छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 463, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंशंभूमहाराज की आँखें चमक उठीं। उन्होंने खंडोजी की ओर आश्चर्य से देखा। कुछ गद्दारों के कारण बालाजी चिटणीस की मौत, औंदा गाँव की वह बंजर भूमि, सेना की भूलें आदि स्मरण करके शंभूमहाराज का मन भारी हो गया। वे कम्पित स्वर में बोले—"खंडोजी बालाजी काका के दुखद अन्त के बाद चिटणीस का पद मैंने आपको प्रदान किया। हमारी महारानी ने आपको और निलोगा को अपना बेटा मानकर गोद में खेलाया, परन्तु—" शंभूमहाराज बोलते-बोलते रुक गये, उनकी जबान भारी हो गयी, आँखों के गर्म आँसुओं को उन्होंने बड़ी सावधानी से पोंछ लिया। शंभूमहाराज ने पुनः कहा, "औढ़ा शब्द के स्मरण होते ही मेरे कलेजे मे कुल्हाड़ियों के पाव की पीड़ा होती है। खंडोबा वह कोई षड्यन्त्र नहीं केवल एक दुर्घटना थी जिसमें बालाजी काका का अन्त हुआ। मनुष्य के जीवन में ऐसे भी प्रसंग आते हैं जब वस्तुस्थिति से हम अलग हो जाते हैं। एक ओर गद्दारों के कारण काकाजी का गिरफ्तार हो जाना दूसरी ओर दुर्भाग्य मे उनके महत्त्वपूर्ण पत्र हमारे पास तक न पहुँच पाना, कारण बन गया। खंडोजी हम अपराधी हैं। चिटणीस ही हत्या का पाप हमसे ही हुआ।" "महाराज, इसमें किसी का भी दोष नहीं है। हमारा समय ही बुरा था। यह हमारा ही दुर्भाग्य था।" उन्होंने आगे कहा, "महाराज जो भी हुआ उसे भूल जाइये। आपने हमारे लिए क्या नहीं किया? चिटणीस बनाकर अपनी गोद में संभाला - " "खंडोजी कभी कभी लगता है कि बालाजी की मृत्यु के हम ही कारण हैं इस पाप का शमन करने के लिए, आक्रमण पर निकलने से पहले मैंने रायगढ़ के किलेदार को आदेश दिया है—" "जहाँ हमारे बालाजी का अन्त हुआ है, औढ़ा की उस बंजरभूमि पर शिवालय के निर्माण का तो नहीं?" "हाँ, वहाँ के शिवलिंग पर गिरने वाली शीतल जलधारा ही हमारी और बालाजी काका के लिए अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि होगी।" खंडो बल्लाल ने उठकर शंभूमहाराज के चरण पकड़े और बोले, "महाराज राजसेवा करते समय इस प्रकार अनेक सैनिक शहीद होते हैं। पर उनकी याद किसी को नहीं आती। आपने हमारे बालाजी को इतनी अच्छी तरह अपनी स्मृति में रखा है। उनकी स्मृति को अपने हृदय में स्थान दिया है। आपका विशाल हृदय और वात्सल्य भाव देखकर मैं गद्गद हो गया हूँ। शंभूमहाराज ने उच्छ्वास लेते हुए कहा, "खंडोबा, उस ईश्वर की महिमा अपार है। पता नहीं मनुष्य क्यों मनुष्य के प्रेम में फँस जाता है ? ईश्वर और नियति का वह खेल सर्वथा अबूझ है।" ऐसा कहते समय महाराज की आँखों के सामने अहमदनगर किले की तटबन्दी दिख रही थी। तटबन्दी के पीछे तीन वर्ष से कैदी के संभाजी :: 461