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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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विरह वेदना एक राज्याभिषेक के बाद शिवाजी महाराज पहली बार युद्ध के लिए बाहर निकल रहे थे। कर्नाटक के साथ युद्ध की तैयारी जोरों पर थी। चालीस हजार पैदल और बीस हजार घुड़सवार सैनिक लेकर शिवाजी महाराज और शम्भुराजा युद्ध के लिए निकलने वाले थे। दूसरे प्रदेश में इतनी बड़ी सेना के खाने पीने की उत्तम व्यवस्था भी आवश्यक थी। अस्त्र शस्त्र भी पूरे होने चाहिए थे। इस तैयारी के लिए किले के नीचे रायगढ़वाड़ी के जंगल में अठारह कारखाने रात दिन काम कर रहे थे। यन्त्रशालाओं, बारूदखानों और दरबार में बड़ी व्यस्तता थी। बड़े महाराज के सामने अनेक प्रश्न थे। शम्भुराजा भोर में उठकर दिन निकलने से पहले ही दरबार में आकर बैठ जाते थे। उनसे भी पहले इनामी रायप्पा आकर युवराज की राह देखते रहते थे। रात को अपने महल में लौटने के लिए शम्भुराजा को विलम्ब हो जाता था। येसूबाई और दुर्गाबाई शम्भुराजा की बाट जोहती रहती थीं। युवराज बहुत समझदार हो गये थे। बड़े महाराज द्वारा दी गयी प्रत्येक जिम्मेदारी बड़ी तत्परता से पूरी करते थे। समझदार पुत्र के सुख को महाराज पूरी तरह अनुभव कर रहे थे। सरदारों और मनसबदारों को अनेक बार वे स्वयं कहते थे—'इतने छोटे से कार्य के लिए मेरे पास क्यों दौड़ते हो? युवराज से मिलो। वे सक्षम हैं।' युद्ध में युवराज की महत्त्वपूर्ण भूमिका से उनके यार दोस्त बहुत प्रसन्न थे। शम्भुराजा की तैयारी के निरीक्षण और सहयोग के लिए महाराज ने बालाजी चिटणीस को अनेक हिदायतें दे रखी थीं। बालाजी पन्त युवराज के प्रत्येक कार्य पर बारीकी से ध्यान दे रहे थे। अपने साथियों के साथ घोड़ों को तेज दौड़ाते हुए शम्भुराजा आसपास के देहातों में जाते थे। चांदोशी गाँव में कोकणदिवा की ऊँची पहाड़ी की चोटी तक, लगभग चार हजार फीट की ऊँचाई तक दौड़ते हुए चढ़ने की 44 :: सम्भाजी