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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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उनमें होड़ लगती थी। कभी शम्भूराजा अपने साथियों के साथ लिंगाड़े की भयंकर पहाड़ी पर रातभर रहते थे, कभी भरी हुई कालगंगा नदी में बड़ी-बड़ी जालियाँ बाँधकर मछलियाँ पकड़ते थे, कभी बाणगंगा की खाड़ी में जाकर अपने मित्रों के साथ समुद्र में स्नान करने का आनन्द लेते थे। छोटे गाँवों में गरीबों की शादी में सम्मिलित होकर युवराज लेजिम और गतका खेलते थे। इससे प्रजा युवराज की बड़ी प्रशंसा करती थी। पहाड़ियों में रहने वाले बहादुर युवक युवराज से मिलते थे और युवराज उन्हें अपनी सेना में भर्ती करते थे। एक दिन भोगावती नदी के किनारे रहने वाला जोत्याजी कोल्हापुर से चलकर आया। उसके मन में यह देखने की बड़ी उत्सुकता थी कि शिवाजी महाराज का पुत्र कैसा है? युवराज से उसकी भेंट हो गयी। छोटी सी भेंट का ऐसा प्रभाव पड़ा कि जोत्याजी जन्म-भर के लिए युवराज का मित्र बन गया। एक जंगली सुअर युवराज के निशाने से छूटकर निकला तो रायप्पा ने उस पर छलाँग दी। सुअर अपने नुकीले दाँतों से उस पर वार करने लगा किन्तु रायप्पा ने उसकी गर्दन इस तरह दबोचा कि उसके प्राण ही निकल गये। इसी प्रसंग के प्रभाव से रायप्पा युवराज की सेवा में आ गया और आजन्म सेवक बना रहा। दरबार हो या मन्दिर, रायप्पा सच्चे मित्र की तरह युवराज के साथ सदैव बना रहता था। केवल कवि कलश युवराज से उम्र में दस वर्ष बड़े थे। शेष सभी यार-दोस्त युवराज ने अपनी ही उम्र के अपने आसपास जमा किये थे। ये लोग अपने लाड़ले युवराज के लिए प्राण निछावर करने के लिए तैयार रहते थे। विशेष रूप से राज्याभिषेक समारोह के बाद शम्भूराजा के व्यवहार से कुछ पंडित, शास्त्री, खानदानी मराठे रुष्ट हो गये थे। बड़े महाराज तक भी यह शिकायत गयी थी कि "संभाजी तेजस्वी हैं। बहादुर हैं। परन्तु आजकल उनका घोड़ा चारों दिशाओं में बेलगाम दौड़ने लगा है। युवराज के रूप में उनका मान-सम्मान बचा नहीं है। कहीं भी—गलियों, घरों, पहाड़ों, जंगलों में भटकते रहते हैं। महार, माँग कोली, कोष्टी, धनगर, हटकरी जैसे नीच जाति के लोगों में घुले-मिले रहते हैं।" एक दिन दोपहर को शिवाजी महाराज ने युवराज को अपने पास बुलाया। उस समय महाराज मन्दिर में बैठे थे। युवराज भयभीत और सहमे हुए वहाँ पहुँचे। महाराज ने हँसकर कहा, "आप सिर्फ घाटियों में ही अपना घोड़ा बेलगाम करके न दौड़ाओ। ऐसे सच्चे लोग वहाँ रहते जिन्हें स्वार्थ की तनिक भी हवा नहीं लगी है। उन्हें जमा करो। वह धन जीवन-भर आपके काम आएगा। शम्भू बेटे, तुम्हारा घोड़ा सही रास्ते पर दौड़ रहा है। ऐसे ही दौड़ते रहो।" शिवाजी महाराज की मुख-मुद्रा ऐसी लग रही थी जैसे कहीं दूसरे लोक में खो गये हों। उनके चेहरे पर ऐसी तेजस्वी आभा दमक रही थी जैसे आग के भीतर सम्भाजी 45