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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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महाराज की फौज किले के पास पहुँच गयी। इस समाचार से ही फिरंगियों का जोश ठंडा पड़ गया। 'चलो, आगे बढ़ो' की ललकार हुई किन्तु फिरंगियों की दशा भीगी हुई भेड़, बकरियों जैसी हो गयी थी। दूसरी ओर शम्भूराजा के आगमन से प्रत्येक मराठा सैनिक में तूफान की शक्ति आ गयी थी। सम्भाजी महाराज का घोड़ा किले के द्वार पर पहुँच गया। उन्होंने किले के द्वार पर अपने श्वेत अश्व को नचाना आरम्भ किया। उनके पीछे पीछे खंडो बल्लाल का घोड़ा भी मध्यम चाल में उछलते हुए वहीं पर आ गया। लड़ाई की स्थिति समझकर शम्भू महाराज ने अपने आठ सौ सैनिकों में से सौ सैनिक किले के चारों ओर लगा दिए। कांट साहब ने चिल्लाते हुए अपने सैनिकों को बन्दूक चलाने के लिए विवश किया। किन्तु युद्ध के लिए मदोन्मत्त मराठों के घोड़े फिरंगियों की गोलियों को जरा भी महत्त्व नहीं दे रहे थे। मराठों का बढ़ता जोश देखकर एक कैप्टन ने वाइसराय के कानों में बोला, "झट से पीछे मुड़ जाएँगे, नहीं तो हमारे पीछे सम्भाजी के सैनिक नदी में उतर जाएँगे। नदी में फँसकर हमारी मौत होगी। द पाथ ऑफ रिट्रीट बिल बी कम्प्लीटली लास्ट।" वाइसराय ने अभी तक हिम्मत नहीं हारी थी। किन्तु उसकी सेना का साहस छूट चुका था। भाग्य ही उसका साथ नहीं दे रहा था। उसने अपने आँसुओं को रोकते हुए सेना को पीछे मुड़ने का आदेश दे दिया। आदेश मिलते ही पिछले दस दिनों से बारिश की मार और मराठों के तीव्र प्रतिरोध से जर्जर फिरंगी जान बचाकर पीछे भागने लगे। फिरंगियों की बची हुई फौज दूसरे दिन दुर्भाट की खाड़ी के पास पहुँच गयी। आगे की पहाड़ियों पर मराठों का एक दल छुपकर बैठा था। बुरी तरह अपमानित वाइसराय कांट में एक बार फिर 'वीरत्व जागृत हुआ। उसने पहाड़ी पर छिपी मराठों की सेना को समाप्त कर देने का आदेश दिया। पराजय स्वीकारने का बहाना बनाकर मराठों का दल पीछे हट गया। उन्होंने फिरंगियों को ठीक जगह पर सुविधा से आने दिया और फिर एकाएक उन पर टूट पड़े। फिरंगियों ने गोलियाँ दागनी शुरू कीं किन्तु मराठों ने उन्हें अपनी ढालों पर रोका। कभी घोड़े की आड़ से चकमा देकर उन पर आक्रमण किया। थोड़ी ही देर में फिरंगी सैनिक घोड़ों की टापों के नीचे कुचलकर मरने लगे। लड़ाई हार जाने पर भी वाइसराय का जोश कम नहीं हुआ था। एक मराठा वीर आगे बढ़कर अपनी धारदार तलवार से कांट साहब के सिर पर वार किया। यद्यपि तलवार वाइसराय के चमड़े के कोट से नीचे सरक गयी फिर भी तलवार की तेज नोंक उनकी पसलियों में घुस ही गयी। इस प्रकार एक बार नहीं दो बार कांट अपने भाग्य से बच गये। बचे हुए सौ-सवा सौ फिरंगियों ने अपनी जान बचाने के लिए मांडवी नदी का सहारा लिया। जिन्हें तैरने का अभ्यास नहीं था वे डूब गये। 170 सम्भाजी