छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी ओर बढ़ेगा। दोनों फौजें यहाँ पहाड़ और निजामपुर के पास मिलेंगी। दोनों फौजें अपनी पूरी ताकत से काफिरों की इस पत्थर की राजधानी को बारूद लगाकर सिंहासन के साथ नीचे पटक देंगी।" बादशाह के मायाजाल के उस विलक्षण फैलाव को देखकर सभी सरदार अवाक् थे। सभी बादशाह की प्रशंसा करने लगे। तब बादशाह ने कहा, "इतने से खुश न हो जाइए। अपनी-अपनी जिम्मेदारी पर ध्यान दीजिए। ये दोनों फौजें वक्त पर एक साथ मिल पायीं तभी यह योजना कामयाब होगी। नहीं तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा।" सरदार और अधिकारी के दृढ़ चेहरे की ओर गम्भीरता से सभी देखने लगे। उसी समय बादशाह ने कहा, "एक बार यदि दोनों फौजें एक जगह पर मिल गयीं तो मैं एक दूसरी चाल चलूँगा। ये देखो कोंकण में नीचे उतरने वाले घाट। यह बोरघाट, यह कावल घाट, यह वरंदघाट दूसरी ओर का यह अंवाघाट। यदि वक्त पर दोनों फौजें इकट्ठा हो गयीं तो मैं इन घाटों से दस-दस हजार फौजों की टुकड़ियाँ और भी नीचे उतारूँगा। ये फौजें पूरे कोंकण को अंगारे पर पड़ी मछली की तरह भून डालेंगी। किन्तु यदि समय का तालमेल नहीं बैठा तो हमारी फौजें सह्याद्रि की इन घाटियों में डूब जाएँगी। पूछो क्यों?" "क्यों जहाँपनाह ? "हमारी ताकत के जरा भी कमज़ोर होने का अन्दाजा होते ही इन वनों और जंगलों के लोग, लाड़ियों और कुल्हाड़ियों के साथ बाहर निकल पड़ेंगे। बीच रास्ते में फँसाकर हमारे लोगों को पीटेंगे। औरतें और बच्चे भी आगे पीछे नहीं देखेंगे। क्योंकि यह सारा मुल्क शिवा और सम्भा के साथ दिलोजान से मुहब्बत करता है।" बादशाह को आगे के सभी फैसले शीघ्र लेने थे। दक्षिण कोंकण के सैन्यदल का नेतृत्व किसे सौंपना है? इस सम्बन्ध में बादशाह ने सभी से परामर्श किया। सभी ने बड़े शहजादे मुअज्जम का नाम सुझाया। मुअज्जम ऊँचा, बलिष्ठ, मर्दाना आकर्षण और लुभावनी आवाज वाला व्यक्ति था। सभी लोग उसे एक कुशल, बुद्धिमान, वफादार आदर्श शहजादा के रूप में देखते थे। वह अभी पैंतीस वर्ष का था। मुअज्जम के नाम पर सर्वसम्मति से बादशाह एक क्षण के लिए चकित हुआ। मुअज्जम के साथ और किस-किस को भेजा जाय? इसका निर्णय भी उसी बैठक में लिया गया। इखलासखान, लतीफशाह दखनी, तोपखाने का दरोगा आतिश खान, इस प्रकार बादशाह ने एक-एक नाम लिया। इसके बाद सभी सरदार अभिवादन करते हुए एक-एक करके खड़े हो गये। इसके बाद औरंगजेब ने नेक मराठा नागोजी 458 :: सम्भाजी