इन पहाड़ियों पर झटपट चढ़ जाने वाले लोगों को अपनी फौज में भर्ती करो, उन्हें मुँह माँगी तनख्वाह दो।" सम्भाजी की चुनौतियों का करारा जवाब देने और अन्ततः बेड़ियों में जकड़ने का आलमगीर ने निश्चय कर दिया था। नित्य की भाँति रत्नजड़ित मुकुट आज उसके सर पर नहीं था। मुकुटहीन उसका नंगा सिर भौंड़ा और कलाहीन लग रहा था ऐसा लगता था कि अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का उसने पक्का निश्चय कर लिया है। औरंगजेब ने अपने सरदारों से कहा, "जुल्फिकार, वह संभा अपनी फौज के साथ गोवा की ओर बढ़ रहा है। फिरंगियों को पराजित करने का उसका पक्का इरादा है। ऐसी खबर मुझे मिली है।" 456 :: सम्भाजी