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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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कारण बैल गिरने लगे। कुछ बैलों के पैर टूट गये। तोपों को खींचने वाले सैनिक बेहाल हो गये। किन्तु वाइसराय ने किसी बात की चिन्ता नहीं की। कांट ने सही जगह पर तोपों को खड़ा कर दिया। वह जगह ऐसी थी जहाँ से किले पर सीधा निशाना साधा जा सकता था। वाइसराय ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "मराठे नींद में बेसुध दीखते हैं। चलों उन्हें वहीं पर गाड़ देंगे।" आधी रात को ही फिरंगियों की तोपों से धड़ाम धूम, धड़ाम-धूम करके बड़े-बड़े गोले किले पर बरसने लगे। फिरंगी सेना उत्सव मनाने लगी। कुछ ही क्षणों में सामने की दीवार थरथराने लगी। थोड़ी देर में ऊपर के बुर्ज से मराठे भी धामऽऽ धामऽऽ" धुड़म धामऽऽ प्रत्युत्तर देने लगे। तोपों से तोपों और गोलियों से गोलियों की भिड़न्त शुरू हो गयी। बरसात के पानी के साथ साथ ही आग का भी खेल आरम्भ हुआ। तोपों से निकलने वाली आग, चिनगारियों से सजकर लाल मिट्टी पर गिर रही थी। उन गिरने वाली बूँदों की शोभा निराली थी। किन्तु दूसरी रात मराठों के लिए इतनी भाग्यशाली नहीं थी। फिरंगियों की तोपों के धमाके बहुत जहरीले थे। उन्होंने मराठों की तोपों को व्यर्थ कर दिया। एक दुखद घटना यह घटी कि गढ़ी का ऊपरी हिस्सा बारिश में भीगकर गिर गया। एक तोप भी अपनी जगह से लुढ़क गयी। किसी चट्टान की तरह वह तोप लुढ़कते हुए नीचे गिर गयी। किले के ऊपर बनी मजबूत गढ़ी भी गिर गयी। फिरंगियों में उत्साह का माहौल हो गया। तटबन्दी की दीवार टूटने पर भी कोई मराठा पीछे नहीं हटा। वाइसराय निराश हुआ। पिछले दिन से वह तीन बार भीग चुका था। तीन दिनों से मराठों के साथ मुठभेड़ चल रही थी, पर किले का दरवाजा खुल नहीं पा रहा था। वाइसराय ने दुलबा नाईक की गर्दन पकड़कर उससे पूछा, "बोल दुलबा, किले मे लोग हैं भी तो कितने ?" "सरकार मेरी जानकारी के अनुसार अन्दर सिर्फ दस बारह लोग थे।" अपनी जबान काटते हुए दुलबा ने आगे कहा, "पता नहीं पिछले तीन दिनों से उन्होंने लड़ाई जारी कैसे रखी ? उस कपटी सम्भाजी ने क्या जादू किया है, कुछ पता नहीं चल रहा है?" "जादू नहीं दुलबा, उस सम्भा ने बड़ी कुशलता से कुछ बलवान मराठी जवानों की फौज को तैनात किया है। नहीं तो इस मिट्टी के ढेर में इतनी हिम्मत कहाँ से आती ?" एक बार फिर कांट द आल्होर ने हिम्मत करके अपनी तोपों को ऊपर से नीचे उतार दिया। उसने किले के सामने से तोपों को दागना शुरू किया। सामने वाले बुर्ज में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने लगीं। स्थिति को समझने के लिए कांट ने कुछ समय के लिए गोलाबारी रोक दी। गन्धक और कीचड़ सने हाथों को कपड़ों से पोंछता हुआ वह बहुत देर तक वहीं पर खड़ा रहा। भीतर से किसी हलचल का संकेत नहीं सम्भाजी :: 467