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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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कन्नड़भाषी सैनिक थे। अक्तूबर 1683 के अन्त में एक सुहानी सुबह यह सेना पणजी से बाहर निकलने लगी। इस सेना का नेतृत्व वाइसराय स्वयं कर रहा था। दूर तक मार करने वाली बड़ी-बड़ी तोपों को खींचते-खींचते बैल व्याकुल हो रहे थे। हाथों में बन्दूक और तलवार संभाले सैनिक एक-दो, एक-दो के कदमताल से आगे बढ़ रहे थे। फ़ौज प्रातःकाल ही पांडवी नदी की सहायक एक छोटी नदी के किनारे पहुँच गयी। पैर के नीचे की भुसभुसी मिट्टी में सैनिकों के जूते धँसने लगे। बहुत वर्षों बाद गोवा के भूमि पर एक बड़ा युद्ध होने जा रहा था। इसलिए आसपास की चर्चों पर, पेड़ों पर, पहाड़ियों पर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। जैसे-जैसे दुर्भाट बन्दरगाह समीप आ रहा था, वाइसराय के सहयोगी भयभीत होने लगे। वाइसराय का सचिव चिन्ताग्रस्त स्वर में बोला- "सर, दुर्भाट बन्दर छोड़ दिया जाय तो अच्छा होगा।" "क्यों?" "वहाँ पर मराठों का वीर सूबेदार दुलबा नाइक अपनी फौज के साथ हमेशा के लिए ताल ठोंककर बैठा है।" "चलो तो सही !" वाइसराय ने सोत्साह कहा। दुर्भाट बन्दर के पास फौज पहुँची तो सभी दर्शकों ने अपनी साँस रोक ली। सभी इस अनुमान से आँखें फाड़कर देखने लगे कि अभी दोनों फौजों में घमासान युद्ध होगा। दुलबा नंगी तलवार लेकर आने की जगह मेले में किसी बालक की तरह अपनी पगड़ी उछालते और नाचते हुए आया। उसने वाइसराय को आलिंगन दिया। वाइसराय ने ममता से उसके गाल नोंच लिए। दुलबा फिरंगियों से मिला हुआ था। इसलिए फोंडा की तटबन्दी आसानी से भेदकर उस पर क़ब्ज़ा कर लेंगे, ऐसे विश्वास से वाइसराय अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहा था। दिन में हम कहाँ और किसलिए जा रहे हैं, इसका उसने किसी को पता ही नहीं चलने दिया। रात को सेना फोंडा किले के पास पहुँची। वहाँ ठंडी हवा ने किले के भीतर मराठों और बाहर फिरंगी सेना को परेशान कर दिया था। आधी रात तक फिरंगियों की बन्दूकों से कोई गोली दागी नहीं गयी थी। किन्तु इसी समय आकाश से बादल बरसने लगे। जैसे उछलते घोड़े दौड़ते हुए सामने आ रहे हो वैसे ही गर्जन- तर्जन के साथ बरसात ने जोर पकड़ा। उसने पेड़-पत्तों के साथ खड़ी फिरंगी सेना को खूब पीटा। एक बार किले के पास तक पहुँचकर पीछे मुड़ना भी अच्छा नहीं था वर्षा में वाइसराय के वस्त्र भीग गये। अपने ऊपर छाता ताने खड़े नौकर को भी उसने भगा दिया। तेज बारिश और अन्धकार का फायदा उठाने की बात वाइसराय ने सोची। रात में ही उसने तीन बड़ी तोपों को किले की सामने वाली पहाड़ी पर खड़ा कर दिया। चढ़ाई चढ़ते समय बैलों के पैर कीचड़ में धँसने के 466 :: सम्भाजी